कैसे ‘जनस्वास्थ्य अभियान' बदल रहे हैं भारत की स्वास्थ्य गाथा
प्रकाशित: 24-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
असीम मिश्रा
हर सुबह भारत के किसी गाँव में एक दस्तक होती है। दरवाज़ा खुलता है। सामने खड़ी होती है एक आशा कार्यकर्ता। उसके हाथ में कोई चमत्कारी दवा नहीं होती, कोई महँगा उपकरण नहीं होता। उसके पास होता है केवल विश्वास से भरा एक संवाद। वह एक माँ को समझाती है कि बच्चे का टीका केवल एक इंजेक्शन नहीं बल्कि उसके भविष्य की सुरक्षा है।
कहीं एक एएनएम गर्भवती महिला को नियमित जाँच का महत्व बताती है। किसी विद्यालय में शिक्षक बच्चों को साबुन से हाथ धोने की आदत सिखाता है। किसी मोबाइल स्क्रीन पर उभरता एक संदेश लाखों लोगों को समय रहते रक्तचाप और मधुमेह की जाँच कराने के लिए प्रेरित करता है।
ये दृश्य सामान्य लग सकते हैं लेकिन सच यह है कि हर दिन ऐसे अनगिनत संवाद भारत में हजारों जिंदगियाँ बचाते हैं।
यही है भारत की सबसे प्रभावशाली, लेकिन सबसे कम चर्चित दवा-जनस्वास्थ्य संवाद।
चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों का इतिहास अक्सर नई दवाओं, अत्याधुनिक अस्पतालों और वैज्ञानिक खोजों के साथ लिखा जाता है। लेकिन एक और इतिहास है जो प्रयोगशालाओं में नहीं लोगों के मन में लिखा जाता है। वह इतिहास विश्वास का है। संवाद का है। व्यवहार परिवर्तन का है।
क्योंकि टीका तभी जीवन बचाता है जब कोई उसे लगवाने का निर्णय ले। अस्पताल तभी रोगी का उपचार कर सकता है जब वह समय पर वहाँ पहुँचे। कोई भी स्वास्थ्य योजना तभी सफल होती है जब समाज उसे अपना ले। चिकित्सा विज्ञान और स्वस्थ समाज के बीच जो सबसे मज़बूत सेतु है, उसका नाम है- विश्वसनीय संवाद।
भारत जैसा विशाल और विविधताओं से भरा देश इस सत्य का सबसे बड़ा उदाहरण है। 140 करोड़ से अधिक आबादी, सैकड़ों भाषाएँ, हजारों बोलियाँ, असंख्य सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएँ और हर वर्ष लगभग 2.6 करोड़ नवजात। यहाँ स्वास्थ्य संदेश केवल प्रसारित नहीं किए जाते, उन्हें समाज की संवेदनाओं, मान्यताओं और जीवनशैली के साथ संवाद स्थापित करना पड़ता है।
शायद यही कारण है कि भारत की स्वास्थ्य यात्रा केवल नीतियों की कहानी नहीं बल्कि जनभागीदारी की कहानी भी है।
तीन दशक पहले भारत में मातृत्व और शिशु मृत्यु दर दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में गिनी जाती थी। आज सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आँकड़े बताते हैं कि मातृ मृत्यु अनुपात 556 से घटकर 93 पर पहुँच चुका है। शिशु मृत्यु दर 88 से घटकर लगभग 25 रह गई है और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर भी ऐतिहासिक रूप से कम हुई है।
ये केवल आँकड़े नहीं हैं। यह उन लाखों संवादों की सफलता है जो आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य स्वयंसेवकों ने वर्षों तक घर-घर जाकर किए।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण इस परिवर्तन की पुष्टि करता है। संस्थागत प्रसव 39 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से अधिक हो गए हैं। पूर्ण टीकाकरण लगभग दोगुना होकर 87 प्रतिशत से अधिक पहुँच चुका है। यह बदलाव किसी सरकारी आदेश से नहीं आया। यह तब आया जब लोगों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करना शुरू किया।
भारत के जनस्वास्थ्य इतिहास में यदि किसी अभियान ने संवाद की शक्ति को अमर कर दिया तो वह था पल्स पोलियो अभियान।
‘दो बूंद ज़िंदगी की' केवल एक नारा नहीं था। वह पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना बन गया था। ]िफल्मी सितारों से लेकर धार्मिक नेताओं तक, शिक्षकों से लेकर चिकित्सकों तक, हर आवाज़ एक ही संदेश दोहरा रही थी। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2014 में भारत पोलियो मुक्त घोषित हुआ। यह विज्ञान की जीत थी लेकिन उससे पहले यह विश्वास की जीत थी।
आज दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान करोड़ों बच्चों को बारह जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा दे रहा है। हर टीका केवल रोग से बचाव नहीं करता। वह समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच विश्वास की एक नई कड़ी भी जोड़ता है।
कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य की सबसे बड़ी लड़ाई केवल वायरस के विरुद्ध नहीं होगी बल्कि गलत सूचनाओं के विरुद्ध भी होगी। भारत ने 2.2 अरब से अधिक वैक्सीन डोज़ लगाकर इतिहास रचा लेकिन इसी दौरान सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों ने यह भी सिखाया कि यदि सूचना असत्य हो तो विज्ञान भी लोगों तक पहुँचने में संघर्ष करता है। यही कारण है कि आज स्वास्थ्य संचार पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
आयुष्मान भारत और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहलें केवल स्वास्थ्य सेवाओं का डिजिटलीकरण नहीं कर रहीं। वे नागरिकों और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच संवाद को तेज़, सरल और अधिक पारदर्शी बना रही हैं। करोड़ों डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, करोड़ों Aँप्A आईडी और लाखों स्वास्थ्य पेशेवरों का डिजिटल नेटवर्क भविष्य के स्वास्थ्य भारत की मजबूत नींव रख रहा है। लेकिन चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं।
क्षय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक स्वास्थ्य, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और जलवायु परिवर्तन जैसी नई चुनौतियाँ केवल अस्पतालों से नहीं जीतेंगी। इनके लिए आवश्यक होगा कि समाज स्वयं स्वास्थ्य का सहभागी बने।
यहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Aघ्) नई संभावनाएँ लेकर आती है। एआई गलत सूचनाओं की पहचान कर सकती है, स्थानीय भाषाओं में स्वास्थ्य संदेश तैयार कर सकती है, जोखिम वाले क्षेत्रों की भविष्यवाणी कर सकती है और नीति-निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद दे सकती है। फिर भी एक सत्य कभी नहीं बदलेगा। विश्वास का कोई एल्गोरिद्म नहीं होता। संवेदना का कोई सॉफ्टवेयर नहीं होता और भरोसे की कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं होती। इनका जन्म केवल इंसान से इंसान के संवाद में होता है।
इसीलिए भविष्य के जनस्वास्थ्य अभियानों का मूल्यांकन पोस्टरों, विज्ञापनों या सोशल मीडिया की पहुँच से नहीं बल्कि इस बात से होना चाहिए कि कितनी माताएँ सुरक्षित रहीं, कितने बच्चों को समय पर टीके मिले, कितने लोगों ने बीमारी की पहचान समय रहते कराई और समाज का स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास कितना मजबूत हुआ।
विकसित भारत 2047 की यात्रा में यदि कोई निवेश सबसे अधिक दूरगामी सिद्ध होगा तो वह अस्पतालों की दीवारों में नहीं बल्कि लोगों के मन में किया गया निवेश होगा। विश्वसनीय संवाद का निवेश। क्योंकि अस्पताल बीमारी का इलाज कर सकते हैं, दवाएँ रोग को हराती हैं, तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को गति देती है लेकिन किसी बच्चे को टीका लगवाने, किसी रोगी को समय पर डॉक्टर तक पहुँचाने और किसी परिवार को स्वस्थ जीवन अपनाने की प्रेरणा केवल संवाद ही देता है।
भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य क्रांति शायद किसी प्रयोगशाला में नहीं लिखी जाएगी। वह किसी आशा कार्यकर्ता की मुस्कान में लिखी जाएगी...किसी माँ के भरोसे में लिखी जाएगी...किसी बच्चे की पहली मुस्कान में लिखी जाएगी...और उस एक संदेश में लिखी जाएगी जिसने किसी जीवन को बदल दिया क्योंकि कभी-कभी सबसे असरदार दवा किसी शीशी में नहीं बल्कि एक सच्चे, संवेदनशील और विश्वास से भरे संवाद में मिलती है।
(लेखक जनसंपर्क अधिकारी, एम्स पटना हैं।)
हर सुबह भारत के किसी गाँव में एक दस्तक होती है। दरवाज़ा खुलता है। सामने खड़ी होती है एक आशा कार्यकर्ता। उसके हाथ में कोई चमत्कारी दवा नहीं होती, कोई महँगा उपकरण नहीं होता। उसके पास होता है केवल विश्वास से भरा एक संवाद। वह एक माँ को समझाती है कि बच्चे का टीका केवल एक इंजेक्शन नहीं बल्कि उसके भविष्य की सुरक्षा है।
कहीं एक एएनएम गर्भवती महिला को नियमित जाँच का महत्व बताती है। किसी विद्यालय में शिक्षक बच्चों को साबुन से हाथ धोने की आदत सिखाता है। किसी मोबाइल स्क्रीन पर उभरता एक संदेश लाखों लोगों को समय रहते रक्तचाप और मधुमेह की जाँच कराने के लिए प्रेरित करता है।
ये दृश्य सामान्य लग सकते हैं लेकिन सच यह है कि हर दिन ऐसे अनगिनत संवाद भारत में हजारों जिंदगियाँ बचाते हैं।
यही है भारत की सबसे प्रभावशाली, लेकिन सबसे कम चर्चित दवा-जनस्वास्थ्य संवाद।
चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों का इतिहास अक्सर नई दवाओं, अत्याधुनिक अस्पतालों और वैज्ञानिक खोजों के साथ लिखा जाता है। लेकिन एक और इतिहास है जो प्रयोगशालाओं में नहीं लोगों के मन में लिखा जाता है। वह इतिहास विश्वास का है। संवाद का है। व्यवहार परिवर्तन का है।
क्योंकि टीका तभी जीवन बचाता है जब कोई उसे लगवाने का निर्णय ले। अस्पताल तभी रोगी का उपचार कर सकता है जब वह समय पर वहाँ पहुँचे। कोई भी स्वास्थ्य योजना तभी सफल होती है जब समाज उसे अपना ले। चिकित्सा विज्ञान और स्वस्थ समाज के बीच जो सबसे मज़बूत सेतु है, उसका नाम है- विश्वसनीय संवाद।
भारत जैसा विशाल और विविधताओं से भरा देश इस सत्य का सबसे बड़ा उदाहरण है। 140 करोड़ से अधिक आबादी, सैकड़ों भाषाएँ, हजारों बोलियाँ, असंख्य सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएँ और हर वर्ष लगभग 2.6 करोड़ नवजात। यहाँ स्वास्थ्य संदेश केवल प्रसारित नहीं किए जाते, उन्हें समाज की संवेदनाओं, मान्यताओं और जीवनशैली के साथ संवाद स्थापित करना पड़ता है।
शायद यही कारण है कि भारत की स्वास्थ्य यात्रा केवल नीतियों की कहानी नहीं बल्कि जनभागीदारी की कहानी भी है।
तीन दशक पहले भारत में मातृत्व और शिशु मृत्यु दर दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में गिनी जाती थी। आज सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आँकड़े बताते हैं कि मातृ मृत्यु अनुपात 556 से घटकर 93 पर पहुँच चुका है। शिशु मृत्यु दर 88 से घटकर लगभग 25 रह गई है और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर भी ऐतिहासिक रूप से कम हुई है।
ये केवल आँकड़े नहीं हैं। यह उन लाखों संवादों की सफलता है जो आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य स्वयंसेवकों ने वर्षों तक घर-घर जाकर किए।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण इस परिवर्तन की पुष्टि करता है। संस्थागत प्रसव 39 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से अधिक हो गए हैं। पूर्ण टीकाकरण लगभग दोगुना होकर 87 प्रतिशत से अधिक पहुँच चुका है। यह बदलाव किसी सरकारी आदेश से नहीं आया। यह तब आया जब लोगों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करना शुरू किया।
भारत के जनस्वास्थ्य इतिहास में यदि किसी अभियान ने संवाद की शक्ति को अमर कर दिया तो वह था पल्स पोलियो अभियान।
‘दो बूंद ज़िंदगी की' केवल एक नारा नहीं था। वह पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना बन गया था। ]िफल्मी सितारों से लेकर धार्मिक नेताओं तक, शिक्षकों से लेकर चिकित्सकों तक, हर आवाज़ एक ही संदेश दोहरा रही थी। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2014 में भारत पोलियो मुक्त घोषित हुआ। यह विज्ञान की जीत थी लेकिन उससे पहले यह विश्वास की जीत थी।
आज दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण अभियान करोड़ों बच्चों को बारह जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा दे रहा है। हर टीका केवल रोग से बचाव नहीं करता। वह समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच विश्वास की एक नई कड़ी भी जोड़ता है।
कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य की सबसे बड़ी लड़ाई केवल वायरस के विरुद्ध नहीं होगी बल्कि गलत सूचनाओं के विरुद्ध भी होगी। भारत ने 2.2 अरब से अधिक वैक्सीन डोज़ लगाकर इतिहास रचा लेकिन इसी दौरान सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों ने यह भी सिखाया कि यदि सूचना असत्य हो तो विज्ञान भी लोगों तक पहुँचने में संघर्ष करता है। यही कारण है कि आज स्वास्थ्य संचार पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
आयुष्मान भारत और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहलें केवल स्वास्थ्य सेवाओं का डिजिटलीकरण नहीं कर रहीं। वे नागरिकों और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच संवाद को तेज़, सरल और अधिक पारदर्शी बना रही हैं। करोड़ों डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, करोड़ों Aँप्A आईडी और लाखों स्वास्थ्य पेशेवरों का डिजिटल नेटवर्क भविष्य के स्वास्थ्य भारत की मजबूत नींव रख रहा है। लेकिन चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं।
क्षय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक स्वास्थ्य, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और जलवायु परिवर्तन जैसी नई चुनौतियाँ केवल अस्पतालों से नहीं जीतेंगी। इनके लिए आवश्यक होगा कि समाज स्वयं स्वास्थ्य का सहभागी बने।
यहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Aघ्) नई संभावनाएँ लेकर आती है। एआई गलत सूचनाओं की पहचान कर सकती है, स्थानीय भाषाओं में स्वास्थ्य संदेश तैयार कर सकती है, जोखिम वाले क्षेत्रों की भविष्यवाणी कर सकती है और नीति-निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद दे सकती है। फिर भी एक सत्य कभी नहीं बदलेगा। विश्वास का कोई एल्गोरिद्म नहीं होता। संवेदना का कोई सॉफ्टवेयर नहीं होता और भरोसे की कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं होती। इनका जन्म केवल इंसान से इंसान के संवाद में होता है।
इसीलिए भविष्य के जनस्वास्थ्य अभियानों का मूल्यांकन पोस्टरों, विज्ञापनों या सोशल मीडिया की पहुँच से नहीं बल्कि इस बात से होना चाहिए कि कितनी माताएँ सुरक्षित रहीं, कितने बच्चों को समय पर टीके मिले, कितने लोगों ने बीमारी की पहचान समय रहते कराई और समाज का स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास कितना मजबूत हुआ।
विकसित भारत 2047 की यात्रा में यदि कोई निवेश सबसे अधिक दूरगामी सिद्ध होगा तो वह अस्पतालों की दीवारों में नहीं बल्कि लोगों के मन में किया गया निवेश होगा। विश्वसनीय संवाद का निवेश। क्योंकि अस्पताल बीमारी का इलाज कर सकते हैं, दवाएँ रोग को हराती हैं, तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को गति देती है लेकिन किसी बच्चे को टीका लगवाने, किसी रोगी को समय पर डॉक्टर तक पहुँचाने और किसी परिवार को स्वस्थ जीवन अपनाने की प्रेरणा केवल संवाद ही देता है।
भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य क्रांति शायद किसी प्रयोगशाला में नहीं लिखी जाएगी। वह किसी आशा कार्यकर्ता की मुस्कान में लिखी जाएगी...किसी माँ के भरोसे में लिखी जाएगी...किसी बच्चे की पहली मुस्कान में लिखी जाएगी...और उस एक संदेश में लिखी जाएगी जिसने किसी जीवन को बदल दिया क्योंकि कभी-कभी सबसे असरदार दवा किसी शीशी में नहीं बल्कि एक सच्चे, संवेदनशील और विश्वास से भरे संवाद में मिलती है।
(लेखक जनसंपर्क अधिकारी, एम्स पटना हैं।)