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अस्थायी राहत के बावजूद ईरानी तेल की खरीद बढ़ाये जाने की संभावना नहीं: विश्लेषक

प्रकाशित: 27-06-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली, (भाषा)। अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी ढील के बावजूद भारतीय तेल कंपनियों के ईरान से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। राहत अवधि को लेकर अनिश्चितता, भुगतान संबंधी बाधाएं और पहले से तय आपूर्ति अनुबंध इसकी मुख्य वजह है जिससे नई खरीद की गुंजाइश सीमित हो गई है।
रिफाइनरी और तेल बाजार का विश्लेषण करने वाली कंपनी केप्लर के सुमित रितोलिया ने कहा कि अमेरिका ने 60 दिन के लिए प्रतिबंधों में छूट दी है, जिससे अस्थायी रूप से ईरानी कच्चे तेल के निर्यात की अनुमति मिली है। हालांकि, इतनी कम अवधि के कारण चीन के अलावा अन्य खरीदारों की बड़े पैमाने पर वापसी की संभावना नहीं है। रितोलिया ने कहा कि भारतीय रिफाइनर आने वाले महीनों के लिए कच्चे तेल की अपनी अधिकांश जरूरतें पहले ही तय कर चुके हैं, क्योंकि खरीद योजनाओं को आमतौर पर दो से तीन महीने पहले अंतिम रूप दिया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से ईरानी कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार रहा है। भारतीय रिफाइनरियों के अनुकूल होने और व्यावसायिक रूप से बेहतर शर्तों के कारण भारत, ईरान के इरानियन लाइट और इरानियन हेवी ग्रेड का बड़ी मात्रा में आयात करता था। हालांकि 2018 में अमेरिकी प्रतिबंध कड़े होने के बाद मई 2019 से यह आयात बंद हो गया और इसकी जगह पश्चिम एशिया, अमेरिका तथा अन्य देशों के कच्चे तेल ने ले ली। एक समय भारत के कुल कच्चे तेल आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी 11.5 प्रतिशत थी। उन्होंने बताया कि सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियां फिलहाल अगस्त के आखिर तथा सितंबर में मिलने वाली खेपों की खरीद कर रहे हैं, जिनमें रूस और पश्चिम एशिया के कच्चे तेल का दबदबा बना हुआ है। वहीं, वेनेजुएला के कच्चे तेल की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। रितोलिया ने कहा कि यदि ईरानी कच्चा तेल भारी छूट पर उपलब्ध कराया जाता है, तो रिफाइनर अवसर का लाभ उ"ाते हुए कुछ खरीद कर सकते हैं। हालांकि, रूस और पश्चिम एशिया से पर्याप्त आपूर्ति उपलब्ध होने के कारण खरीद रणनीति बदलने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, यदि छूट बेहद आकर्षक हुई तो खरीद संभव है, लेकिन इसकी कुल गुंजाइश सीमित दिखाई देती है।
रितोलिया ने कहा कि नीति संबंधी अनिश्चितता भी एक बड़ा अवरोध है। अमेरिकी प्रतिबंध नीति में तेजी से बदलाव की संभावना बनी रहने के कारण रिफाइनर बड़ी मात्रा में खरीद का जोखिम नहीं उ"ाना चाहेंगे, क्योंकि इससे दीर्घकालिक अनुबंधों के दौरान आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाएगा।