कूटनीतिक कौशल की जरूरत
प्रकाशित: 17-07-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
पाकिस्तान के सबसे बड़े राज्य बलूचिस्तान द्वारा ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान' के उदय की घोषणा खुद को बलूचों का प्रतिनिधि बताने वाले मीर यार बलोच ने 15 जुलाई को एक्स हैण्डल से घोषणा करके पाकिस्तान की परेशानी तो बढ़ाई ही साथ ही भारत की कूटनीतिक दुविधा भी बढ़ा दी है।
दरअसल बलूचिस्तान पर पाकिस्तान की पुलिस, प्रशासन और सेना तीनों की पकड़ ढीली हो चुकी है। बीएलए यानि बलूच लिबरेशन एलायंस कुछ और लड़ाके संगठनों के साथ मिलकर बलूचिस्तान में सेना और पुलिस के जवानों और अधिकारियों को भेड़-बकरियों की तरह मारते हैं किन्तु पाकिस्तान की केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई कार्रवाई उन्हें परास्त करने में सफल नहीं दिखती। बलूचिस्तान में जब बीएलए पुलिस और सेना के जवानों को मारती है, तो पाकिस्तान के शीर्ष अधिकारी उनके खिलाफ तत्काल किसी तरह की कार्रवाई के लिए तैयार नहीं होते। बीएलए ने ग्वादर एयरपोर्ट हो या खदानों का क्षेत्र हर जगह पाक सेना की पकड़ को कमजोर कर दिया है। यहां तक कि चीन के इंजीनियर और कमी अपनी जान बचाने के लिए पाक सेना से ज्यादा वे बीएलए के लड़ाकों पर भरोसा करते हैं। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें बीएलए के एजेण्टों को पैसे देने पड़ते हैं। कुल मिलाकर बलूचिस्तान के क्षेत्र में पाकिस्तान की पकड़ तो कमजोर हुई है। पिछले कुछ दिनों से पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) यानि गुलाम कश्मीर में आजादी की आग भड़कने से पाकिस्तान सरकार की मुसीबतें बढ़ गई हैं। पाकिस्तान अब गुलाम कश्मीर में भी वही गलती दोहरा रहा है जो उसने बलूचिस्तान में किया था। जब बलूचिस्तान में निर्दयतापूर्वक वहां के आम नागरिकों की हत्याएं की जाने लगीं तो पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों ने अपनी सेना को चेतावनी देते हुए कहा था कि उसने जो गलती बांग्लादेश में की थी वही गलती अब बलूचिस्तान में कर रहे हैं किन्तु सेना ने उनके खिलाफ क्रूरता और हिंसा का हथकण्डा अपनाया आज इसी का परिणाम है कि बलूचिस्तान में अलगाववाद की आंधी आई हुई है। बलूचिस्तान को पाकिस्तान यदि चाहे भी तो नियंत्रण में नहीं रख पाएगा कारण कि उनके पास ईरान से तस्करी किए हुए पेट्रोल का पैसा है जिससे वे खुले बाजार से हथियार और साजो-सामान खरीद रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने के बारे में भारत विचार क्यों करे। उल्लेखनीय है कि बीएलए ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने के बाद भारत से अनुरोध किया है कि वह ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान को मान्यता दे। अब यदि भारत बीएलए के अनुरोध को स्वीकार करके उसे मान्यता दे देता है तो भारत के लिए सबसे बड़ी मुश्किल चीन की नाराजगी के कारण होगी। अभी तो चीन बीएलए को किसी तरह सौदेबाजी करके बलूचिस्तान में कारोबार कर रहा है किन्तु यदि उसे मान्यता मिल जाएगी तो बहुत सारी मुश्किलें चीन के सामने खड़ी हो जाएंगी। फिर चीन भी भारत की मुश्किलें बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से कहकर कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र की घोषणा करा सकता है। वैसे भी पाकिस्तान अपनी कमियों को छिपाने के लिए भारत के सिर पर ठीकरा फोड़ता रहता है। वास्तविकता तो यह है कि भारत पाकिस्तान की नाराजगी की परवाह भले न करे किन्तु चीन से दुश्मनी नहीं बढ़ा सकता।
बहरहाल बलूचिस्तान की हालत यह है कि वहां के शहरी नागरिक बीएलए के साथ मिलकर आंदोलन करने से अभी भी किनारा किए हुए हैं। सशस्त्र बीएलए के साथ जिस दिन वहां की आम जनता भी पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर आ जाएगी, उसी दिन बलूचिस्तान पूरी तरह पाकिस्तान से अलग हो जाएगा।
लब्बोलुआब यह है कि भारत को जल्दबाजी में कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए। भारत को चाहिए कि वह बलूचिस्तान की हालत का बहुत ही समझदारी से आकलन करे। पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का आधिपत्य है और उनके लिए बलूचिस्तान की जनता जाहिल और असभ्य है। इसलिए वे वही गलती और ज्यादा करेंगे जो उन्होंने बांग्लादेशियों को 1971 से पहले ‘गंदे और नटबुल्ले' कहकर घृणाभाव से देखते थे। बलूचिस्तान में सेना को इस बात की परवाह कदापि नहीं है कि बलूचिस्तान अलग देश बन जाएगा। उनके लिए सेना में पंजाबियत सलामत रहे। इसीलिए भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है बलूचिस्तान आज नहीं तो कल आजाद तो होना ही है, फिर भारत अलगाववादियों का समर्थक होने का कलंक क्यों ले! भारत को अपने कूटनीतिक कौशल का परिचय देना होगा।
दरअसल बलूचिस्तान पर पाकिस्तान की पुलिस, प्रशासन और सेना तीनों की पकड़ ढीली हो चुकी है। बीएलए यानि बलूच लिबरेशन एलायंस कुछ और लड़ाके संगठनों के साथ मिलकर बलूचिस्तान में सेना और पुलिस के जवानों और अधिकारियों को भेड़-बकरियों की तरह मारते हैं किन्तु पाकिस्तान की केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई कार्रवाई उन्हें परास्त करने में सफल नहीं दिखती। बलूचिस्तान में जब बीएलए पुलिस और सेना के जवानों को मारती है, तो पाकिस्तान के शीर्ष अधिकारी उनके खिलाफ तत्काल किसी तरह की कार्रवाई के लिए तैयार नहीं होते। बीएलए ने ग्वादर एयरपोर्ट हो या खदानों का क्षेत्र हर जगह पाक सेना की पकड़ को कमजोर कर दिया है। यहां तक कि चीन के इंजीनियर और कमी अपनी जान बचाने के लिए पाक सेना से ज्यादा वे बीएलए के लड़ाकों पर भरोसा करते हैं। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें बीएलए के एजेण्टों को पैसे देने पड़ते हैं। कुल मिलाकर बलूचिस्तान के क्षेत्र में पाकिस्तान की पकड़ तो कमजोर हुई है। पिछले कुछ दिनों से पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) यानि गुलाम कश्मीर में आजादी की आग भड़कने से पाकिस्तान सरकार की मुसीबतें बढ़ गई हैं। पाकिस्तान अब गुलाम कश्मीर में भी वही गलती दोहरा रहा है जो उसने बलूचिस्तान में किया था। जब बलूचिस्तान में निर्दयतापूर्वक वहां के आम नागरिकों की हत्याएं की जाने लगीं तो पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों ने अपनी सेना को चेतावनी देते हुए कहा था कि उसने जो गलती बांग्लादेश में की थी वही गलती अब बलूचिस्तान में कर रहे हैं किन्तु सेना ने उनके खिलाफ क्रूरता और हिंसा का हथकण्डा अपनाया आज इसी का परिणाम है कि बलूचिस्तान में अलगाववाद की आंधी आई हुई है। बलूचिस्तान को पाकिस्तान यदि चाहे भी तो नियंत्रण में नहीं रख पाएगा कारण कि उनके पास ईरान से तस्करी किए हुए पेट्रोल का पैसा है जिससे वे खुले बाजार से हथियार और साजो-सामान खरीद रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने के बारे में भारत विचार क्यों करे। उल्लेखनीय है कि बीएलए ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने के बाद भारत से अनुरोध किया है कि वह ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान को मान्यता दे। अब यदि भारत बीएलए के अनुरोध को स्वीकार करके उसे मान्यता दे देता है तो भारत के लिए सबसे बड़ी मुश्किल चीन की नाराजगी के कारण होगी। अभी तो चीन बीएलए को किसी तरह सौदेबाजी करके बलूचिस्तान में कारोबार कर रहा है किन्तु यदि उसे मान्यता मिल जाएगी तो बहुत सारी मुश्किलें चीन के सामने खड़ी हो जाएंगी। फिर चीन भी भारत की मुश्किलें बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से कहकर कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र की घोषणा करा सकता है। वैसे भी पाकिस्तान अपनी कमियों को छिपाने के लिए भारत के सिर पर ठीकरा फोड़ता रहता है। वास्तविकता तो यह है कि भारत पाकिस्तान की नाराजगी की परवाह भले न करे किन्तु चीन से दुश्मनी नहीं बढ़ा सकता।
बहरहाल बलूचिस्तान की हालत यह है कि वहां के शहरी नागरिक बीएलए के साथ मिलकर आंदोलन करने से अभी भी किनारा किए हुए हैं। सशस्त्र बीएलए के साथ जिस दिन वहां की आम जनता भी पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर आ जाएगी, उसी दिन बलूचिस्तान पूरी तरह पाकिस्तान से अलग हो जाएगा।
लब्बोलुआब यह है कि भारत को जल्दबाजी में कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए। भारत को चाहिए कि वह बलूचिस्तान की हालत का बहुत ही समझदारी से आकलन करे। पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का आधिपत्य है और उनके लिए बलूचिस्तान की जनता जाहिल और असभ्य है। इसलिए वे वही गलती और ज्यादा करेंगे जो उन्होंने बांग्लादेशियों को 1971 से पहले ‘गंदे और नटबुल्ले' कहकर घृणाभाव से देखते थे। बलूचिस्तान में सेना को इस बात की परवाह कदापि नहीं है कि बलूचिस्तान अलग देश बन जाएगा। उनके लिए सेना में पंजाबियत सलामत रहे। इसीलिए भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है बलूचिस्तान आज नहीं तो कल आजाद तो होना ही है, फिर भारत अलगाववादियों का समर्थक होने का कलंक क्यों ले! भारत को अपने कूटनीतिक कौशल का परिचय देना होगा।