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नीट विवाद पर क्यों थम गई संसद: छात्रों में असंतोष या विपक्ष का सियासी दांव?

प्रकाशित: 24-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
ओ.पी. पाल
संसद के मानसून सत्र के दौरान राष्ट्र की सर्वोच्च पंचायत संसद केवल विधायी बहसों या नीतिगत बहसों का केंद्र नहीं रही, बल्कि यह देश के लाखों युवाओं के भविष्य, आक्रोश और असंतोष का रणक्षेत्र बन गई है। संसद के मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही शुरू होते ही व्यवधान उत्पन्न होता नजर आ रहा है।
विपक्षी दलों के सांसदों के इस मामले को लेकर कड़े तेवर हैं और सरकार के खिलाफ अलग अलग रुप में आंदोलन चलाने पर उतारु हैं यानी पूरे देश में सियासी बवाल मचा हुआ है। इस पूरे बवाल के मूल में नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा में कथित धांधली, पेपर लीक के आरोप, और राजधानी दिल्ली में लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों तथा युवाओं पर पुलिस द्वारा किया गया बल प्रयोग है। विपक्ष अब सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़ गया है। सड़कों पर शुरू हुआ एक शैक्षणिक आंदोलन अब देश का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है, जिसने संसद में सरकार के विधायी एजेंडे पर गंभीर दबाव बना दिया है।
भारत जैसे जीवंत और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जब देश का युवा सड़कों पर उतर आए और संसद की कार्यवाही ठप हो जाए, तो यह पूरी व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय है। संसद का काम केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि देश के नागरिकों, विशेषकर युवाओं के संशय और पीड़ा का समाधान करना भी है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष और प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ एक पारदर्शी संवाद कायम करे, ताकि जांच पर विश्वास बहाल हो सके। वहीं, विपक्ष को भी चाहिए कि वह विधायी कामकाज में भागीदारी करते हुए संसद को ही अपनी बात और तर्कों का सबसे मजबूत मंच बनाए। यदि समय रहते इस गतिरोध और युवा असंतोष को तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया गया, तो इसका नुकसान केवल राजनीति को नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य उसके युवाओं को भुगतना पड़ेगा।
सड़कों से संसद तक विपक्ष का एकीकृत एजेंडा - विपक्ष को नीट और छात्र असंतोष के रूप में एक ऐसा सर्वव्यापी मुद्दा मिल गया है जो सीधे देश के हर दूसरे-तीसरे परिवार को प्रभावित करता है। विपक्षी दल इसे आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में विकसित कर रहे हैं। संसद के भीतर और बाहर विपक्ष ने इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, वामपंथी दलों, तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
शायद विपक्ष का सबसे बड़ा हमला केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि जब देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील चिकित्सा प्रवेश परीक्षा की साख तार-तार हो गई है, तो मंत्री अपनी नैतिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते।
विपक्ष का कहना है कि जब तक शिक्षा मंत्री पद पर बने रहेंगे, तब तक किसी भी जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे। कांग्रेस सांसदों ने तो यहां तक आरोप लगाया कि केंद्र सरकार देश के मेधावी छात्रों की आवाज सुनने के बजाय पुलिस की लाठियों से उसे दबाना चाहती है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर एक तरफ तो चर्चा की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार इसके लिए तैयार हैं, लेकिन विपक्ष संसद के भीतर हंगामा व नारेबाजी करके कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। शायद विपक्षी दल इस मुद्दे पर अपनी सियासी रणनीति को मजबूत करना चाहता है। विपक्ष का दावा है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) पूरी तरह से विफल साबित हो चुकी है और इसके शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराना अन्याय है।
सरकार का दावा: सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार -संसद और सड़को पर विपक्ष के लगातार जारी आक्रामक तेवरों और हंगामे के बीच केंद्र सरकार ने भी अपना रुख साफ किया है। सरकार का कहना है कि वह छात्रों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बार-बार सदन में दोहराया कि सरकार नियम के तहत नीट मामले समेत किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर प्रश्नकाल के बाद विस्तृत चर्चा कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। सरकार का आरोप है कि विपक्ष चर्चा करने के बजाय केवल सदन को ठप करने की राजनीति कर रहा है। सरकार का तर्क है कि पेपर लीक और सार्वजनिक परीक्षाओं में धांधली को रोकने के लिए नया और कठोर सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम लागू किया जा चुका है। उच्च स्तरीय जांच एजेंसियां हर पहलू की गहनता से पड़ताल कर रही हैं। सरकार का कहना है कि बिना ठोस तथ्यों के पूरी परीक्षा को अचानक रद्द कर देना या जल्दबाजी में कोई फैसला लेना उन लाखों ईमानदार और मेधावी छात्रों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने वर्षों तक दिन-रात मेहनत की है।
देश में एक बड़ा सामाजिक व राजनीतिक मोड़ - नीट विवाद और जंतर-मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद देश के माहौल में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। यह मामला अब केवल एक प्रतियोगी परीक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके कई सामाजिक और राजनीतिक आयाम सामने आ चुके हैं। युवाओं में गहराता अविश्वास सरकार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। बार-बार लीक होते पेपरों और प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी से देश के मध्यमवर्गीय और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं का भरोसा भारत की चयन और परीक्षा प्रणालियों से डगमगा रहा है। यह अविश्वास देश के जनसांख्यिकी लाभांश के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक हैं।)