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आर्थिक चिन्तन

प्रकाशित: 07-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
आर्थिक चिन्तन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसीपीएम) के सदस्यों के साथ बैठक कर वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि को तेज करने के उपायों पर चर्चा की। इस बैठक के दौरान चर्चा का मुख्य विषय जीवन की सुगमता और कारोबारी सुगमता को और अधिक बेहतर बनाने से जुड़े विभिन्न सुधारों पर भी विचार विमर्श किया गया।
दरअसल एकतरफ जहां वैश्विक स्थिरता के दौर में भी मार्च तिमाही में 7.8 व 2025-26 में 7.7 प्रतिशत की दर से अर्थव्यवस्था बढ़ी वहीं मुद्रास्फीति की जो दर 4 प्रतिशत से कम थी उसमें भी बढ़ोत्तरी हुई है। उपभोक्ता वस्तुओं में महंगाई की मार तो बढ़ी है जिसका एकमात्र कारण पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और खाना पकाने की गैस की कीमतों में वैश्विक बवाल के कारण वृद्धि है।
सच तो यह है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध लम्बा चलने की वजह से ही यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा था किन्तु अमेरिका और ईरान युद्ध ने तो सीधे ही अन्य देशों के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया। भारतीय अर्थशास्त्री पहले तो मानते थे कि भारत 40 देशों से कच्चा तेल लेता है इसलिए उसके ऊपर ईरान युद्ध से पड़ने वाला नहीं है। कदाचित भारतीय अर्थशास्त्रियों का यह आकलन सच भी साबित हो जाता किन्तु ईरान ने खाड़ी के अमेरिकी मित्र देशों पर हमले करके तथा होर्मूज स्ट्रेट से तेल लेकर जा रहे जहाजों को रोकने की वजह से सभी सम्बन्धित देशों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वास्तविकता तो यह है कि ईरान में राजनेताओं के मारे जाने के बाद इस्लामिक रिपब्लिक आमी ने दिशाहीन कार्रवाई करनी शुरू कर दी। ईरान के राजनेता सेना के इस तरह के व्यवहार का विरोध कर ही नहीं सके। ईरानी सेना ने स्वयं लक्ष्य निर्धारित किया और खुद ही फैसले लिए। यही कारण है कि जिस ईरान से भारत खुद ही तेल नहीं खरीदता था, वह ईरान भारतीय झंडा लगे जहाजों को रास्ता देने का निर्णय ले रहा था।
हैरानी की बात तो यह है कि भारत में उत्पादकता बढ़ने से वृद्धि दर बढ़ती जा रही है किन्तु वह ढांचा इस देश के पास नहीं है जो आर्थिक वृद्धि दर के बढ़ने पर उसका त्वरित लाभ आम उपभोक्ताओं एवं कारोबारियों को दे सके। आज की बैठक में सरकार की तरफ से भारतीय अर्थव्यवस्था की मौलिक मुश्किलों को हल करने की कोशिश की गई है। एक अच्छी अर्थव्यवस्था का लक्षण है कि मुद्रास्फीति की दर जब तक आर्थिक वृद्धि दर से आधी नहीं रहेगी तब तक वित्तीय आर्थिक स्थिरता का दावा नहीं किया जा सकता। यही कारण है जब किसी देश में आर्थिक वृद्धि दर भी बढ़े और मुद्रास्फीति भी बढ़े तो ऐसी अर्थव्यवस्था के सामने कई असामान्य चुनौतियां आहट देती हैं। शनिवार को प्रधानमंत्री के साथ संपन्न हुई आर्थिक सलाहकार के सदस्यों की बैठक निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है और उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार जैसे-जैसे बढ़ेगा आम उपभोक्ता और व्यवसायी दोनों को इसका लाभ मिलेगा। इसीलिए आर्थिक सलाहकार परिषद का चिन्तन देश के सभी वर्गें के जीवन को प्रभावित करने में सक्षम होगा।