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संविधान, विधि के शासन व लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा का प्रतीक

प्रकाशित: 15-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
सर्वोच्च न्यायालय में हाल ही में हुई एक घटना ने न्यायालय की गरिमा, न्यायिक अनुशासन तथा न्यायालय मंक उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के आचरण से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को पुन सामने ला दिया। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता स्वयं अपनी पैरवी कर रहा था, जिसे न्यायिक भाषा में पार्टी-इन-पर्सन कहा जाता है। सुनवाई के दौरान उसके व्यवहार ने न्यायालय के सामान्य शिष्टाचार और न्यायिक मर्यादा का गंभीर उल्लंघन किया। सुनवाई के दौरान संबंधित व्यक्ति ने स्वयं को संप्रभु बताते हुए न्यायाधीशों को न्यायिक सेवक कहकर संबोधित किया और न्यायालय से लखनऊ के एक पुलिस अधिकारी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने की मांग की। जब पीठ ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और पूछा कि क्या वह न्यायालय को निर्देश देने का प्रयास कर रहा है, तो वह उत्तेजित हो गया। उसने अपनी केस फाइल अदालत कक्ष में हवा में उछाल दी और बाहर जाते समय भारत के मुख्य न्यायाधीश के प्रति अत्यंत अपमानजनक एवं अभद्र भाषा का प्रयोग किया। इस प्रकार का व्यवहार न्यायालय की गरिमा और न्यायिक प्रािढया के लिए अनुचित माना जाता है। भारतीय न्याय व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है, चाहे वह अधिवक्ता के माध्यम से प्रस्तुत हो या स्वयं अपनी पैरवी करे। किंतु यह अधिकार न्यायालय की गरिमा, अनुशासन और शालीनता के दायित्व के साथ जुड़ा हुआ है। न्यायालय के समक्ष असहमति व्यक्त करना या न्यायिक आदेशों की कानूनी आलोचना करना स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन अपमानजनक भाषा, न्यायाधीशों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार अथवा न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करना विधि के शासन के विपरीत माना जाता है। इससे पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आर एस गवाई को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था जब एक वकील ने उनके ऊपर जूता उछाल दिया था। यह घटना भी सबको आश्चर्य में डालती है और सोचने पर मजबूर करती है कि भारत किस दिशा में जा रहा है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने इस संबंध में किसी तरह की कार्यवाही न करने का फैसला लिया था लेकिन जनता के समक्ष यह एक बड़ा मुद्दा था कि सर्वोच्च न्यायालय के जज को भी इस तरह से अपमानित किया जाने लगा तो फिर देश में क्या बचेगा। ऐसे मामलों में न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के प्रावधान प्रासंगिक हो सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति का आचरण न्यायालय की गरिमा को कम करने, न्याय प्रशासन में बाधा डालने या न्यायिक प्रािढया को प्रभावित करने वाला माना जाता है, तो न्यायालय अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है। इसी प्रकार यदि ऐसा आचरण किसी पंजीकृत अधिवक्ता द्वारा किया जाए, तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया अथवा संबंधित राज्य बार काउंसिल अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत पेशेवर आचरण के उल्लंघन के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, जिसमें चेतावनी, निलंबन या अन्य उपयुक्त कार्रवाई शामिल हो सकती है। इस प्रकरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि पीठ ने तत्काल दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय संयम और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार न्यायाधीशों ने संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके विरुद्ध स्वत संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ नहीं की। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उस परंपरा को भी रेखांकित करता है, जिसमें कानून के कठोर अनुपालन के साथ-साथ परिस्थितियों, मानवीय संवेदनाओं और न्याय के व्यापक उद्देश्य का भी संतुलित मूल्यांकन किया जाता है। यह घटना स्पष्ट करती है कि न्यायालय केवल विवादों के निस्तारण का मंच नहीं, बल्कि संविधान, विधि के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा का प्रतीक भी है। न्यायालय में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति-चाहे वह न्यायाधीश हो, अधिवक्ता, पक्षकार या स्वयं अपनी पैरवी करने वाला नागरिक सभी पर यह दायित्व है कि वे न्यायिक प्रािढया का सम्मान करें। न्यायपालिका में जनविश्वास बनाए रखने के लिए न्यायालय की मर्यादा, शिष्टाचार और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान अनिवार्य है। साथ ही, यह प्रकरण यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका आवश्यकता पड़ने पर संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए न्याय, अनुशासन और करुणा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।