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शिक्षा और भर्ती में एआई के बढ़ते उपयोग के बीच वास्तविक कौशल की पहचान सबसे बड़ी चुनौती

प्रकाशित: 14-06-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली, (वीअ)। कॉग्नावी इंडिया के एमडी एवं सीटीओ वरुण मोदगिल ने कहा कि एआई भारत को प्रतिभा खोजने में मदद कर सकता है, या उसे और तेज़ी से छिपा भी सकता है। उन्होने कहा कि भारत की प्रतिभा संबंधी चुनौती अब केवल शिक्षा या रोजगार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रतिभा के सही आवंटन (Aत्त्दम्atग्दह) का विषय बन गई है। एक युवा अर्थव्यवस्था तभी सफल होती है जब वह सही लोगों को सही समय पर सही कार्यों में लगा सके। यदि ऐसा नहीं होता, तो इसका प्रभाव कम उत्पादकता, लंबी भर्ती प्रािढयाओं, कौशल की कमी, अल्प-रोज़गार (ळह्स्जा्त्दब्सहू) और केवल कागज़ों तक सीमित रह जाने वाले जनसांख्यिकीय लाभ (अस्दुज्प्ग्म् अन्ग्dाह्) के रूप में दिखाई देता है। यह बात कॉग्नावी इंडिया के एमडी एवं सीटीओ वरुण मोदगिल ने कही।
उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) या तो इस कमजोरी को दूर कर सकता है या फिर इसे और बड़े पैमाने पर बढ़ा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में जोखिम केवल नकल (ण्पूग्हु) का नहीं है। असली खतरा यह है कि छात्र वास्तव में सक्षम बनने से पहले ही सक्षम दिखाई देने लगते हैं। एआई-सहायता प्राप्त शिक्षा पर किए गए एक शोध में पाया गया कि बिना किसी प्रतिबंध के उझ्ऊ-आधारित टूल का उपयोग करने वाले छात्रों का अभ्यास के दौरान प्रदर्शन 48 फीसद बेहतर रहा। लेकिन जब उस टूल को हटा दिया गया, तो उनके अंक उन छात्रों की तुलना में 17फीसद कम रहे जिन्होंने बिना एआई सहायता के अध्ययन किया था। भर्ती (Rाम्rल्ग्tसहू) के क्षेत्र में भी यही जोखिम मौजूद है। भारत में एआई-आधारित भर्ती तेजी से बढ़ रही है।
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, Aघ्-आधारित भर्ती का उपयोग 70ज्ञ् आईटी संगठनों और 50ज्ञ् बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं एवं बीमा (ँइएघ्) क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। इसका कारण स्पष्ट झ्र्-हृह्न्रद्ब में बड़े पैमाने पर भर्ती होती है और भर्तीकर्ताओं के लिए प्रत्येक उम्मीदवार का गहन मूल्यांकन मैन्युअली करना संभव नहीं होता।
वरुण मोदगिल ने कहा कि समाधान Aघ् की गति को धीमा करना नहीं है, बल्कि यह बदलना है कि हम Aघ् से क्या करवाना चाहते हैं। शिक्षा में Aघ् को केवल उत्तर देने वाली मशीन नहीं होना चाहिए, बल्कि एक चुनौती देने वाला साथी बनना चाहिए। उसे छात्रों की तार्किक क्षमता को परखना चाहिए, कमजोर धारणाओं को उजागर करना चाहिए और उन्हें अपने विचारों एवं तर्कों को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
भर्ती के क्षेत्र में Aघ् को केवल रिज्यूमे की रैंकिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे उम्मीदवारों की वास्तविक कार्यक्षमता (Aज्ज्त्ग् ण्aज्aंग्त्ग्tब्), समस्या-समाधान क्षमता, संचार कौशल, निर्णय लेने की क्षमता, सीखने की फुर्ती (थहग्हु Agग्त्ग्tब्) और भूमिका के अनुरूप उपयुक्तता (Rदत इग्t) का आकलन करना चाहिए। किसी कम-प्रसिद्ध संस्थान से आया उम्मीदवार, जो वास्तविक व्यावसायिक समस्याओं का समाधान कर सकता है, पुराने मानकों पर आधारित एक आकर्षक प्ऱोफाइल वाले उम्मीदवार से अधिक मूल्यवान साबित हो सकता है। मोदगिल के अनुसार, यही मानव संसाधन (प्R) प्रौद्योगिकी के लिए सबसे बड़ा अवसर है।
वैश्विक संकेत भी काफी स्पष्ट हैं। Aहूप्rदज्ग्म् के सीईओ डारियो अमोदेई ने चेतावनी दी है कि Aघ् अगले पाँच वर्षों में प्रवेश-स्तर (हूंब्-थनत्) की लगभग आधी श्वेतपोश नौकरियों (sंप्ग्tा-ण्दत्त्ar व्दें) को समाप्त कर सकता है। वहीं, एग्gहत्इग्rा की रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों (ँग्g ऊाम्प्) ने वर्ष 2024 में वर्ष 2023 की तुलना में 25ज्ञ् कम नए स्नातकों की भर्ती की।
हालांकि भारत की स्थिति कुछ अलग है। ऊण्ए, घ्हदेब्s, प्ण्थ्ऊाम्प्, sंग्ज्rद और अन्य प्रमुख कंपनियों ने नए स्नातकों (इrाsपे) के लिए अवसरों के द्वार बंद नहीं किए हैं। दो वर्षों की सतर्कता के बाद कैंपस भर्ती अब स्थिर होने लगी है। लेकिन बड़े पैमाने पर भर्ती करके भविष्य के लिए प्रतिभाओं का भंडार (ँाहम्प् एtrाहूप्) तैयार करने की पुरानी सोच बदल रही है। अब भर्ती अधिक चयनात्मक, कौशल-केंद्रित और वास्तविक कार्य आवश्यकताओं से अधिक जुड़ी हुई है।
मोदगिल ने कहा कि यह बदलाव रक्षात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक है। कंपनियाँ केवल आज की रिक्तियों को भरने पर ध्यान नहीं दे रही हैं, बल्कि वर्ष 2030 के नेतृत्व समूह (थ्प्गे्ज् ँाहम्प्) को तैयार करने में निवेश कर रही हैं। पहले स्वयं को अपरिहार्य (घ्हन्ग्हम्ग्ंत) बनाइए, फिर अवसर की प्रतीक्षा कीजिए। वर्ष 2030 के नेतृत्व को वर्ष 2030 में तैयार नहीं किया जा सकता।
शिक्षा प्रणाली इतनी तेज़ी से बदलाव नहीं कर सकती। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, स्नातकों की रोजगार-योग्यता (स्ज्तिं्दब्aंग्त्ग्tब्) 56.35ज्ञ् है। यह सुधार का संकेत अवश्य है, लेकिन कौशल अंतर (एक्ग्त्त् उaज्) अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वहीं ऱएएण्ध्श् का अनुमान है कि वर्ष 2026 तक भारत में Aघ् से संबंधित नौकरियों की संख्या 10 लाख से अधिक हो जाएगी, जबकि वर्तमान में केवल लगभग 16ज्ञ् आईटी पेशेवर ही Aघ्-कुशल हैं।