वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

स्कूल सुरक्षित व स्वस्थ भविष्य की नींव रखने वाली संस्था

प्रकाशित: 03-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
हाल ही में दिल्ली के ईस्ट विनोद नगर के सर्वोदय कन्या विद्यालय में एक छात्रा को किताब न लाने के कारण उसको धूप में खड़ा कर दिया गया था जिसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ी और उसकी मृत्यु का मामला बेहद चिंताजनक है। दिल्ली एवं दिल्ली से बाहर भी ऐसी घटनाएं होती हैं जिसमें छात्रों की मृत्यु तक हो जाती है। स्कूल प्रबंधकों को समझना होगा कि स्कूल बच्चों के लिए केवल शिक्षा प्राप्त करने का स्थान नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की नींव रखने वाली संस्था है। समाचार पत्र में खबरें स्पष्ट करता है कि स्कूल प्रबंधन छात्रों की सुरक्षा स्वास्थ्य के प्रति चिंतित नहीं है और छात्रों को शारीरिक दंड देने में पीछे नहीं है। ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों की सुरक्षा केवल कक्षा के भीतर शिक्षक और स्कूल प्रबंधन तक सीमित नहीं हो सकती। स्कूल बस, कैब, वैन, गेट, खेल का मैदान, शौचालय और स्कूल से घर तक की यात्रा-हर जगह बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इन घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में देखकर आगे बढ़ जाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। असली सवाल यह है कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या केवल स्कूल प्रबंधन को जिम्मेदार मान लेना पर्याप्त है? क्या शिक्षा विभाग नियमित रूप से स्कूलों का सुरक्षा ऑडिट करता है? क्या स्कूलों में नियुक्त होने वाले शिक्षकों, ड्राइवरों, सहायकों और अन्य कर्मचारियों का पर्याप्त सत्यापन होता है? क्या बच्चों के लिए ऐसी व्यवस्था है जहां वे बिना डर के अपनी शिकायत किसी भरोसेमंद व्यक्ति तक पहुंचा सकें? बच्चे अक्सर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। विशेषकर छोटे बच्चे यह समझ भी नहीं पाते कि उनके साथ जो हो रहा है वह गलत है। इसलिए स्कूलों में बाल सुरक्षा को लेकर केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों और कर्मचारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षित करना आवश्यक है। बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप ‘गुड टच' और ‘बैड टच', सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार, तथा किसी संदिग्ध स्थिति में तुरंत माता-पिता या विश्वसनीय व्यक्ति को बताने के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
स्कूलों में शिकायत व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए जिसमें बच्चा और उसके माता-पिता बिना भय के शिकायत कर सकें। शिकायत करने वाले बच्चे को ही सवालों के कटघरे में खड़ा करने या परिवार पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति को समाप्त करना होगा। किसी भी शिकायत की निष्पक्ष और संवेदनशील जांच होनी चाहिए तथा पीड़ित बच्चे की पहचान और गरिमा की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
स्कूल परिवहन भी सुरक्षा का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। छोटी उम्र के बच्चों को स्कूल ले जाने वाले ड्राइवर और सहायक का पुलिस सत्यापन, पहचान का रिकॉर्ड, वाहन की फिटनेस, सीसीटीवी या अन्य निगरानी व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना जरूरी है। स्कूल प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई बाहरी व्यक्ति बिना अनुमति के स्कूल परिसर में प्रवेश न कर सके। बच्चों के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा, यौन दुर्व्यवहार या अमानवीय व्यवहार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनानी होगी। घटना के बाद कार्रवाई करने की बजाय ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें घटना की संभावना ही न्यूनतम हो। आखिर स्कूल ज्ञान का मंदिर कहे जाते हैं, उन्हें बच्चों के लिए भय और असुरक्षा का स्थान नहीं बनने दिया जा सकता।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।