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हमारी हिन्दू अस्मिता-हमारा गौरव

प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. प्रवेश कुमार
हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरावरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्षतेर्|ि भारत का परिचय देने वाला संस्कृत का यह सुभाषित बता देता है कि हिमालय से लेकर वह दक्षिण के समुद्र तक कोई भूमि है जो देवताओं के द्वारा निर्मित है तो वह है भारत भूमि जिसे हिन्दू भूमि कहा जाता है। यह हिन्दू भारत की पहचान है जो दुनिया के प्रति एक सम्यक् दृष्टि को रखता है तभी तो हमारा ऋषि कहता है-अयं निज परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तुवसुधैवकुटुम्बकम्? अर्थ - यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त (सङ्कुचित मन) वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।
हम कहते है, कि यह दुनिया एक परिवार है हमारे सुख-दुख सब साँझे है। स्वामी विवेकानन्द जी कहते है कि ‘वह समय जहाँ से हम अपना और पराया का विचार लाते है वही से समस्या का जन्म होता है'। इसी लिए विश्व में परस्पर सह-अस्तित्व के विचार के असल प्रचारक हमारी हिन्दू संस्कृति ही है। हम हिन्दू ही है जिसने सब में अपने को देखा और उसमे अपना साक्षात्कार किया, यह हम ही है और हमारी हिन्दू संस्कृति ही है। जिसने कभी भी भिन्न पूजा पद्धति के आधार पर दुनिया में कहीं पर भी नरसंहार नहीं किया। यह हिन्दू ही है जिसने यह भी कह दिया कि आपकी पूजा पद्धति कुछ भी हो, फिर भी आप हिन्दू ही हैं।
हमारा वैदिक ऋषि कहता है ‘एकम सत् विप्रा बहुदा वदान्ति' जिसके अर्थ की व्याख्या कि जाये तो ज्ञात होता है कि ‘सत्य तो एक ही है'' उसे बताने वाले विद्वानों ने भिन्न-भिन्न तरीको से उसे बताया है। भारत की हिन्दू शक्ति अपने गौरव पूर्ण परंपरा इतिहास का स्मरण करते ही अपने को गौरवान्वित महसूस कराती है। इसी गौरव को दबाने का प्रयास विदेशी आाढांताओं द्वारा समय-समय होता रहा है। लेकिन हमारे हिंदू, हिंदुत्व दर्शन विचार ने हमे सदैव इन से लड़ने का पौरुष प्रदान किया। हम जानते है, कि हमारे देव स्थानों को भारी संख्या में तोड़ा गया, हमारे भगवान की मूर्तियों को अपमानित किया गया। लेकिन हमारी हिंदुत्व की शक्ति का ही परिणाम था कि ‘आढांताओं ने हमारे मंदिर तोड़े, हमने फिर बनाये, फिर तोड़े, हमने मंदिर फिर बनाये वे नहीं तोड़ पाए तो हमारी इन मंदिरों के प्रति आस्था और उन पर विश्वास'। यह हमारा हिंदुत्व का चिंतन ही है जो भूमि को भी अपनी माता मानता है। हम अपनी भारतभूमि को माता कहते हैं। यह मातृभूमि जो हमें सब कुछ देती है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव आना ही उसको माँ के आसन पर बैठा देता है। यही विचार हमे विश्व के दर्शन और चिंतन से भिन्न करता है। वही हम देखे तो हमारे लिए राष्ट्र की संकल्पना कोई भौगोलिक सीमा, पुजा पद्धति, नस्ल, रंग आदि नहीं है बल्कि हमारा राष्ट्र तो हमारे भीतर जीता जागता जीवन है। इसी को स्वामी राम तीर्थ बताते हुए कहते है कि ‘यह भारत मेरा शरीर है मेरा एक-एक अंग भारत का हिस्सा है, जब मैं श्वास लेता हूँ तो भारत श्वास लेता है जब मैं चलता हूँ तो भारत भी चलता है। इसलिए दुनिया में नेशन का जन्म भौतिक अवधारणा है, वहीं हम इसे सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मानते हैं। हमारा राष्ट्र किसी साम्राज्यवादी धारणा पर आधारित नहीं है बल्कि हम तो मानते है राष्ट्र का जन्म ही ‘ऋषियों की भद्र इच्छा के परिणाम स्वरूप ही होती है'।
इतिहास के पन्नो को पलटा जाये तो भारत अंग्रेजों के आने से पूर्व और मुस्लिम शासकों के भी आने से पूर्व क़ाफी उन्नत था। हमारी गुरुकुल व्यवस्था अधिक उन्नत व्यवस्था रही है, शिक्षा जन -जन तक सुलभ थी और सब तक थी, शिक्षा पूर्णत समाज और पूर्व छात्र एवं राजा के द्वारा पोषित थी। भारत में अंग्रेजों ने शिक्षा को लेकर एक सर्वेक्षण 1820-1830 के बीच किया जिसमें पाया कि भारत में प्रत्येक 400 लोगो पर एक विद्यालय है। यह बात कोई भारतीय नहीं बल्कि अंग्रेज कह रहा है बंगाल नवद्वीप विश्वविद्यालय कि एक रिपोर्ट के अनुसार 1100 विद्यार्थियों पर 150 अध्यापक थे। 1820 में बम्बई प्रेसीडेंसी के वरिष्ठ अ़फसर जी. एल. प्रेंडरगास्ट लिखते है कि ‘हमारे क्षेत्र में शायद ही कोई छोटा सा भी गाँव नहीं होगा जहाँ कोई विद्यालय नहीं है। ऐसे ही पंजाब प्रान्त के डॉ. जी.डब्ल्यू. लिटनर लिखते है की अंग्रेज़ी शासन आने से पहले भी पंजाब के लगभग हर गाँव में विद्यालय था। लेकिन ब्रिटिश बौद्धिक जमात द्वारा भारत के लिए एक सिद्धान्त गढ़ा गया जिसे उन्होंने ‘व्हाइट मेन बर्डन थ्योरी' कहा जिसका अर्थ है हम गोरे अंग्रेजों की ज़िम्मेदारी है कि इन अनपढ़ों को सभ्य बनाये। जिस भारत की ज्ञान परम्परा का लोहा दुनिया के देश मानते रहे है, जिस भारत के बारे में अमेरिकन महिला व्हिले विलोकस कहती है ‘भारत के वेदों में ज्ञान की सभी शाखाओं का उद्गम है''। वही रलिवेन्स जैसे वैज्ञानिक अपनी पुस्तक इंटर्कॉर्स बिटविन इंडिया एण्ड वेस्ट्रेन वर्ल्ड में लिखते है कि वेदों में जहाज़ों व वायुयानो का मंत्रो से स्वयं उड़ने का वर्णन है। इतना ही नही भारत की ज्ञान परम्परा और समृद्धि का बखान तमाम अंग्रेज़ी और पश्चिम जगत से आए इतिहासकार, वैज्ञानिको ने किया है इंगलेंड के लौह विशेषज्ञ डॉ. स्कॉट Qक्लिन द्वारा भारत से लाए गए इस्पात के टुकड़े की जाँच के बाद उसकी उत्कृष्टता से आश्चयचकित थे।
सन 1795 में बैंजमिन ने भी भारतीय इस्पात की प्रशंसा की वही भारत का कपड़ा उद्योग आदि की खूब ख्याति दुनिया के देशों में थी। सर जान मार्शल कहते है, कि रूई का कपड़ा बनाने का कार्य भारत में होता था जो कि पश्चिम में 2000-3000 सालों तक भी नहीं था। स्काटिश इतिहासकार मार्टिन लिखते है कि ‘जब इंग्लैंड के निवासी जंगली जीवन जीते थे, तब भी भारत का उन्नत कपड़ा यूरोप का तन ढकता था'' ऐसा ही ांस के इतिहासकार टैवनिया आदि भी कहते है। यही कारण है इस देवत्व के तत्व से पूर्ण भारत भूमि वर्षों विदेशी ताकतों के अधीन रही लेकिन उसने अपने स्वत्व को नहीं छोड़ा। भारत में मुस्लिम आढांताओं ने हमारे हिन्दू धर्म के प्रतीक मंदिर, मठों को नष्ट किया, हमारे ज्ञान के केंद्रों को नष्ट किया, लेकिन वह सब हमारे भीतर से हिन्दुत्व के भाव को कभी नहीं मिटा पाये। जिसने हमे अपने भीतर के स्व को जीवित रखा, लेकिन जब भारत में अंग्रेज आये तो उन्होंने अपने विवेचन के आधार पर भारत और भारत के जन मानस को दिग्भ्रमित करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने हमारे मंदिर तो नहीं ही तोड़े लेकिन हिन्दू समाज अपने ही धर्म को कमतर समझने लगे ऐसे भाव का जागरण करने का पूर्ण प्रयास उनके द्वारा किया गया। कभी कहा गया कि शिक्षा व्यवस्था तो भारत की ठीक है लेकिन इसमें निम्न जातियों का कोई प्रवेश नहीं जबकि भारत के हिन्दू भाव में कोई छोटा और कोई बड़ा हो ही नहीं सकता है। जब अंग्रेजों के इस मिथ को जाँचा गया कि क्या वास्तव में दलित वंचित समाज को शिक्षा नहीं मिल रही थी। तब ज्ञात होता है की ऐसा बिल्कुल भी नहीं धर्मपाल एक बड़े इतिहासकार हुए वह अंग्रेज़ी रिपोर्ट के हवाले से लिखते है कि ‘तमिल भाषी क्षेत्रों में द्विज जातियों का स्कूल प्रतिशत 13-23 है वही शूद्र जातियों का यह प्रतिशत 73 से ज़्यादा है''। इस प्रकार से हिन्दू को लेकर भारत के जन मानस के भीतर तमाम प्रकार के भ्रम को पैदा किया गया। हम सब हिन्दू है इतना कहते ही ब़ाकी सारे के सारे भेद समाप्त हो जाते है इसी भाव के जागरण का प्रयास वर्षों की लम्बी परंपरा में होता रहा है। हिन्दू भारत की पहचान है लेकिन विगत वर्षों के पराधीन काल खण्ड ने भारत के हिन्दू जनमानस के भीतर अपनी अस्मिता, अपने गौरव,अपने इतिहास के प्रति हीनभाव का संचार कुछ इस तरह कर दिया जैसे सूर्य के तेज को कुछ समय के लिये ग्रहण ढँकने का प्रयास करता हों। इसी भारत के गौरव, हिन्दू गौरव के पुनर्जागरण के कार्य में पिछले एक शतक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है।
(लेखक सहायक प्रोफेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली हैं।)