वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

राजस्थान में भू-जल संकट गहराया, पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से स्वास्थ्य के लिए बढ़ा खतरा

प्रकाशित: 25-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
जयपुर, (भाषा)। राजस्थान गहराते भू-जल और जन स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। फ्लोराइड प्रदूषण, गिरते जलस्तर और बढ़ते रोग ने राज्य के बड़े हिस्सों को प्रभावित किया है। यह जानकारी भाजपा नेता विजय सिंह बैंसला द्वारा तैयार की गई एक भेद्यता विश्लेषण रिपोर्ट में सामने आई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान का भू-जल संकट wचक्रात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मकै हो गया है, क्योंकि समीक्षा अवधि के दौरान हर साल निकासी प्राकृतिक पुनर्भरण से अधिक रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2022 में भू-जल निकासी वार्षिक पुनर्भरण का 151 प्रतिशत तक पहुंच गई, यानी हर एक लीटर प्राकृतिक पुनर्भरण के मुकाबले 1.51 लीटर पानी निकाला गया। उस वर्ष राज्य का भू-जल अधिविकर्ष (ओवरड्राफ्ट) 4.43 अरब घन मीटर तक पहुंच गया। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में अत्यधिक दोहन वाले भूजल ब्लॉक की संख्या 2015 के 198 से बढ़कर 2022 में 219 हो गई, जबकि इसी अवधि के दौरान सुरक्षित श्रेणी वाले ब्लॉक 52 से घटकर 38 रह गए।रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉनसून से पहले भू-जल गहराई 2015 में 24.5 मीटर थी, जो 2024 में बढ़कर 28.8 मीटर हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, अब लगभग हर पांच में से चार भू-जल ब्लॉक गंभीर या अत्यधिक दोहन वाली श्रेणी में आते हैं। विश्लेषण ने खराब जल गुणवत्ता के स्वास्थ्य परिणामों पर भी ध्यान दिया। पश्चिमी राजस्थान का फ्लोराइड क्षेत्र नागौर, बाड़मेर, जालोर, जोधपुर, सीकर और झुंझुनूं सबसे अधिक प्रभावित पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सत्रह जिलों में फ्लोराइड स्तर भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की सीमा (1.5 मिलीग्रामाप्रतिलीटर) से अधिक पाया गया। नागौर में सबसे अधिक 5.8 मिलीग्रामाप्रतिलीटर दर्ज हुआ, जो सीमा से लगभग चार गुना है। आईसीएमआर से जुड़ी सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, नागौर में 68 प्रतिशत लोग डेंटल फ्लोरोसिस और 24 प्रतिशत लोग स्केलेटल फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं। लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से अस्थि क्षति, गुर्दे की बीमारियां और हृदय संबंधी तनाव हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, फ्लोराइड प्रभावित जिलों में शिशु मृत्यु दर भी अधिक पाई गई। इन जिलों में औसतन 45.9 प्रति 1000 जीवित जन्म रही, जबकि अपेक्षाकृत साफ पानी वाले जिलों में यह दर 37.5 रही। बाड़मेर में राज्य की सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर 56 प्रति 1000 जीवित जन्म दर्ज हुई। रिपोर्ट के अनुसार, नागौर, बाड़मेर, जालौर और जैसलमेर को सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 4.6 करोड़ से अधिक लोग wउच्चै या wअत्यधिकै संवेदनशीलता वाले जिलों में रहते हैं। दक्षिणी आदिवासी जिले बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ में भू-जल गुणवत्ता अपेक्षाकृत सुरक्षित पाई गई, लेकिन गरीबी, स्कूल छोड़ने और बाल विवाह की दरें अधिक हैं।
बैसला ने हाल ही में मुख्यमंत्री कार्यालय को wराजस्थान भू-जल पुनर्भरण और स्थिरता नीति 2026w शीर्षक से एक नीति पत्र भी सौंपा। इसमें प्रस्ताव है कि विधायक और सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में वार्षिक भू-जल पुनर्भरण लक्ष्य तय करें और कम से कम 30 प्रतिशत स्थानीय क्षेत्र विकास निधि पहले दो वर्षों में पुनर्भरण कार्यों पर खर्च करें। नीति पत्र में तिमाही सार्वजनिक प्रदर्शन रिपोर्ट, तृतीय-पक्ष अंकेक्षण और लक्ष्य हासिल करने वाले निर्वाचन क्षेत्रों को प्रोत्साहन देने का सुझाव है।
बैंसला ने कहा कि जल संकट का सीधा असर आर्थिक उत्पादन, जनस्वास्थ्य और दीर्घकालिक सामाजिक परिस्थितियों पर पड़ता है।
उन्होंने कहा, wमेरे विचार में हम अत्यधिक आपात स्थिति में हैं। सरकार का अधिकांश ध्यान इसी दिशा में होना चाहिए, क्योंकि पानी का सीधा संबंध स्वास्थ्य, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और सबसे महत्वपूर्ण अगली पीढ़ी से है।w
विश्लेषण ने तीन-स्तरीय रणनीति सुझाई है। पहले चरण में अगले 12 महीनों के लिए आपात उपाय जैसे फ्लोराइड निष्कासन संयंत्र, फ्लोरोसिस जांच शिविर और अत्यधिक दोहन वाले ब्लॉक में नए भूजल निकासी परमिट पर रोक। मध्यम अवधि में जिला स्तर पर भेद्यता टास्क फोर्स, एद्रीफर पुनर्भरण परियोजनाएं और ब्लॉक स्तर पर निकासी मीटरिंग और दीर्घकालिक योजना में सैटेलाइट आधारित जलभृत (एद्रीफर) प्रबंधन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण, फ्लोरोसिस पुनर्वास केंद्र और बड़े पैमाने पर ड्रिप व सप्रिंकलर सिंचाई प्रणाली अपनाने की सिफारिश की गई है।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. नरोत्तम शर्मा ने बताया कि राज्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय फ्लोरोसिस नियंत्रण कार्यक्रम संचालित है।
उन्होंने कहा, जिला अस्पतालों में मुफ्त फ्लोराइड परीक्षण उपलब्ध है और आशा व एएनएम कार्यकर्ता प्रभावित गांवों व स्कूलों में मरीजों की पहचान करते हैं। सरकार गंभीर स्केलटल फ्लोरोसिस मरीजों के लिए सुधारात्मक सर्जरी और पुनर्वास उपलब्ध कराती है तथा प्रभावित क्षेत्रों में कैल्शियम, विटामिन सी और आयरन युक्त आहार को बढ़ावा देती है।
डॉ. प्रवीण मंगलूनिया ने कहा कि फ्लोराइड युक्त पानी से जोड़ों में दर्द, दांत खराब होना और हाथ-पांव में विकृति होती है।
उन्होंने कहा, wप्रभावित क्षेत्रों में फ्लोराइड-मुक्त पेयजल की आवश्यकता है।w
भू-विज्ञानी प्रो. एम.के. पंडित ने कहा कि भू-जल स्तर लगातार गिर रहा है और इसका प्राथमिकता से समाधान करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि शहरीकरण की तेज रफ्तार इसका कारण है। बड़ी इमारतें बन रही हैं, लेकिन जल संरक्षण के "ाsस उपाय नहीं किए जा रहे।
जल संरक्षण विशेषज्ञ डॉ. एस.के. जैन ने तालाब, झील, नदियां, चेक डैम और अन्य पारंपरिक जल निकायों को पुनर्जीवित करने, गाद निकालने और भंडारण क्षमता बढ़ाने का सुझाव दिया ताकि भूजल पुनर्भरण सुधारा जा सके।