सूबे की सुप्त प्राय! जांच एजेंसियों को ‘संजीवनी' की आस
प्रकाशित: 21-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आनन्द उपाध्याय ‘सरस'
विगत दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में प्रदेश के मुख्य मंत्री से आग्रह किया कि वह स्वीकार करें कि अब समय आ गया है जब राज्य सरकार को सुपीरियर रिस्पांस्बिलिटी (वरिष्ठ जिम्मेदारी) का सिद्धांत विकसित करना चाहिए। इसके अन्तर्गत अधीनस्थों के भ्रष्टाचार, लापरवाही व विविध स्तरीय अदालती आदेशों की अवहेलना करने पर उनके वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रशासनिक और आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
यह संवेदनशील टिप्पणी जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक याचिका को स्वीकार करते हुवे की। दूसरी ओर इसी उच्च न्यायालय ने मेरठ विकास प्राधिकरण से संबंधित प्लाट आवंटन सेजुड़े एक मामले में आवंटन की कारवाई को निरस्त करते हुवे प्रकरण की जांच विजिलेंस से कराये जाने का आदेश देते हुए यह कठोर टिप्पणी व्यक्त की कि भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है। देश में निष्ठावान लोगों की संख्या घटती जा रही है। ईमानदार लोग विलुप्त प्राणी बनते जा रहे हैं। इनके संरक्षण की आवश्यकता है। कोर्ट ने सरकार को ईमानदारों और निष्ठावान लोगों को प्रोत्साहित करने की प्रभावी योजना पर अमल करने व भ्रष्टाचारियों को सूबे में संचालित जांच एजेंसियों के तहत समयबद्ध तरीके से दण्डित करने की कार्यवाई करने का निर्देश दिया है। ज्ञातव्य हो कि समय - समय पर अनेक मामलों की सुनवाई के अवसर पर अदालतों ने राज्य सरकार को इंगित कर तीखी टिप्पणियां की हैं।
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के नाम से स्वतंत्र राज्य के स्वरूप में अस्तित्व में आने के बाद से ही सूबे में भ्रष्टाचार उन्मूलन की प्रभावी कारवाई हेतु संस्थापित विभागों/ जांच एजेंसियों की एक लंबी फेहरिश्त कायम की गई। इनमें प्रमुख रूप से लोकायुक्त/राजस्व व विशिष्ट अभिसूचना/सतर्कता आयोग/उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान/भ्रष्टाचार निवारण संगठन /स्पेशल इनवेस्टिगेशन ब्यूरो सहकारिता/आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन/विशेष जांच महानिदेशालय/स्पेशल इनवेस्टि गेशन ब्यूरो (खाद्य प्रकोष्ठ)/ हाईडिल इत्यादि विभाग उल्लेखनीय हैं।
सूबे के आम नागरिक के मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है कि आख़िरकार भ्रष्टाचार के उन्मूलन अथवा नियंत्रण के मूल उद्देश्य से सुस्थापित इन दर्जनों विभागों/संस्थानों/आयोगों की क्या कोई सार्थक और परिणामोन्मुखी भूमिका चरितार्थ हो पाई है! अथवा यह सभी औपचारिक रस्म अदायगी के तहत यदा-कदा अपनी उपादेयता सिद्ध करते परिलक्षित होते हैं।
प्रथम बार मुख्य मंत्री पद की शपथ लेते ही योगी आदित्य नाथ ने अपनी दृढ़संकल्पित मनोवृत्ति उजागर करते हुवे सुस्पष्ट घोषणा की थी प्रदेश में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेन्स की नीति अपनाई जाएगी। दूसरे कार्यकाल में भी उनका मन्तव्य वही है।
बीते दिनों राजधानी लखनऊ में विजिलेंस (सतर्कता अधिष्ठान) ने भ्रष्टाचार के लम्बित मामले में बड़ी कारवाई करते हुए एक प्रमोटेड रिटायर्ड एआरटीओ के आवास पर छापा मारकर कुल 35 करोड़ रूपये की चल-अचल परिसम्पत्ति का पता लगाया है। मौके पर 13 किलो सोना समेत 20 करोड़ रूपये की चल सम्पत्ति बरामद की है! घर के कोनों में छिपाकर रखे गए डेढ़ करोड़ से ज्यादा रूपये भी इनमें शामिल हैं। घर से अनेक सम्पत्तियों के दस्तावेज भी बरामद बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि विजिलेंस ने आय से अधिक सम्पत्ति के आरोपों से घिरे प्रमोटी एआरटीओ को गिरफ्तार कर लिया है।
ज्ञातव्य हो कि राज्य सरकार सूबे के भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों व कार्मिकों पर अपना शिकंजा कसने जा रही है! हालिया एआरटीओ के प्रकरण के सामने आने पर उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों को गंभीरतापूर्वक संज्ञान लिये जाने के संकेत मिल रहे हैं! माना जा रहा है कि सूबे में सरकार की अप्रत्यक्ष किरकिरी कराने वाले भ्रष्टाचार व कदाचार के मामलों को पूरी शिद्दत के साथ लेते हुवे बड़ी संभावित कारवाई किये जाने की व्यूह रचना की जा रही है। सरकार के स्तर से पूर्व में शुरू कराई गयी अनेक खुली जांचों में आय से अधिक सम्पत्ति के दोषी पाए गये अधिकारियों व कार्मिकों के खिलाफ प्रस्तावित कारवाई कर दण्डित करवाने के साथ वर्षों से लम्बित मामलों की धूल खाती फाईलों व कछुआ गति की जांच पड़ताल को गति मिल सकेगी यह आशा की जानी चाहिए। इस लेख के लेखक को अपने प्रदेश सरकार के सार्वजनिक उपक्रम में सेवारत रहने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री के स्तर से आदेशित खुली जांच में जोकि उपक्रम के कथित भृष्टाचार की जांच में हटाए गये आईएएस अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई थी, में तकनीकी सहयोग हेतु कतिपय समयावधि हेतु सम्बद्ध किये जाने पर लखनऊ विजिलेंस (हाईडिल सेल) में जांच प्रकिया को महसूस करने का अवसर प्राप्त हुआ था। दरअसल सामान्य पुलिस प्रशासन से स्थानांतरित उप निरीक्षक/निरीक्षक अपनी विजिलेंस में पोस्टिंग को मानो! सजा के तौर पर अभिव्यक्त करते परिलक्षित होते हैं। कुछ प्रतिशत को छोड़कर ज्यादातर पुन पोस्टिंग की जुगत में समय काटते अवलोकनीय नजर आते हैं। कभी कभार किसी जांच विशेष में कप्तान या डीजी विजिलेंस के संज्ञान लेने पर कारवाई कदाचित आगे बढ़ती दृष्टिगत होती है। वरना स्टील के विशालकाय बक्सों में पत्रावलियां, अभिलेख/सम्पत्ति के दस्तावेज/पासबुक आदि बंद पड़ी दृष्टिगोचर होती हैं।
दूसरा शिगूफा यह भी है कि कदाचित समर्पित विजिलेंस निरीक्षक मन लगाकर जांच पड़ताल पूरी कराकर जब साक्ष्य सहित अपनी आख्यान महानिदेशक विजिलेंस के तहत आगे कारवाई हेतु अग्रसारित करते हैं तो आईएएस लाबी की कारगुजारी आड़े आने लगती है। जब विधिक परीक्षण के नाम पर फाईल चकरघिन्नी बन अन्तत शिथिल गति से अधोगति? को ही प्राप्त नजर आती है।जब जांच महानिदेशक स्तर से अनुमोदित होती है तो आखिरकार प्रमुख सचिव सतर्कता के माध्यम से अवलोकन की तथाकथित प्रणाली कितनी औचित्यपूर्ण कही जा सकती है। प्रश्न तो यह है कि जब एक अदना सा एआरटीओ इतनी अकूत चल-अचल सम्पत्ति डकार कर बैठा नजर आता है तो सूबे के अनेक कथित मलाईदार महकमों के हेड ऑफ डिपार्टमेंट रहे वरिष्ठ पीसीएस /आईएएस/पीपीएस/आईपीएस और अधीनस्थ विविध सेवाओं के अधिकारियों व कर्मचारियों की राजधानी लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, कथित रूप से सुस्थापित फार्म हाउस व अचल सम्पत्तियों, अट्टालिकाओं पर भी कभी विजिलेंस या ईओडब्ल्यू विभाग की दृष्टि पड़ पाती होगी? प्रदेश के कथित मलाईदार प्राधिकरणों, परिवहन, जीएसटी, राजस्व, नगर निगमों, रजिस्ट्रेशन जैसे आम जनता से जुड़ाव वाले विभागों मंत क्या स्वत संज्ञान लेकर रैंडम प्रकरण की जांच पड़ताल नहीं की जा सकती? यह विचारणीय प्रश्न है।
ईओडब्ल्यू भी शिद्दत के साथ अपनी उपादेयता सिद्ध कर सकता है। बीते दिनों इस विंग ने सूबे के चित्रकूट में विशिष्ट मंडी स्थल कर्वी के निर्माण में कथित रूप से आठ करोड़ रूपये गबन के प्रकरण में मुख्य आरोपी मंडी परिषद बांदा के तत्कालीन उप निदेशक (निर्माण) और सहायक लेखा अधिकारी को गिरफ्तार किया है। कोर्ट मंा पेशी के बाद जेल भेज दिया है। विजिलेंस की साख किसी से कम नहीं है! जरूरत इच्छा शक्ति और दायित्वबोध की है। सुप्रीम कोर्ट ने बीते सप्ताह नोएडा में भूमि अधिग्रहण के बदले संबंधित किसानों को अतिरिक्त मुआवजा देने से जुड़े मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार की विजिलेंस इकाई को सौंप दी है। तीन माह मे समयबद्ध जांच पूरी करनी है।
उत्तर प्रदेश के कर्मठ और स्वच्छ छवि तथा कठोर प्रशासन के लिए अपनी मौलिक पहचान सुस्थापित करने वाले मुख्यमंत्री जहां सूबे के 75 जनपदों के मुख्यालयों, तहसीलों तक में नियमित रूप से स्थलीय उपस्थिति दर्ज करवाकर विकास कार्यों की अलख जगाने मे समर्पित हैं।
दूसरी ओर सूबे की कार्यपालिका के वरिष्ठ नौकरशाहों को भी अपने वातानुकूलित चैम्बर्स से बाहर निकलकर फील्ड में जाकर औचक निरीक्षण करना चाहिए। खासकर भ्रष्टाचार और लापरवाही से संक्रमित मशीनरी को और प्रभावी रूप से दुरूस्त करना समय की मांग है। वरना औद्योगिक विकास और जीडीपी तथा टैक्स कलेक्शन में देश में शीर्ष राज्यों में शामिल यू पी को भ्रष्टाचार का घुन कमजोर करता न परिलक्षित होवे? आए दिन सूबे के अखबारों की सुर्खियां मुख्य मंत्री जी के अथक परिश्रम और ऊर्जावान समर्पण को मुहं चिढ़ाती नजर आती हैं! कुछ की बानगी अवलोकनीय है-
भ्रष्टाचार में एआरटीओ व पीटीओ समेत आठ पर केस, दो गिरफ्तार रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर के यहां14 करोड़ की संपत्ति मिली/बलिया खाद्यान्न घोटाले में पूर्व वीडीओ गिरफ्तार/पशुओं के लिए भूसे की खरीद जिलों में अलग-अलग दरों पर/राज्य कर उपायुक्त 6 करोड़ आईटीसी देने पर निलंबित/पांच हजार करोड़ से बनी आऊटर रिंग रोड की गुणवत्ता पर, सवाल/महिला तहसीलदार ने आईएएस अफसर पर लगाए गंभीर आरोप/आयुष महानिदेशक बोलीं सारे तबादले नियम विरुद्ध/डार्क रूम सहायकों की भर्ती में हुई फर्जी वाड़े की शासन द्वारा जांच शुरू/चित्रकूट कोषागार घोटाले में दो निलंबित, दो और गिरफ्तार/ मुरादाबाद जीएसटी घोटाले की जांच को एस आई टी गठित/प्रवक्ता पदोन्नति में तीन आईएएस तलब होंगे/आयुष्मान के पोर्टल में सेंध लगा 300 फर्जी कार्ड बनाए/फर्जी हस्ताक्षर से फ्लैटों का आवंटन, पांच पर मुकदमा/सीतापुर में एसडीएम का पेशकार घूस लेते गिरफ्तार/आशियाना थाने के लिए मिली करोड़ों की जमीन नहीं बचा पाई पुलिस/महिला अधिकारी आय से अधिक सम्पत्ति की दोषी/बर्खास्त समाज कल्याण अधिकारी के दो वाहन किए गये कुर्क मुख्य मंत्री जी अनवरत जनपदीय दौरों सहित लखनऊ और गोरखपुर में जहां जनता दर्शन में सैंकड़ों लोगों की समस्याओं को मौके पर सुनने के साथ ही त्वरित समाधान करवाने का सराहनीय सद्कार्य करते परिलक्षित होते हैं। यदि 18 मंडलों के कमिश्नर और 75 जिला मजिस्ट्रेट बातर्ज सीएम कार्यालयों में सीमित समय बैठकर नियमित फील्ड विजिट पर औचक निरीक्षण करें तो विधायिका और कार्यपालिका का समुच्चय आशातीत परिणाम देने में सहायक सिद्ध हो सकेगा। यदि राजस्व विभाग मुख्यमंत्री के यथा निर्देश कि बख्शे न जाएं जमीन कब्जाने वाले, कारवाई ऐसी हो जो उदाहरण बने पर पूरी गंभीरतापूर्वक कारवाई करें तो जहां अदालतों में भूमि कब्जे के मामलों पर रोकथाम लगेगी वहीं आम जनमानस को राहत मिलेगी।
गृह मंत्रालय सहित अन्य संबंधी विभागाध्यक्ष यदि कमर कस कर सूबे की कदाचित शिथिल प्राय जांच एजेन्सियों को समयबद्ध और परिणामोन्मुखी रिजल्ट देने का सघन अभियान संचालित करें तो यह प्रदेश में जहां भ्रष्ट और अकर्मण्य अधिकारियों व कार्मिकों को बाहर का रास्ता दिखाकर आम जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने वाले तत्वों से निजात पा सकेगा वहीं उत्तर प्रदेश वास्तविक तौर पर उत्तम प्रदेश के रूप में देश के सर्वोच्च राज्यों के क्रम में अव्वल पायदान पर सुशोभित होकर 25 करोड़ निवासियों के गौरव और मनोबल में और भी अभिवृद्धि प्रदान करेगा।
(लेखक साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार व टिप्पणीकार हैं।)
विगत दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में प्रदेश के मुख्य मंत्री से आग्रह किया कि वह स्वीकार करें कि अब समय आ गया है जब राज्य सरकार को सुपीरियर रिस्पांस्बिलिटी (वरिष्ठ जिम्मेदारी) का सिद्धांत विकसित करना चाहिए। इसके अन्तर्गत अधीनस्थों के भ्रष्टाचार, लापरवाही व विविध स्तरीय अदालती आदेशों की अवहेलना करने पर उनके वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रशासनिक और आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
यह संवेदनशील टिप्पणी जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक याचिका को स्वीकार करते हुवे की। दूसरी ओर इसी उच्च न्यायालय ने मेरठ विकास प्राधिकरण से संबंधित प्लाट आवंटन सेजुड़े एक मामले में आवंटन की कारवाई को निरस्त करते हुवे प्रकरण की जांच विजिलेंस से कराये जाने का आदेश देते हुए यह कठोर टिप्पणी व्यक्त की कि भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है। देश में निष्ठावान लोगों की संख्या घटती जा रही है। ईमानदार लोग विलुप्त प्राणी बनते जा रहे हैं। इनके संरक्षण की आवश्यकता है। कोर्ट ने सरकार को ईमानदारों और निष्ठावान लोगों को प्रोत्साहित करने की प्रभावी योजना पर अमल करने व भ्रष्टाचारियों को सूबे में संचालित जांच एजेंसियों के तहत समयबद्ध तरीके से दण्डित करने की कार्यवाई करने का निर्देश दिया है। ज्ञातव्य हो कि समय - समय पर अनेक मामलों की सुनवाई के अवसर पर अदालतों ने राज्य सरकार को इंगित कर तीखी टिप्पणियां की हैं।
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के नाम से स्वतंत्र राज्य के स्वरूप में अस्तित्व में आने के बाद से ही सूबे में भ्रष्टाचार उन्मूलन की प्रभावी कारवाई हेतु संस्थापित विभागों/ जांच एजेंसियों की एक लंबी फेहरिश्त कायम की गई। इनमें प्रमुख रूप से लोकायुक्त/राजस्व व विशिष्ट अभिसूचना/सतर्कता आयोग/उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान/भ्रष्टाचार निवारण संगठन /स्पेशल इनवेस्टिगेशन ब्यूरो सहकारिता/आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन/विशेष जांच महानिदेशालय/स्पेशल इनवेस्टि गेशन ब्यूरो (खाद्य प्रकोष्ठ)/ हाईडिल इत्यादि विभाग उल्लेखनीय हैं।
सूबे के आम नागरिक के मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है कि आख़िरकार भ्रष्टाचार के उन्मूलन अथवा नियंत्रण के मूल उद्देश्य से सुस्थापित इन दर्जनों विभागों/संस्थानों/आयोगों की क्या कोई सार्थक और परिणामोन्मुखी भूमिका चरितार्थ हो पाई है! अथवा यह सभी औपचारिक रस्म अदायगी के तहत यदा-कदा अपनी उपादेयता सिद्ध करते परिलक्षित होते हैं।
प्रथम बार मुख्य मंत्री पद की शपथ लेते ही योगी आदित्य नाथ ने अपनी दृढ़संकल्पित मनोवृत्ति उजागर करते हुवे सुस्पष्ट घोषणा की थी प्रदेश में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेन्स की नीति अपनाई जाएगी। दूसरे कार्यकाल में भी उनका मन्तव्य वही है।
बीते दिनों राजधानी लखनऊ में विजिलेंस (सतर्कता अधिष्ठान) ने भ्रष्टाचार के लम्बित मामले में बड़ी कारवाई करते हुए एक प्रमोटेड रिटायर्ड एआरटीओ के आवास पर छापा मारकर कुल 35 करोड़ रूपये की चल-अचल परिसम्पत्ति का पता लगाया है। मौके पर 13 किलो सोना समेत 20 करोड़ रूपये की चल सम्पत्ति बरामद की है! घर के कोनों में छिपाकर रखे गए डेढ़ करोड़ से ज्यादा रूपये भी इनमें शामिल हैं। घर से अनेक सम्पत्तियों के दस्तावेज भी बरामद बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि विजिलेंस ने आय से अधिक सम्पत्ति के आरोपों से घिरे प्रमोटी एआरटीओ को गिरफ्तार कर लिया है।
ज्ञातव्य हो कि राज्य सरकार सूबे के भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों व कार्मिकों पर अपना शिकंजा कसने जा रही है! हालिया एआरटीओ के प्रकरण के सामने आने पर उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों को गंभीरतापूर्वक संज्ञान लिये जाने के संकेत मिल रहे हैं! माना जा रहा है कि सूबे में सरकार की अप्रत्यक्ष किरकिरी कराने वाले भ्रष्टाचार व कदाचार के मामलों को पूरी शिद्दत के साथ लेते हुवे बड़ी संभावित कारवाई किये जाने की व्यूह रचना की जा रही है। सरकार के स्तर से पूर्व में शुरू कराई गयी अनेक खुली जांचों में आय से अधिक सम्पत्ति के दोषी पाए गये अधिकारियों व कार्मिकों के खिलाफ प्रस्तावित कारवाई कर दण्डित करवाने के साथ वर्षों से लम्बित मामलों की धूल खाती फाईलों व कछुआ गति की जांच पड़ताल को गति मिल सकेगी यह आशा की जानी चाहिए। इस लेख के लेखक को अपने प्रदेश सरकार के सार्वजनिक उपक्रम में सेवारत रहने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री के स्तर से आदेशित खुली जांच में जोकि उपक्रम के कथित भृष्टाचार की जांच में हटाए गये आईएएस अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई थी, में तकनीकी सहयोग हेतु कतिपय समयावधि हेतु सम्बद्ध किये जाने पर लखनऊ विजिलेंस (हाईडिल सेल) में जांच प्रकिया को महसूस करने का अवसर प्राप्त हुआ था। दरअसल सामान्य पुलिस प्रशासन से स्थानांतरित उप निरीक्षक/निरीक्षक अपनी विजिलेंस में पोस्टिंग को मानो! सजा के तौर पर अभिव्यक्त करते परिलक्षित होते हैं। कुछ प्रतिशत को छोड़कर ज्यादातर पुन पोस्टिंग की जुगत में समय काटते अवलोकनीय नजर आते हैं। कभी कभार किसी जांच विशेष में कप्तान या डीजी विजिलेंस के संज्ञान लेने पर कारवाई कदाचित आगे बढ़ती दृष्टिगत होती है। वरना स्टील के विशालकाय बक्सों में पत्रावलियां, अभिलेख/सम्पत्ति के दस्तावेज/पासबुक आदि बंद पड़ी दृष्टिगोचर होती हैं।
दूसरा शिगूफा यह भी है कि कदाचित समर्पित विजिलेंस निरीक्षक मन लगाकर जांच पड़ताल पूरी कराकर जब साक्ष्य सहित अपनी आख्यान महानिदेशक विजिलेंस के तहत आगे कारवाई हेतु अग्रसारित करते हैं तो आईएएस लाबी की कारगुजारी आड़े आने लगती है। जब विधिक परीक्षण के नाम पर फाईल चकरघिन्नी बन अन्तत शिथिल गति से अधोगति? को ही प्राप्त नजर आती है।जब जांच महानिदेशक स्तर से अनुमोदित होती है तो आखिरकार प्रमुख सचिव सतर्कता के माध्यम से अवलोकन की तथाकथित प्रणाली कितनी औचित्यपूर्ण कही जा सकती है। प्रश्न तो यह है कि जब एक अदना सा एआरटीओ इतनी अकूत चल-अचल सम्पत्ति डकार कर बैठा नजर आता है तो सूबे के अनेक कथित मलाईदार महकमों के हेड ऑफ डिपार्टमेंट रहे वरिष्ठ पीसीएस /आईएएस/पीपीएस/आईपीएस और अधीनस्थ विविध सेवाओं के अधिकारियों व कर्मचारियों की राजधानी लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, कथित रूप से सुस्थापित फार्म हाउस व अचल सम्पत्तियों, अट्टालिकाओं पर भी कभी विजिलेंस या ईओडब्ल्यू विभाग की दृष्टि पड़ पाती होगी? प्रदेश के कथित मलाईदार प्राधिकरणों, परिवहन, जीएसटी, राजस्व, नगर निगमों, रजिस्ट्रेशन जैसे आम जनता से जुड़ाव वाले विभागों मंत क्या स्वत संज्ञान लेकर रैंडम प्रकरण की जांच पड़ताल नहीं की जा सकती? यह विचारणीय प्रश्न है।
ईओडब्ल्यू भी शिद्दत के साथ अपनी उपादेयता सिद्ध कर सकता है। बीते दिनों इस विंग ने सूबे के चित्रकूट में विशिष्ट मंडी स्थल कर्वी के निर्माण में कथित रूप से आठ करोड़ रूपये गबन के प्रकरण में मुख्य आरोपी मंडी परिषद बांदा के तत्कालीन उप निदेशक (निर्माण) और सहायक लेखा अधिकारी को गिरफ्तार किया है। कोर्ट मंा पेशी के बाद जेल भेज दिया है। विजिलेंस की साख किसी से कम नहीं है! जरूरत इच्छा शक्ति और दायित्वबोध की है। सुप्रीम कोर्ट ने बीते सप्ताह नोएडा में भूमि अधिग्रहण के बदले संबंधित किसानों को अतिरिक्त मुआवजा देने से जुड़े मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार की विजिलेंस इकाई को सौंप दी है। तीन माह मे समयबद्ध जांच पूरी करनी है।
उत्तर प्रदेश के कर्मठ और स्वच्छ छवि तथा कठोर प्रशासन के लिए अपनी मौलिक पहचान सुस्थापित करने वाले मुख्यमंत्री जहां सूबे के 75 जनपदों के मुख्यालयों, तहसीलों तक में नियमित रूप से स्थलीय उपस्थिति दर्ज करवाकर विकास कार्यों की अलख जगाने मे समर्पित हैं।
दूसरी ओर सूबे की कार्यपालिका के वरिष्ठ नौकरशाहों को भी अपने वातानुकूलित चैम्बर्स से बाहर निकलकर फील्ड में जाकर औचक निरीक्षण करना चाहिए। खासकर भ्रष्टाचार और लापरवाही से संक्रमित मशीनरी को और प्रभावी रूप से दुरूस्त करना समय की मांग है। वरना औद्योगिक विकास और जीडीपी तथा टैक्स कलेक्शन में देश में शीर्ष राज्यों में शामिल यू पी को भ्रष्टाचार का घुन कमजोर करता न परिलक्षित होवे? आए दिन सूबे के अखबारों की सुर्खियां मुख्य मंत्री जी के अथक परिश्रम और ऊर्जावान समर्पण को मुहं चिढ़ाती नजर आती हैं! कुछ की बानगी अवलोकनीय है-
भ्रष्टाचार में एआरटीओ व पीटीओ समेत आठ पर केस, दो गिरफ्तार रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर के यहां14 करोड़ की संपत्ति मिली/बलिया खाद्यान्न घोटाले में पूर्व वीडीओ गिरफ्तार/पशुओं के लिए भूसे की खरीद जिलों में अलग-अलग दरों पर/राज्य कर उपायुक्त 6 करोड़ आईटीसी देने पर निलंबित/पांच हजार करोड़ से बनी आऊटर रिंग रोड की गुणवत्ता पर, सवाल/महिला तहसीलदार ने आईएएस अफसर पर लगाए गंभीर आरोप/आयुष महानिदेशक बोलीं सारे तबादले नियम विरुद्ध/डार्क रूम सहायकों की भर्ती में हुई फर्जी वाड़े की शासन द्वारा जांच शुरू/चित्रकूट कोषागार घोटाले में दो निलंबित, दो और गिरफ्तार/ मुरादाबाद जीएसटी घोटाले की जांच को एस आई टी गठित/प्रवक्ता पदोन्नति में तीन आईएएस तलब होंगे/आयुष्मान के पोर्टल में सेंध लगा 300 फर्जी कार्ड बनाए/फर्जी हस्ताक्षर से फ्लैटों का आवंटन, पांच पर मुकदमा/सीतापुर में एसडीएम का पेशकार घूस लेते गिरफ्तार/आशियाना थाने के लिए मिली करोड़ों की जमीन नहीं बचा पाई पुलिस/महिला अधिकारी आय से अधिक सम्पत्ति की दोषी/बर्खास्त समाज कल्याण अधिकारी के दो वाहन किए गये कुर्क मुख्य मंत्री जी अनवरत जनपदीय दौरों सहित लखनऊ और गोरखपुर में जहां जनता दर्शन में सैंकड़ों लोगों की समस्याओं को मौके पर सुनने के साथ ही त्वरित समाधान करवाने का सराहनीय सद्कार्य करते परिलक्षित होते हैं। यदि 18 मंडलों के कमिश्नर और 75 जिला मजिस्ट्रेट बातर्ज सीएम कार्यालयों में सीमित समय बैठकर नियमित फील्ड विजिट पर औचक निरीक्षण करें तो विधायिका और कार्यपालिका का समुच्चय आशातीत परिणाम देने में सहायक सिद्ध हो सकेगा। यदि राजस्व विभाग मुख्यमंत्री के यथा निर्देश कि बख्शे न जाएं जमीन कब्जाने वाले, कारवाई ऐसी हो जो उदाहरण बने पर पूरी गंभीरतापूर्वक कारवाई करें तो जहां अदालतों में भूमि कब्जे के मामलों पर रोकथाम लगेगी वहीं आम जनमानस को राहत मिलेगी।
गृह मंत्रालय सहित अन्य संबंधी विभागाध्यक्ष यदि कमर कस कर सूबे की कदाचित शिथिल प्राय जांच एजेन्सियों को समयबद्ध और परिणामोन्मुखी रिजल्ट देने का सघन अभियान संचालित करें तो यह प्रदेश में जहां भ्रष्ट और अकर्मण्य अधिकारियों व कार्मिकों को बाहर का रास्ता दिखाकर आम जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने वाले तत्वों से निजात पा सकेगा वहीं उत्तर प्रदेश वास्तविक तौर पर उत्तम प्रदेश के रूप में देश के सर्वोच्च राज्यों के क्रम में अव्वल पायदान पर सुशोभित होकर 25 करोड़ निवासियों के गौरव और मनोबल में और भी अभिवृद्धि प्रदान करेगा।
(लेखक साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार व टिप्पणीकार हैं।)