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नई सरकार की चुनौतियां

प्रकाशित: 09-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
नई सरकार की चुनौतियां
नेपाल में संपन्न हुए आम चुनाव के परिणाम स्तब्ध करने वाले दिख रहे हैं। रैप संगीत से राजनीति में आने वाले बालेंद्र शाह और रवि लामिछाने की अगुवाई वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने नेपाल में पुराने राजनेताओं और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया था और इस पार्टी को जेन जेड का समर्थन था। इनकी पार्टी को देश में इतना प्रचण्ड समर्थन मिला है कि पुराने सारे नेता चुनाव हार गए मात्र पुष्प कमल दहल ही अपनी सीट बचा पाए। पूर्व प्रधानमंत्रियों जैसे केपी ओली और कोइराला की पार्टियों को मतदाताओं की नाराजगी का जबरदस्त नुकसान हुआ है।
दरअसल नेपाल के संविधान के मुताबिक 275 सीटों वाले संसद में 165 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव होता है जबकि 110 सीटें ऐसी होती हैं जिन पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर सीटें मिलती हैं। अभी तक रुझानों के मुताबिक आरएसपी को 60 प्रतिशत मिलता हुआ दिख रहा है। इसका मतलब विपक्ष साफ हो रहा है। इसी के साथ यह भी सच है कि जो लोग नेपाल को कम्युनिस्ट देश बनाने का सपना देख रहे थे, वे तो गलत साबित हुए ही साथ ही जो लोग फिर से राजशाही की पुनर्स्थापना के सपने देख रहे थे उन्हें भी निराश होना पड़ा है।
भारत को काठमांडु के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह से और उनकी पार्टी आरएसपी से बहुत उम्मीद है क्योंकि वह खुद चीन को गाली देते हैं और उनकी पार्टी राष्ट्रवादी तथा व्यवहारवादी है। इस पर्वतीय देश की समस्याओं का निराकरण हो भी तभी सकता है जब राजनेता राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित हों तथा जनकांक्षाओं के प्रति प्रैगमैटिक हों। क्षेत्रीय असंतुलन की वजह से देश में अपराध और सामाजिक बुराइयां बढ़ रही हैं। आर्थिक विपन्नता और बेरोजगारी तो देश की पहचान बन चुकी है। नेता संपन्न हैं और जनता बेहद गरीब है। शिक्षण संस्थाएं यानि स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए तो देश के पास धन ही नहीं है। स्वास्थ्य के लिए भी कुछ नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि नेपाल का क्षेत्रफल और उसकी जनसंख्या को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस देश को जितना विकसित होना चाहिए था, हो न सका। इसका सबसे बड़ा कारण है नेपाल के राजनेताओं की परजीवी प्रवृत्ति। नेपाल के नेताओं ने कभी भारत को ब्लैकमेल करके पैसे लिए तो कभी चीन को भारत का नाम लेकर उनसे धन ऐंठे। इससे भारत और चीन को तो कोई नुकसान नहीं हुआ किन्तु नेपाल के नेता ही मालामाल हुए और वहां की जनता विकास और रोजगार से वंचित रही।
बहरहाल नेपाल में भारी उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी की, पर्यटन और कृषि ाढांति की जरूरत है। यदि बालेंद्र शाह और उनके साथी ब्लैकमेल की राजनीति और चीन के बहकावे से बाहर रहकर नई राह पकड़ते हैं और देश में विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रयास करते हैं तो निश्चित रूप से नेपाल भारत और चीन के बीच सह अस्तित्व की राजनीति के साथ छोटा और विकसित पहाड़ी देश बन सकता है। जितना बड़ा नेपाल है, यूरोप के उतने बड़े कई देश विकसित हैं और उनकी जनता सुखी है। किन्तु सारी प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न नेपाल आज पड़ोस के देशों में पेट पालने के लिए घरेलु और गार्ड की नौकरी करने के लिए जाना जाता है। बालेंद्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि वह अपने देश की गरीब जनता की भलाई के लिए जो उचित हो, वही करें तभी माना जाएगा कि नेपाल में वास्तविक लोकतंत्र लौटा है। लेकिन यदि अपने पूर्ववर्ती नेताओं की भांति बालेंद्र और रवि लामिछाने भी परिस्थितियों से समझौता कर लिए तो नेपाल का दुर्भाग्य होगा।