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डीएमके के फैसले से इंडी गठबंधन में बढ़ी दरार

प्रकाशित: 07-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
डीएमके के फैसले से इंडी गठबंधन में बढ़ी दरार
आदित्य नरेन्द्र
केंद्र की राजग सरकार को सत्ता से बेदखल करने के इरादे से बने इंडी गठबंधन में उस समय एक बड़ी दरार आ गई जब उसमें शामिल एक बड़ी पाटी डीएमके ने कांग्रेस के व्यवहार से नाराज होकर फैसला किया कि वह आठ जून को नई दिल्ली में होने वाली इंडी गठबंधन की बैठक में भाग नहीं लेगी। डीएमके के वरिष्ठ नेता टीकेएस एलंगोवन ने कहा कि अब हम इंडी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं इसीलिए बैठक में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस ने खुद ही कहा है कि वह डीएमके से अलग हो रही है। फिर हम इंडी गठबंधन में कैसे बने रह सकते हैं। हमारे गठबंधन में जीतकर आए उनके पांच विधायक हैं, हमने उन्हें राज्यसभा की एक सीट भी दी थी लेकिन उसके बाद भी वह हमारे नेता को धन्यवाद तक देने नहीं आए। डीएमके ने यह भी दावा किया कि इंडी गठबंधन के गठन और संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वह शुरुआत से ही इस विपक्षी गठबंधन के प्रमुख स्तंभों में से एक रही है। डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं और गठबंधन में उनके योगदान को अन्य दलों ने भी स्वीकार किया है। कांग्रेस के पाला बदलने के इस कदम को डीएमके नेताओं ने धोखा और पीठ में छुरा घोंपना बताया है। उनका कहना है कि जब पाटी को उनके साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी तब कांग्रेस ने सत्ता के लिए पुराना गठबंधन तोड़ दिया। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता और डीएमके यूथ विंग के सेक्रेटरी उदयानिधि स्टालिन ने कहा कि डीएमके कांग्रेस के धोखे को कभी नहीं भूलेगी। दोनों दलों के बीच यह कड़वाहट संसद के अदंर भी दिखाई देगी। डीएमके सांसद कनिमोझी ने बदले राजनीतिक हालात का हवाला देते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर सीटिंग अरेंजमेंट बदलने का अनुरोध किया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा सचिवालय ने डीएमके सांसदों को सदन में कांग्रेस सदस्यों से अलग बैठने की अनुमति दे दी है। हालांकि डीएमके सांसदों को अभी नई सीटें अलॉट नहीं की गई हैं। दरअसल तमिलनाडु विधानसभा के जो चुनाव परिणाम आए हैं उसने राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के समीकरण भी बदल दिए हैं। कांग्रेस ने डीएमके गठबंधन में रहकर 28 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें उसे 5 पर जीत मिली। डीएमके गठबंधन चुनाव हार गया और टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पाटी बनकर उभरी। मौका देखकर कांग्रेस ने दो कैबिनेट मंत्री पदों के बदले जोसेफ विजय की सरकार को समर्थन दे दिया जिसका असर इंडी गठबंधन पर भी पड़ा। भाजपा की चुनावी सफलताओं के चलते इंडी गठबंधन पहले ही कमजोर दिखाई दे रहा था। केरल में वाम मोर्चे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस केंद्र सरकार के खिलाफ मैदान में उसके साथ थी। कांग्रेस की यह नीति लोगों की समझ से बाहर थी। जिस स्टालिन ने इंडी गठबंधन के नेता के तौर पर राहुल का नाम आगे बढ़ाया था, राहुल उन्हें ही अकेला छोड़कर टीवीके के साथ चल दिए। नीतीश ने भी इंडी गठबंधन को अलविदा कह दिया है। ममता बंगाल की सत्ता से बाहर हो गईं। आम आदमी पाटी के लिए दिल्ली दूर हो गई। जब शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और तेजस्वी जैसे नेता सत्ता में वापसी के लिए जूझ रहे हों, ऐसे में डीएमके से दूरी बनाकर कांग्रेस ने इंडी गठबंधन को कमजोर किया है जिसका फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को मिल जाए तो किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।