संवैधानिक पदों की गरिमा सर्वोपरि
प्रकाशित: 11-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राष्ट्रपति का पद केवल संवैधानिक ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय गरिमा और एकता का भी प्रतीक है। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक और भारत गणराज्य की मर्यादा और संविधान के संरक्षक होते हैं। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा अपेक्षित प्रोटोकॉल का पालन न करना और स्वयं उनकी अगवानी के लिए उपस्थित न होना अनुचित है। भारतीय लोकतंत्र की परंपरा रही है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों की गरिमा को सर्वोपरि रखा जाता है। राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर माना जाता है और देश के हर नागरिक के साथ-साथ सभी जनप्रतिनिधियों का यह नैतिक और संवैधानिक दायित्व होता है कि वे राष्ट्रपति का आदर करें। अब तक के इतिहास में बहुत कम ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति के दौरे के दौरान व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर उनका स्वागत न किया हो। इसलिए पश्चिम बंगाल में जो स्थिति सामने आई है उसने राजनीतिक बहस को जन्म दिया है और कई दलों ने इसे लोकतांत्रिक शिष्टाचार के विरुद्ध बताया है। इसलिए यह अपेक्षा की जाती है कि भविष्य में सभी राजनीतिक दल और राज्य सरकारें इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने का प्रयास करें और देश की संवैधानिक परंपराओं का सम्मान करें। लोकतंत्र केवल कानूनों और संस्थाओं से नहीं चलता बल्कि उन परंपराओं और मूल्यों से भी चलता है जो समय के साथ विकसित हुए हैं। राष्ट्रपति के प्रति सम्मान दिखाना केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है, जिसे बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।इस पूरे मामले में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने भी अपनी प्रतिािढया देते हुए कहा है कि राष्ट्रपति को प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान न देना उचित नहीं है। मायावती की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं और सामाजिक रूप से प्रतीकात्मक महत्व भी रखता है।
भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है जहां केंद्र और राज्य दोनों की अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं। जब किसी राज्य की सरकार केंद्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति अपेक्षित शिष्टाचार नहीं दिखाती तो इससे एक गलत संदेश जाता है। राजनीतिक मतभेदों को संस्थागत गरिमा से ऊपर रखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है। विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से इस मुद्दे को उठा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए यह आवश्यक है कि संवैधानिक पदों की गरिमा को राजनीति से ऊपर रखा जाए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है जहां केंद्र और राज्य दोनों की अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं। जब किसी राज्य की सरकार केंद्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति अपेक्षित शिष्टाचार नहीं दिखाती तो इससे एक गलत संदेश जाता है। राजनीतिक मतभेदों को संस्थागत गरिमा से ऊपर रखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है। विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से इस मुद्दे को उठा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए यह आवश्यक है कि संवैधानिक पदों की गरिमा को राजनीति से ऊपर रखा जाए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।