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जहरीली शराब पीने से मृत्यु, सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

प्रकाशित: 05-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बिहार के मोतिहारी जिले में जहरीली शराब पीने से चार लोगों की मृत्यु की घटना ने एक बार फिर राज्य में शराबबंदी की प्रभावशीलता और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के सामने आते ही राजनीतिक माहौल भी गरमा गया है और राष्ट्रीय जनता दल ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया है कि पूर्ण शराबबंदी के दावों के बावजूद अवैध शराब का कारोबार खुलेआम जारी है और प्रशासन इसे रोकने में विफल साबित हो रहा है, वहीं सरकार की ओर से हर बार की तरह सख्त कार्रवाई, जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी सजा देने की बात कही जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से हर वर्ष जहरीली शराब से मौतों की खबरें सामने आती रहती हैं, विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और अनुमानों के अनुसार बिहार में हर साल दर्जनों से लेकर कभी-कभी सैकड़ों लोगों की जान जहरीली शराब के कारण चली जाती है, जो यह संकेत देता है कि शराबबंदी के बावजूद अवैध निर्माण, तस्करी और पी का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। जहरीली शराब से मौतों के आंकड़े सरकारी रूप से 2016 से अब तक 150 से 300 के आसपास बताए जाते हैं। विपक्ष के द्वारा यह संख्या कई गुना ज्यादा बताई जाती है जैसे सारण में 2022 की घटना में 70 से ज्यादा मौतें हुई थीं मोतिहारी जैसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती रहीं जिससे नीति की असफलता पर सवाल उठे नीतीश कुमार इसे सामाजिक परिवर्तन बताते रहे और कहते रहे कि बिहार समृद्ध हुआ है लेकिन विपक्ष जैसे आरजेडी इसे गरीबों पर अत्याचार और माफिया को बढ़ावा देने वाला बताता है 2025-26 में भी राजनीतिक बहस जारी है कुछ सहयोगी दल और नेता समीक्षा या समाप्ति की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार इसे बनाए रखने पर अड़ी है कुल मिलाकर बिहार शराबबंदी भारत में सबसे सख्त प्रयोग रहा है जिसने शुरुआती सामाजिक फायदे दिए लेकिन लंबे समय में अवैध व्यापार भ्रष्टाचार और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ाए और आज भी यह राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है। शराबबंदी कानून 2016 में लागू किया गया था जिसका उद्देश्य समाज में नशाखोरी को खत्म करना और सामाजिक-आर्थिक सुधार लाना था, कुछ हद तक इसके सकारात्मक प्रभाव भी देखे गए जैसे घरेलू हिंसा और खुलेआम शराब सेवन में कमी, लेकिन इसके साथ ही काला बाज़ार, पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत के आरोप, और जहरीली शराब की घटनाएं लगातार इस नीति की कमजोरियों को उजागर करती रही हैं, वर्तमान में सरकारी तंत्र की ओर से छापेमारी, गिरफ्तारियां, विशेष अभियान और जागरूकता कार्पाम चलाए जा रहे हैं, साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों पर निगरानी बढ़ाने और पुलिस को अधिक जिम्मेदारी देने के प्रयास किए जा रहे हैं, बावजूद इसके चुनौती बनी हुई है कि जब तक अवैध आपूर्ति की जड़ें खत्म नहीं होतीं और निगरानी व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनती, तब तक इस तरह की दुखद घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल बना रहेगा और शराबबंदी की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।