सत्ता से हटते ही टीएमसी में फूट क्यों?
प्रकाशित: 07-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
बंगाल में 15 वर्ष तक शासन करने के पश्चात टीएमसी विधानसभा चुनाव हार गई इस पराजय का कारण एंटी इनकमबैंसी कहा जा सकता है। पर हैरानी की बात यह है कि जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में काम करने वाली पार्टी में वोट पड़ गई पश्चिम बंगाल के राजनीतिक में कभी अजेय दिखने वाली तृण मूल कांग्रेस आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर आंतरिक संकट से जूझती नजर आ रही है विधानसभा चुनाव में करारी हार के पश्चात उभरा असंतोष अब खुले तौर पर शक्ति संघर्ष में दिखाई दे रहा है।
पाखी विरोधी गतिविधियों के लिए पार्टी से निष्कर्ष नेता श्रुत वत बनर्जी के नेतृत्व में एक ग्रुप बना है जिसमें 58 विधायक है और इस समूह को विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र घोष द्वारा मान्यता मिल गई है और श्रतु व्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया गया है यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है एक दशक से अधिक समय तक बंगाल के राजनीति में एक छत्र प्रभाव रखने वाली टीएमसी ऐसी में पहुंच गई है जिसके कल्पना नहीं की जा सकती।
अभी तक तृण मूल कांग्रेस में सभी फैसले पार्टी नेतृत्व यानि ममता बनर्जी के द्वारा लिए जाते रहे हैं सत्ता से बाहर होते ही उनके खिलाफ बगावत होती नजर आ रही है,कई नेताओं का यह कहना है कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के कारणो की समीक्षा करने के बजाय जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया गया। संकट की घड़ी में सबसे अधिक ज्यादा दबाव ममता बनर्जी के बादपार्टी में सबसे बड़े नेता माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी जी पर दिखाई दे रहा है क्योंकि उन्हें पार्टी में ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है हालिया विवादों और जांच प्रािढयाओं ने उनकी राजनीतिक स्थिति को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है, पार्टी के भीतर एक वर्ग मानता है कि नेतृत्व के केंद्रीय कारण और कुछ चुनिंदा नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता ने पार्टी में असंतोष को बढ़ाया यही असंतोष अब राजनीतिक चुनौती का रूप लेता दिखाई पड़ रहा है। यह पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे अविश्वास और गुटबाजी का परिणाम है चुनावी हार ने उनके अंतर्विरोध को उजागर कर दिया है जिन्हें अब तक पार्टी नेतृत्व सत्ता में रहने के कारण ढक कर रखने में कामयाब रहा है।
राजनीतिक हल्का में सबसे अधिक चर्चा असंतुष्ट गुट के साथ विधायकों की संख्या की हो रही है, जो असली टी एमसीसी का फैसला कर सकते हैं। बंगाल विधानसभा में पार्टी के कुल 80 विधायक हैं और दल बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी समूह को अलग पहचान हासिल करने के लिए कम से कम 54 विधायकों का समर्थन चाहिए, बागी विधायकों का दावा है कि उनके साथ 60 विधायक हैं यदि उनका यह दावा सही साबित हुआ तो यह घटना टी एम सी के अंदर बगावत नहीं बल्कि सत्ता संतुलन को बदलने के लिए होने वाली घटना के रूप में माना जा सकता है, जिन ममता दीदी ने दशकों पहले पार्टी की स्थापना की और पार्टी को सत्ता में रखा और उन्हीं के नेतृत्व के विरुद्ध पार्टी में विद्रोह हो गया है कुछ लोग इस विद्रोह को आयरन लेडी ममता बनर्जी की विदाई के रूप में देख रहे हैं यहां तक की बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में हुई प्रशासनिक समीक्षा की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले टी एम सी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए इस घटपाम को विधानसभा में चुनाव में करारी हार के बाद अब तक के सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह का सामना कर रही तृण मूल कांग्रेस के भीतर एक नए राजनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
टीएमसी के भीतर पैदा हुए हालात की तुलना वर्ष 2022 में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना मंन विभाजन से की जा सकती है ,उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया , फलस्वरूप पार्टी का नियंत्रण ही बदल गया और एकनाथ शिंदे भाजपा के साथ मिलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए , पर इन दोनों प्रकार के विभाजन में थोड़ा अंतर अवश्य था महाराष्ट्र में यह विभाजन सत्ता परिवर्तन के लिए किया गयाथा ,जबकि बंगाल में यह विभाजन विपक्षके भीतर नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक नियंत्रण का है। जब उद्धव ठाकरे की शिवसेना से बड़ी संख्या में विधायकों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विद्रोह किया ,उसी समय शरद पवार के नेतृत्व वाली एन सी पी में बड़ी संख्या में विधायकों ने उनके भतीजे अजित पवार के नेतृत्व में विद्रोह किया और अजित पवार महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए।
क्षेत्रीय दलों में सत्ता जाने के बाद पार्टी में विभाजन का इतिहास बड़ा पुराना है। जब भी कोई क्षेत्रीय पार्टी विधानसभा का चुनाव हार जाती है तो पदलोलुप्त लोग दल बदल कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते है, दिल्ली विधानसभा चुनाव के पश्चात जब आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई तो पंजाब से चुनकर आए छ राज सभा सांसदों ने आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया, इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव हारने के पश्चात बहुजन समाज पार्टी के अनेक बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़कर भाजपा या अन्य राजनीतिक पार्टियों का दामन थाम लिया।अभी तमिलनाडु में चुनाव हारने के पश्चात ए आई डी एम के के अनेक विधायक पार्टी में विद्रोह करके नया ग्रुप बना लिया हैं।इसका मुख्य कारण यह है कि क्षेत्रीय दल किसी सिद्धांत के आधार पर नहीं बनाए जाते यह तो विभिन्न जातियों, धर्म या भाषा के आधार पर चुनाव में सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए जाते हैं, और जब सत्ता प्राप्ति में यह सफलनहीं हो पाते हैं तो उनकी विधायक कहीं और जगह तलाशने में लग जाते हैंजिससे सत्ता के नजदीक पहुंचा जा सके।
प्राय यह देखा गया है कि इस तरह का विभाजन केवल क्षेत्रीय दलों में ही होता है देश की राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही ऐसे दल है जहां कभी भी चुनाव हारने के बाद इस तरह का विभाजन नहीं हुआ।19 90 के दशक में कांग्रेस में एक बार विभाजन तो हुआ पर चुनाव में पराजय के कारण नहीं बल्कि यह विभाजन श्रीमती सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर हुआ, जब शरद पवार और पी ए संगमा ने विदेशी मूल के मुद्दे पर अपनी अलग पार्टी बना ली।जहां तक भारतीय जनता पार्टी का प्रश्न है तो 1952 से लेकर 1996 तक जनसंख्या के रूप में और बाद में भाजपा के रूप में पार्टी ने अनेक चुनाव हारे लेकिन कभी भी पार्टी में इस तरह का विभाजन नहीं देखा गया क्योंकि पार्टी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के बल पर राजनीति करती रही और यदि किसी नेता को पार्टी नेतृत्व के किसी निर्णय के विरुद्ध कुछ कहना होता तो पार्टी के अंदर उचित प्लेटफॉर्म पर कहती। जबकि क्षेत्रीय पार्टियों जाति और धर्म के नाम पर सत्ता में आना चाहती है इस कारण कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में राष्ट्रीय स्तर की परियों का ही होना आवश्यक है जिससे कुकुरमुत्ता की तरह बढ़ते हुए क्षेत्रीय दल जाति और भाषा के नाम पर देश की एकता और अखंडता को नष्ट कर देंगे।
विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह से हारने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में विभाजन हो रहा है लोकतंत्र की दृष्टि से बिल्कुल ठीक नहीं है, इस तरह की विभाजन अवसरवादिता और जोड़ तोड़ से सत्ता में आने की ललक को दर्शाते हैं जो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में उचित नहीं है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)
बंगाल में 15 वर्ष तक शासन करने के पश्चात टीएमसी विधानसभा चुनाव हार गई इस पराजय का कारण एंटी इनकमबैंसी कहा जा सकता है। पर हैरानी की बात यह है कि जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में काम करने वाली पार्टी में वोट पड़ गई पश्चिम बंगाल के राजनीतिक में कभी अजेय दिखने वाली तृण मूल कांग्रेस आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर आंतरिक संकट से जूझती नजर आ रही है विधानसभा चुनाव में करारी हार के पश्चात उभरा असंतोष अब खुले तौर पर शक्ति संघर्ष में दिखाई दे रहा है।
पाखी विरोधी गतिविधियों के लिए पार्टी से निष्कर्ष नेता श्रुत वत बनर्जी के नेतृत्व में एक ग्रुप बना है जिसमें 58 विधायक है और इस समूह को विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र घोष द्वारा मान्यता मिल गई है और श्रतु व्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया गया है यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है एक दशक से अधिक समय तक बंगाल के राजनीति में एक छत्र प्रभाव रखने वाली टीएमसी ऐसी में पहुंच गई है जिसके कल्पना नहीं की जा सकती।
अभी तक तृण मूल कांग्रेस में सभी फैसले पार्टी नेतृत्व यानि ममता बनर्जी के द्वारा लिए जाते रहे हैं सत्ता से बाहर होते ही उनके खिलाफ बगावत होती नजर आ रही है,कई नेताओं का यह कहना है कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के कारणो की समीक्षा करने के बजाय जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया गया। संकट की घड़ी में सबसे अधिक ज्यादा दबाव ममता बनर्जी के बादपार्टी में सबसे बड़े नेता माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी जी पर दिखाई दे रहा है क्योंकि उन्हें पार्टी में ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है हालिया विवादों और जांच प्रािढयाओं ने उनकी राजनीतिक स्थिति को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है, पार्टी के भीतर एक वर्ग मानता है कि नेतृत्व के केंद्रीय कारण और कुछ चुनिंदा नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता ने पार्टी में असंतोष को बढ़ाया यही असंतोष अब राजनीतिक चुनौती का रूप लेता दिखाई पड़ रहा है। यह पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे अविश्वास और गुटबाजी का परिणाम है चुनावी हार ने उनके अंतर्विरोध को उजागर कर दिया है जिन्हें अब तक पार्टी नेतृत्व सत्ता में रहने के कारण ढक कर रखने में कामयाब रहा है।
राजनीतिक हल्का में सबसे अधिक चर्चा असंतुष्ट गुट के साथ विधायकों की संख्या की हो रही है, जो असली टी एमसीसी का फैसला कर सकते हैं। बंगाल विधानसभा में पार्टी के कुल 80 विधायक हैं और दल बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी समूह को अलग पहचान हासिल करने के लिए कम से कम 54 विधायकों का समर्थन चाहिए, बागी विधायकों का दावा है कि उनके साथ 60 विधायक हैं यदि उनका यह दावा सही साबित हुआ तो यह घटना टी एम सी के अंदर बगावत नहीं बल्कि सत्ता संतुलन को बदलने के लिए होने वाली घटना के रूप में माना जा सकता है, जिन ममता दीदी ने दशकों पहले पार्टी की स्थापना की और पार्टी को सत्ता में रखा और उन्हीं के नेतृत्व के विरुद्ध पार्टी में विद्रोह हो गया है कुछ लोग इस विद्रोह को आयरन लेडी ममता बनर्जी की विदाई के रूप में देख रहे हैं यहां तक की बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में हुई प्रशासनिक समीक्षा की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले टी एम सी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए इस घटपाम को विधानसभा में चुनाव में करारी हार के बाद अब तक के सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह का सामना कर रही तृण मूल कांग्रेस के भीतर एक नए राजनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
टीएमसी के भीतर पैदा हुए हालात की तुलना वर्ष 2022 में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना मंन विभाजन से की जा सकती है ,उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया , फलस्वरूप पार्टी का नियंत्रण ही बदल गया और एकनाथ शिंदे भाजपा के साथ मिलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए , पर इन दोनों प्रकार के विभाजन में थोड़ा अंतर अवश्य था महाराष्ट्र में यह विभाजन सत्ता परिवर्तन के लिए किया गयाथा ,जबकि बंगाल में यह विभाजन विपक्षके भीतर नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक नियंत्रण का है। जब उद्धव ठाकरे की शिवसेना से बड़ी संख्या में विधायकों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विद्रोह किया ,उसी समय शरद पवार के नेतृत्व वाली एन सी पी में बड़ी संख्या में विधायकों ने उनके भतीजे अजित पवार के नेतृत्व में विद्रोह किया और अजित पवार महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए।
क्षेत्रीय दलों में सत्ता जाने के बाद पार्टी में विभाजन का इतिहास बड़ा पुराना है। जब भी कोई क्षेत्रीय पार्टी विधानसभा का चुनाव हार जाती है तो पदलोलुप्त लोग दल बदल कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते है, दिल्ली विधानसभा चुनाव के पश्चात जब आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई तो पंजाब से चुनकर आए छ राज सभा सांसदों ने आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया, इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव हारने के पश्चात बहुजन समाज पार्टी के अनेक बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़कर भाजपा या अन्य राजनीतिक पार्टियों का दामन थाम लिया।अभी तमिलनाडु में चुनाव हारने के पश्चात ए आई डी एम के के अनेक विधायक पार्टी में विद्रोह करके नया ग्रुप बना लिया हैं।इसका मुख्य कारण यह है कि क्षेत्रीय दल किसी सिद्धांत के आधार पर नहीं बनाए जाते यह तो विभिन्न जातियों, धर्म या भाषा के आधार पर चुनाव में सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए जाते हैं, और जब सत्ता प्राप्ति में यह सफलनहीं हो पाते हैं तो उनकी विधायक कहीं और जगह तलाशने में लग जाते हैंजिससे सत्ता के नजदीक पहुंचा जा सके।
प्राय यह देखा गया है कि इस तरह का विभाजन केवल क्षेत्रीय दलों में ही होता है देश की राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही ऐसे दल है जहां कभी भी चुनाव हारने के बाद इस तरह का विभाजन नहीं हुआ।19 90 के दशक में कांग्रेस में एक बार विभाजन तो हुआ पर चुनाव में पराजय के कारण नहीं बल्कि यह विभाजन श्रीमती सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर हुआ, जब शरद पवार और पी ए संगमा ने विदेशी मूल के मुद्दे पर अपनी अलग पार्टी बना ली।जहां तक भारतीय जनता पार्टी का प्रश्न है तो 1952 से लेकर 1996 तक जनसंख्या के रूप में और बाद में भाजपा के रूप में पार्टी ने अनेक चुनाव हारे लेकिन कभी भी पार्टी में इस तरह का विभाजन नहीं देखा गया क्योंकि पार्टी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के बल पर राजनीति करती रही और यदि किसी नेता को पार्टी नेतृत्व के किसी निर्णय के विरुद्ध कुछ कहना होता तो पार्टी के अंदर उचित प्लेटफॉर्म पर कहती। जबकि क्षेत्रीय पार्टियों जाति और धर्म के नाम पर सत्ता में आना चाहती है इस कारण कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में राष्ट्रीय स्तर की परियों का ही होना आवश्यक है जिससे कुकुरमुत्ता की तरह बढ़ते हुए क्षेत्रीय दल जाति और भाषा के नाम पर देश की एकता और अखंडता को नष्ट कर देंगे।
विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह से हारने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में विभाजन हो रहा है लोकतंत्र की दृष्टि से बिल्कुल ठीक नहीं है, इस तरह की विभाजन अवसरवादिता और जोड़ तोड़ से सत्ता में आने की ललक को दर्शाते हैं जो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में उचित नहीं है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)