सिविल सर्विस परीक्षा में उत्तर बनाम दक्षिण
प्रकाशित: 11-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
विवेक शुक्ला
भारत का मीडिया इन दिनों सिविल सर्विस परीक्षा (यूपीएससी) 2025 के सफल अभ्यर्थियों की कहानियों से भरा हुआ है। अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार कामयाब अभ्यार्थियों के इंटरव्यू देखे-पढ़े जा सकते हैं। ये उम्मीदवार बता रहे हैं कि उन्होंने देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक को कैसे ाwढक किया। लाखों युवा हर साल इस परीक्षा को पास करने का सपना देखते हैं। लेकिन जब चयनित उम्मीदवारों के नाम और उनके राज्य देखे जाते हैं, तो एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है। उत्तर भारत के राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा से बड़ी संख्या में सफल उम्मीदवार सामने आते हैं, जबकि दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक या मुंबई जैसे महानगरों से अपेक्षाकृत कम नाम दिखाई देते हैं। दक्षिण से मिलती-जुलती स्थिति गुजरात और महाराष्ट्र की भी नजर आती है। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ संयोग है, या सचमुच उत्तर भारत के युवाओं में इस परीक्षा का ाsढज ज्यादा है? और अगर ऐसा है, तो दक्षिण भारत के युवा करियर के दूसरे रास्ते क्यों चुन रहे हैं?
सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। हाल के वर्षों के परिणामों से यह साफ दिखता है कि उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व अधिक है। 2024 के परिणामों में कुल 1009 उम्मीदवारों का चयन हुआ। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार से ही करीब 145 उम्मीदवार थे, जो कुल संख्या का लगभग 14 से 15 प्रतिशत बनते हैं। टॉप रैंक की सूची में भी उत्तर भारत के अभ्यर्थियों की मौजूदगी लगातार मजबूत रही है। उदाहरण के लिए, 2024 की टॉप 10 सूची में से 6 उम्मीदवार उत्तर भारत के राज्यों से थे। यह प्रवृत्ति एक साल की नहीं है। पिछले कई वर्षों के परिणामों को देखें तो उत्तर भारत से आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की संख्या भी अधिक है और चयनित उम्मीदवारों की संख्या भी।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि दक्षिण भारत के छात्र कम प्रतिभाशाली हैं। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्य शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी माने जाते हैं। वहां स्कूल और कॉलेज शिक्षा का स्तर काफी मजबूत है। लेकिन करियर की प्राथमिकताएं अलग हैं। दक्षिण भारत के कई युवा इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करियर बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं मुंबई जैसे महानगरों में फाइनेंस, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और स्टार्टअप संस्कृति का प्रभाव अधिक है। ऐसे में सिविल सेवा वहां उतनी बड़ी आकांक्षा नहीं बन पाती जितनी उत्तर भारत के कई हिस्सों में दिखाई देती है।
इस अंतर का पहला बड़ा कारण शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग संस्कृति है। उत्तर भारत में दिल्ली, कोटा, पटना और प्रयागराज जैसे शहर सिविल सेवा की तैयारी के बड़े केंद्र बन चुके हैं। यहां हजारों कोचिंग संस्थान और पुस्तकालय हैं जहां लाखों छात्र सालों तक तैयारी करते हैं। दिल्ली के मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर जैसे इलाके तो लगभग पूरी तरह यूपीएससी तैयारी के केंद्र बन चुके हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में छात्र यहां आकर पढ़ाई करते हैं। इसके विपरीत दक्षिण भारत में स्कूली स्तर से ही कई छात्र आईआईटी-जेईई या नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं, जिनके जरिए निजी क्षेत्र में आकर्षक करियर के अवसर मिलते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण आर्थिक संरचना और रोजगार के अवसर हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में औद्योगिक विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा है और निजी क्षेत्र में रोजगार के विकल्प सीमित हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी को आज भी सबसे सुरक्षित और प्रतिष्ठित माना जाता है। आईएएस, आईपीएस या अन्य केंद्रीय सेवाओं में चयन परिवार और समाज में सम्मान का प्रतीक बन जाता है। वहीं दक्षिण भारत के कई शहरों में आईटी, आटो मोबाइल और फार्मा उद्योगों ने रोजगार की नई संभावनाएं पैदा की हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर तकनीकी कंपनियों के बड़े केंद्र हैं जहां लाखों युवाओं को उच्च वेतन वाली नौकरियां मिलती हैं। ऐसे में कई प्रतिभाशाली छात्र निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देते हैं।
एक कारण सामाजिक और सांस्कृतिक सोच से जुड़ा है। उत्तर भारत के गांवों और कस्बों में प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। किसी परिवार में अगर कोई आईएएस या आईपीएस बन जाता है तो वह पूरे इलाके के लिए गर्व का विषय बन जाता है। कई परिवारों में यह सपना पीढ़ियों से चलता है। भले ही कई छात्र वर्षों तक परीक्षा पास न कर पाएं, फिर भी प्रयास करना ही सम्मानजनक माना जाता है। इसके विपरीत दक्षिण भारत में करियर की सोच अधिक विविध है। वहां डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, उद्यमी या कॉर्पोरेट पेशेवर बनने के विकल्प भी समान रूप से सम्मानजनक माने जाते हैं।
हां, दक्षिण भारत में राज्य सिविल सेवा परीक्षाएं लोकप्रिय हैं। कई छात्र अपने राज्य की प्रशासनिक सेवाओं में जाना पसंद करते हैं क्योंकि इससे उन्हें अपने ही क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलता है। इसके अलावा मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उत्तर भारत में यूपीएससी टॉपर्स की कहानियां बहुत तेजी से फैलती हैं। कोचिंग संस्थान, यूट्यूब चैनल और स्थानीय मीडिया इन सफलताओं को बड़े स्तर पर प्रचारित करते हैं, जिससे नए छात्रों में प्रेरणा और आकर्षण पैदा होता है। इन सभी कारणों को मिलाकर देखें तो यह एक तरह का सामाजिक पा बन जाता है। जहां अधिक छात्र तैयारी करते हैं, वहां अधिक चयन भी होता है और फिर वही सफलता अगली पीढ़ी को प्रेरित करती है। लेकिन एक लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश के लिए यह जरूरी है कि प्रशासनिक सेवाओं में सभी क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व हो। अगर किसी एक क्षेत्र का दबदबा बहुत ज्यादा हो जाए, तो नीतियों और प्रशासनिक दृष्टिकोण में क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका भी बढ़ सकती है।
आखिरकार सिविल सेवा केवल एक नौकरी नहीं है, बल्कि देश की सेवा करने का अवसर है। इसलिए यह जरूरी है कि भारत के हर क्षेत्र, हर भाषा और हर सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रतिभाशाली युवा इसमें भाग लें। जब उत्तर और दक्षिण, दोनों के युवा समान रूप से प्रशासनिक सेवाओं में आएंगे, तभी देश की नीतियों में विविध अनुभव और व्यापक दृष्टिकोण दिखाई देगा। यही भारत जैसे विशाल और विविध देश की वास्तविक ताकत भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
भारत का मीडिया इन दिनों सिविल सर्विस परीक्षा (यूपीएससी) 2025 के सफल अभ्यर्थियों की कहानियों से भरा हुआ है। अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार कामयाब अभ्यार्थियों के इंटरव्यू देखे-पढ़े जा सकते हैं। ये उम्मीदवार बता रहे हैं कि उन्होंने देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक को कैसे ाwढक किया। लाखों युवा हर साल इस परीक्षा को पास करने का सपना देखते हैं। लेकिन जब चयनित उम्मीदवारों के नाम और उनके राज्य देखे जाते हैं, तो एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है। उत्तर भारत के राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा से बड़ी संख्या में सफल उम्मीदवार सामने आते हैं, जबकि दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक या मुंबई जैसे महानगरों से अपेक्षाकृत कम नाम दिखाई देते हैं। दक्षिण से मिलती-जुलती स्थिति गुजरात और महाराष्ट्र की भी नजर आती है। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ संयोग है, या सचमुच उत्तर भारत के युवाओं में इस परीक्षा का ाsढज ज्यादा है? और अगर ऐसा है, तो दक्षिण भारत के युवा करियर के दूसरे रास्ते क्यों चुन रहे हैं?
सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। हाल के वर्षों के परिणामों से यह साफ दिखता है कि उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व अधिक है। 2024 के परिणामों में कुल 1009 उम्मीदवारों का चयन हुआ। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार से ही करीब 145 उम्मीदवार थे, जो कुल संख्या का लगभग 14 से 15 प्रतिशत बनते हैं। टॉप रैंक की सूची में भी उत्तर भारत के अभ्यर्थियों की मौजूदगी लगातार मजबूत रही है। उदाहरण के लिए, 2024 की टॉप 10 सूची में से 6 उम्मीदवार उत्तर भारत के राज्यों से थे। यह प्रवृत्ति एक साल की नहीं है। पिछले कई वर्षों के परिणामों को देखें तो उत्तर भारत से आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की संख्या भी अधिक है और चयनित उम्मीदवारों की संख्या भी।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि दक्षिण भारत के छात्र कम प्रतिभाशाली हैं। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्य शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी माने जाते हैं। वहां स्कूल और कॉलेज शिक्षा का स्तर काफी मजबूत है। लेकिन करियर की प्राथमिकताएं अलग हैं। दक्षिण भारत के कई युवा इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करियर बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं मुंबई जैसे महानगरों में फाइनेंस, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और स्टार्टअप संस्कृति का प्रभाव अधिक है। ऐसे में सिविल सेवा वहां उतनी बड़ी आकांक्षा नहीं बन पाती जितनी उत्तर भारत के कई हिस्सों में दिखाई देती है।
इस अंतर का पहला बड़ा कारण शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग संस्कृति है। उत्तर भारत में दिल्ली, कोटा, पटना और प्रयागराज जैसे शहर सिविल सेवा की तैयारी के बड़े केंद्र बन चुके हैं। यहां हजारों कोचिंग संस्थान और पुस्तकालय हैं जहां लाखों छात्र सालों तक तैयारी करते हैं। दिल्ली के मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर जैसे इलाके तो लगभग पूरी तरह यूपीएससी तैयारी के केंद्र बन चुके हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में छात्र यहां आकर पढ़ाई करते हैं। इसके विपरीत दक्षिण भारत में स्कूली स्तर से ही कई छात्र आईआईटी-जेईई या नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं, जिनके जरिए निजी क्षेत्र में आकर्षक करियर के अवसर मिलते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण आर्थिक संरचना और रोजगार के अवसर हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में औद्योगिक विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा है और निजी क्षेत्र में रोजगार के विकल्प सीमित हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी को आज भी सबसे सुरक्षित और प्रतिष्ठित माना जाता है। आईएएस, आईपीएस या अन्य केंद्रीय सेवाओं में चयन परिवार और समाज में सम्मान का प्रतीक बन जाता है। वहीं दक्षिण भारत के कई शहरों में आईटी, आटो मोबाइल और फार्मा उद्योगों ने रोजगार की नई संभावनाएं पैदा की हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर तकनीकी कंपनियों के बड़े केंद्र हैं जहां लाखों युवाओं को उच्च वेतन वाली नौकरियां मिलती हैं। ऐसे में कई प्रतिभाशाली छात्र निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देते हैं।
एक कारण सामाजिक और सांस्कृतिक सोच से जुड़ा है। उत्तर भारत के गांवों और कस्बों में प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। किसी परिवार में अगर कोई आईएएस या आईपीएस बन जाता है तो वह पूरे इलाके के लिए गर्व का विषय बन जाता है। कई परिवारों में यह सपना पीढ़ियों से चलता है। भले ही कई छात्र वर्षों तक परीक्षा पास न कर पाएं, फिर भी प्रयास करना ही सम्मानजनक माना जाता है। इसके विपरीत दक्षिण भारत में करियर की सोच अधिक विविध है। वहां डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, उद्यमी या कॉर्पोरेट पेशेवर बनने के विकल्प भी समान रूप से सम्मानजनक माने जाते हैं।
हां, दक्षिण भारत में राज्य सिविल सेवा परीक्षाएं लोकप्रिय हैं। कई छात्र अपने राज्य की प्रशासनिक सेवाओं में जाना पसंद करते हैं क्योंकि इससे उन्हें अपने ही क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलता है। इसके अलावा मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उत्तर भारत में यूपीएससी टॉपर्स की कहानियां बहुत तेजी से फैलती हैं। कोचिंग संस्थान, यूट्यूब चैनल और स्थानीय मीडिया इन सफलताओं को बड़े स्तर पर प्रचारित करते हैं, जिससे नए छात्रों में प्रेरणा और आकर्षण पैदा होता है। इन सभी कारणों को मिलाकर देखें तो यह एक तरह का सामाजिक पा बन जाता है। जहां अधिक छात्र तैयारी करते हैं, वहां अधिक चयन भी होता है और फिर वही सफलता अगली पीढ़ी को प्रेरित करती है। लेकिन एक लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश के लिए यह जरूरी है कि प्रशासनिक सेवाओं में सभी क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व हो। अगर किसी एक क्षेत्र का दबदबा बहुत ज्यादा हो जाए, तो नीतियों और प्रशासनिक दृष्टिकोण में क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका भी बढ़ सकती है।
आखिरकार सिविल सेवा केवल एक नौकरी नहीं है, बल्कि देश की सेवा करने का अवसर है। इसलिए यह जरूरी है कि भारत के हर क्षेत्र, हर भाषा और हर सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रतिभाशाली युवा इसमें भाग लें। जब उत्तर और दक्षिण, दोनों के युवा समान रूप से प्रशासनिक सेवाओं में आएंगे, तभी देश की नीतियों में विविध अनुभव और व्यापक दृष्टिकोण दिखाई देगा। यही भारत जैसे विशाल और विविध देश की वास्तविक ताकत भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)