एलपीजी संकट
प्रकाशित: 11-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के दुष्परिणाम भारत को भी भुगतने की नौबत आ ही गई। पश्चिम एशिया में मची तबाही का परिणाम यह हुआ कि ईरान ने हार्मूज जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया जिसके कारण भारत की कुल एलपीजी गैस की एक तिहाई की आपूर्ति संकटग्रस्त हो गई। अब भारत के लिए आवश्यक हो गया है कि वह एलपीजी के लिए प्राथमिकता का निर्धारण करे। ऐसी हालत में होटल कारोबारी वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कमी से जूझने पर मजबूर होंगे। लेकिन सरकार ने इस संकट से उबरने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक गजट अधिसूचना जारी करके गैर-प्राथमिकता क्षेत्रों से गैस मोड़कर प्रमुख उपभोक्ताओं को गैस उपलब्ध कराने का आदेश दिया है।
दरअसल सरकार ने घरेलू स्तर पर उत्पादित प्राकृतिक गैस के आबंटन के प्राथमिकता सूची में संशोधन कर दिया है और एलपीजी उत्पादन को सीएनजी और पाइप वाली (खाना पकाने की) गैस के साथ शीर्ष पर रखा है। इससे बाजार मूल्य पर वाणिज्यिक एलपीजी का उपयोग करने वाले होटल और रेस्तरां के लिए आपूर्ति में भारी कमी होना स्वाभाविक है। सच तो यह है कि भारत अपनी 19.1 करोड़ मानक घनमीटर प्रतिदिन गैस खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया में बवाल के कारण ईरान द्वारा बाधित गैस आपूर्ति लगभग 6 करोड़ मानक घनमीटर प्रतिदिन की गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वह जनसामान्य को इस संकट से राहत दिलाए।
वास्तविकता तो यह है कि ईरान इस वक्त पूरी दुनिया को इस बात का एहसास कराना चाहता है कि उसका महत्व क्या है? इसलिए न सिर्फ उसने अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तबाह करने का फैसला किया बल्कि उन देशों को भी इस युद्ध के विभीषिका के दुष्परिणामों का एहसास कराना चाहता है जो या तो अमेरिका और इजरायल के साथ खड़े दिख रहे हैं अथवा तटस्थ हैं।
बहरहाल भारत के लिए यह तो जरूरी है कि वह अपनी जनता को राहत देने के लिए हर संभव प्रयास करे किन्तु परिस्थितियों से प्रभावित होकर जल्दबाजी में किसी भी पक्ष के साथ खड़ा होकर अपनी कमजोरी साबित करने का फैसला भी नहीं कर सकता। अमेरिका ने यदि ईरान और इजरायल के फटे में टांग अड़ाई है तो अब उसे ही तय करना है कि वह कितनी मजबूती से अपने पैर अड़ाए रखेगा। इजरायल के लिए तो ईरान का परमाणु कार्पाम और बैलिस्टिक मिसाइल का जखीरा अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ईरान के साथ नैतिक रूप से खड़ा भी हो जाए तो क्या उसकी मुसीबतें कम हो जाएंगी? अपना मानना है कि बिल्कुल नहीं। इससे भारत की भी मुश्किलें बढ़ेंगी। भारत ने जिस तरह निरपेक्ष सािढयता की नीति अपनाई है, वही सही है। मतलब यह कि युद्ध में कूदे बिना बारूदी आग के खिलाफ माहौल बनाना। ईरान की मौजूदा सरकार और सेना जो भी फैसला ले रही है वह उनके लिए जीवन-मरण का सवाल बन चुकी है। अमेरिका समझता था कि कुछ सैन्य अधिकारियों, परमाणु विशेषज्ञों के साथ सुप्रीम लीडर के खात्मे के बाद ईरान पस्त हो जाएगा। किन्तु उसका यह अनुमान गलत साबित हुआ। ईरान को रूस सैटेलाइट से अमेरिकी ठिकानों की जानकारी दे रहा है और ईरान की सेना निशाना लगा रही है। यह संघर्ष यदि ज्यादा दिनों तक इसी तरह चलता रहा तो निश्चित रूप से हार्मूज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले पेट्रोलियम पदार्थों का संकट लगातार गहराएगा और भारत जैसे देशों को अपनी व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी।
दरअसल सरकार ने घरेलू स्तर पर उत्पादित प्राकृतिक गैस के आबंटन के प्राथमिकता सूची में संशोधन कर दिया है और एलपीजी उत्पादन को सीएनजी और पाइप वाली (खाना पकाने की) गैस के साथ शीर्ष पर रखा है। इससे बाजार मूल्य पर वाणिज्यिक एलपीजी का उपयोग करने वाले होटल और रेस्तरां के लिए आपूर्ति में भारी कमी होना स्वाभाविक है। सच तो यह है कि भारत अपनी 19.1 करोड़ मानक घनमीटर प्रतिदिन गैस खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया में बवाल के कारण ईरान द्वारा बाधित गैस आपूर्ति लगभग 6 करोड़ मानक घनमीटर प्रतिदिन की गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वह जनसामान्य को इस संकट से राहत दिलाए।
वास्तविकता तो यह है कि ईरान इस वक्त पूरी दुनिया को इस बात का एहसास कराना चाहता है कि उसका महत्व क्या है? इसलिए न सिर्फ उसने अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तबाह करने का फैसला किया बल्कि उन देशों को भी इस युद्ध के विभीषिका के दुष्परिणामों का एहसास कराना चाहता है जो या तो अमेरिका और इजरायल के साथ खड़े दिख रहे हैं अथवा तटस्थ हैं।
बहरहाल भारत के लिए यह तो जरूरी है कि वह अपनी जनता को राहत देने के लिए हर संभव प्रयास करे किन्तु परिस्थितियों से प्रभावित होकर जल्दबाजी में किसी भी पक्ष के साथ खड़ा होकर अपनी कमजोरी साबित करने का फैसला भी नहीं कर सकता। अमेरिका ने यदि ईरान और इजरायल के फटे में टांग अड़ाई है तो अब उसे ही तय करना है कि वह कितनी मजबूती से अपने पैर अड़ाए रखेगा। इजरायल के लिए तो ईरान का परमाणु कार्पाम और बैलिस्टिक मिसाइल का जखीरा अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ईरान के साथ नैतिक रूप से खड़ा भी हो जाए तो क्या उसकी मुसीबतें कम हो जाएंगी? अपना मानना है कि बिल्कुल नहीं। इससे भारत की भी मुश्किलें बढ़ेंगी। भारत ने जिस तरह निरपेक्ष सािढयता की नीति अपनाई है, वही सही है। मतलब यह कि युद्ध में कूदे बिना बारूदी आग के खिलाफ माहौल बनाना। ईरान की मौजूदा सरकार और सेना जो भी फैसला ले रही है वह उनके लिए जीवन-मरण का सवाल बन चुकी है। अमेरिका समझता था कि कुछ सैन्य अधिकारियों, परमाणु विशेषज्ञों के साथ सुप्रीम लीडर के खात्मे के बाद ईरान पस्त हो जाएगा। किन्तु उसका यह अनुमान गलत साबित हुआ। ईरान को रूस सैटेलाइट से अमेरिकी ठिकानों की जानकारी दे रहा है और ईरान की सेना निशाना लगा रही है। यह संघर्ष यदि ज्यादा दिनों तक इसी तरह चलता रहा तो निश्चित रूप से हार्मूज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले पेट्रोलियम पदार्थों का संकट लगातार गहराएगा और भारत जैसे देशों को अपनी व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी।