कड़वाहट के बीच संवाद और सद्भाव का संदेश
प्रकाशित: 29-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की उस सांस्कृतिक भावना का प्रतीक है, जिसमें प्रेम, विश्वास, सम्मान, जिम्मेदारी और सुरक्षा का भाव निहित है। ऐसे समय में जब सार्वजनिक जीवन में मतभेद अक्सर व्यक्तिगत कटुता और आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले लेते हैं, योग गुरु रामदेव बाबा की ओर से सांसद कंगना रनौत को राखी और मिठाई भेजना एक सकारात्मक और ध्यान आकर्षित करने वाली पहल के रूप में सामने आया है। कंगना रनौत को छोटी बहन मानकर रामदेव बाबा ने जिस तरह संवाद और नफरत से दूर रहने की बात कही है, उसका सामाजिक महत्व केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। पिछले दिनों रामदेव बाबा और कंगना रनौत के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर मतभेद और सार्वजनिक टिप्पणियां सामने आई थीं। इन टिप्पणियों ने दोनों के बीच दूरी और कड़वाहट को बढ़ाया था। लेकिन रक्षाबंधन के अवसर पर राखी और मिठाई भेजकर रामदेव बाबा ने यह संकेत दिया है कि सार्वजनिक जीवन में मतभेद स्थायी दुश्मनी का कारण नहीं बनने चाहिए। विवाद हो सकता है, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन संवाद के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। रामदेव बाबा का यह संदेश कि विवादों का समाधान संवाद से होना चाहिए और नफरत को स्थान नहीं मिलना चाहिए, आज के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में विशेष महत्व रखता है। लोकतंत्र में असहमति उसका स्वाभाविक हिस्सा है। किसी व्यक्ति के विचारों से असहमत होना और उस व्यक्ति के प्रति घृणा रखना दो अलग-अलग बातें हैं। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां विचारों की लड़ाई हो, लेकिन व्यक्ति के सम्मान की मर्यादा बनी रहे। रक्षाबंधन इस भावना को और मजबूत करता है। परंपरागत रूप से भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है, लेकिन आधुनिक समाज में इस भावना को व्यापक अर्थ देने की आवश्यकता है। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान केवल अपने परिवार की महिलाओं तक सीमित नहीं हो सकता। मां, बहन और बेटी के सम्मान की बात करने वाला समाज तभी वास्तविक रूप से सभ्य कहलाएगा, जब वह हर महिला की गरिमा और अधिकारों का समान रूप से सम्मान करे। इस दृष्टि से रामदेव बाबा का कंगना रनौत को छोटी बहन मानना एक प्रतीकात्मक संदेश भी है। सार्वजनिक जीवन में सािढय महिला के साथ वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, राजनीतिक असहमति हो सकती है और किसी मुद्दे पर तीखी बहस भी हो सकती है, लेकिन इससे महिला के सम्मान में कमी नहीं आनी चाहिए। असहमति के बीच सम्मान बनाए रखना ही लोकतांत्रिक संस्कार है। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज सोशल मीडिया के दौर में विवाद बहुत तेजी से व्यक्तिगत संघर्ष में बदल जाते हैं।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।