नेपाल के बदले सुर
प्रकाशित: 08-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
विदेश नीति में पड़ोसियों से अच्छे संबंध को उत्तम माना जाता है और जब नेपाल जैसे पड़ोसियों की बात हो तो वह भाई जैसे होते हैं, कदाचित कोई भी नहीं चाहेगा कि उनके साथ रिश्ते तनावपूर्ण हों। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री बालेन शाह “क्रासबार्डर कब्जे'' वाले टिप्पणी के कारण भारतीय विदेश विभाग की नजरों में चढ़ गए थे और भारतीय विदेश विभाग के प्रवक्ता को उनका जवाब देना पड़ा था वहीं रविवार को नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल अपने ही प्रधानमंत्री के तीखे तेवर और ब्रिटेन व चीन को मध्यस्थ बनाने की बात से पीछे हटते हुए स्पष्ट किया कि नेपाल भारत के साथ अपने सीमा विवाद को मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से हल करना चाहता है क्योंकि जब दोनों पक्ष खुले दिल, तर्क संगत दिमाग और आपसी सम्मान के साथ मिलते हैं तो कोई भी समस्या बहुत बड़ी और जटिल नहीं रह जाती। नेपाल के विदेश मंत्री ने किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को अस्वीकार करने की नई दिल्ली के रुख का प्रभावी रूप से समर्थन भी किया। मजे की बात तो यह है कि नेपाली प्रधानमंत्री ने जब क्रास बार्डर कब्जे की बात की तो भारत ने बड़ी शालीनता और समझदारी से उन्हें स्मरण कराया था कि द्विपक्षीय तंत्र सुचारू रूप से विवादित क्षेत्रों एवं मुद्दों को चिह्नित कर रहा है, इसलिए दो देशों को हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित करने की बात अप्रासंगिक एवं अनावश्यक है। भारत के पक्ष का ही नेपाल के विदेश मंत्री द्वारा समर्थन इस बात का परिचायक है कि यदि दोनों पक्षों में विवादों को हल करने की इच्छाशक्ति हो और दोनों खुले दिमाग से प्रयास करें तो कोई भी समस्या इतनी जटिल नहीं होती कि उसका हल न निकल सके।
असल में शनिवार को नेपाल के विदेश मंत्री और भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर द्वारा व्यापार, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी कनेक्टिविटी और ऊर्जा सहित विभिन्न क्षेत्रों में संबंधों को और अधिक विस्तारित करने के तरीकों पर ध्यान केन्द्रित किए जाने की जरूरत पर विस्तृत चर्चा के बाद नेपाल को इस बात का एहसास हुआ कि कहीं वह भी तो वही गलती नहीं कर रहा है जो उसके पूर्ववती सरकारें ने किया था। शुक्रवार से रविवार तक के अपने तीन दिवसीय यात्रा के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री को इस बात का एहसास हो गया कि भारत तेजी से वैश्विक आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति परिवर्तित हो चुका है इसलिए ऐसे गतिशील पड़ोसी के साथ संबंधों को मजबूत करने एवं साझेदारी को विस्तृत करने की परम आवश्यकता है। असल में नेपाल और भारत के बीच जिस लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना सीमा विवाद है। अंग्रेजों और नेपाल के बीच लिपुलेख सहित अन्य सीमा क्षेत्रों के निर्धारण के लिए 4 मार्च 1816 को सुगौली के संधि में यह तय किया गया कि काली नदी भारत और नेपाल के बीच की पश्चिमी सीमा मानी जाएगी। लिपुलेख काली नदी के उद्गम स्थल के पास स्थित है। मौजूदा वक्त में दोनों देशों में काली नदी के उद्गम स्थल को लेकर ही विवाद है क्योंकि दोनों देश मानते हैं कि इस नदी की शुरुआत अलग-अलग बिन्दुओं से होती है। सुगौली संधि पर वार्ता तो अच्छी बात है किन्तु यदि भारत अंग्रेजों द्वारा की गई इस संधि की समीक्षा के लिए तैयार हो जाता है तो चीन और भारत की सीमा रेखा मैकमोहन को मानने के लिए चीन के सामने यह तर्क कैसे दे पाएगा कि भारत तो आजादी के पहले की संधियों द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को मानेगा।
अब सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री बालेन शाह ने इस विवाद में मध्यस्थता के लिए ब्रिटेन का नाम लिया तो उन्हें यह कैसे महसूस हुआ कि भारत ब्रिटेन की बात मान लेगा! नेपाल के विदेश मंत्री ने सफाई देते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री ने ब्रिटेन का नाम इसलिए लिया ताकि सुगौली संधि के बारे में ब्रिटेन के पुस्तकालयों में रखे हुए अभिलेखों की मदद ली जा सके। संभव है बालेन शाह ने इसी आशय से ब्रिटेन की मध्यस्थता का उल्लेख कर दिया हो किन्तु नेपाली विदेशमंत्री यह स्पष्ट नहीं कर सके कि भारत-नेपाल सीमा विवाद में चीन की क्या भूमिका हो सकती है? क्या चीन को इस क्षेत्र का सरपंच साबित करना चाहता है नेपाल? यदि उसके मस्तिष्क में यह गलतफहमी रही होगी तो तीन दिनों में भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि भारत के लिए अपना पड़ोसी महत्वपूर्ण है और अपने इस पड़ोसी के साथ संबंधों को बनाए रखने एवं साझेदारी में विस्तार के लिए भारत प्रतिबद्ध है किन्तु वह चीन, ब्रिटेन या फिर किसी और की मध्यस्थता को कोई महत्व नहीं देता। इसीलिए नेपाल के विदेश मंत्री ने अतीत की चिंताओं से मुक्त साझेदारी के निर्माण की बात की। नेपाल का बदला यह सुर दोनों देशों के बीच संबंधों के लिए सकारात्मक है।
असल में शनिवार को नेपाल के विदेश मंत्री और भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर द्वारा व्यापार, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी कनेक्टिविटी और ऊर्जा सहित विभिन्न क्षेत्रों में संबंधों को और अधिक विस्तारित करने के तरीकों पर ध्यान केन्द्रित किए जाने की जरूरत पर विस्तृत चर्चा के बाद नेपाल को इस बात का एहसास हुआ कि कहीं वह भी तो वही गलती नहीं कर रहा है जो उसके पूर्ववती सरकारें ने किया था। शुक्रवार से रविवार तक के अपने तीन दिवसीय यात्रा के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री को इस बात का एहसास हो गया कि भारत तेजी से वैश्विक आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति परिवर्तित हो चुका है इसलिए ऐसे गतिशील पड़ोसी के साथ संबंधों को मजबूत करने एवं साझेदारी को विस्तृत करने की परम आवश्यकता है। असल में नेपाल और भारत के बीच जिस लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना सीमा विवाद है। अंग्रेजों और नेपाल के बीच लिपुलेख सहित अन्य सीमा क्षेत्रों के निर्धारण के लिए 4 मार्च 1816 को सुगौली के संधि में यह तय किया गया कि काली नदी भारत और नेपाल के बीच की पश्चिमी सीमा मानी जाएगी। लिपुलेख काली नदी के उद्गम स्थल के पास स्थित है। मौजूदा वक्त में दोनों देशों में काली नदी के उद्गम स्थल को लेकर ही विवाद है क्योंकि दोनों देश मानते हैं कि इस नदी की शुरुआत अलग-अलग बिन्दुओं से होती है। सुगौली संधि पर वार्ता तो अच्छी बात है किन्तु यदि भारत अंग्रेजों द्वारा की गई इस संधि की समीक्षा के लिए तैयार हो जाता है तो चीन और भारत की सीमा रेखा मैकमोहन को मानने के लिए चीन के सामने यह तर्क कैसे दे पाएगा कि भारत तो आजादी के पहले की संधियों द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को मानेगा।
अब सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री बालेन शाह ने इस विवाद में मध्यस्थता के लिए ब्रिटेन का नाम लिया तो उन्हें यह कैसे महसूस हुआ कि भारत ब्रिटेन की बात मान लेगा! नेपाल के विदेश मंत्री ने सफाई देते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री ने ब्रिटेन का नाम इसलिए लिया ताकि सुगौली संधि के बारे में ब्रिटेन के पुस्तकालयों में रखे हुए अभिलेखों की मदद ली जा सके। संभव है बालेन शाह ने इसी आशय से ब्रिटेन की मध्यस्थता का उल्लेख कर दिया हो किन्तु नेपाली विदेशमंत्री यह स्पष्ट नहीं कर सके कि भारत-नेपाल सीमा विवाद में चीन की क्या भूमिका हो सकती है? क्या चीन को इस क्षेत्र का सरपंच साबित करना चाहता है नेपाल? यदि उसके मस्तिष्क में यह गलतफहमी रही होगी तो तीन दिनों में भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि भारत के लिए अपना पड़ोसी महत्वपूर्ण है और अपने इस पड़ोसी के साथ संबंधों को बनाए रखने एवं साझेदारी में विस्तार के लिए भारत प्रतिबद्ध है किन्तु वह चीन, ब्रिटेन या फिर किसी और की मध्यस्थता को कोई महत्व नहीं देता। इसीलिए नेपाल के विदेश मंत्री ने अतीत की चिंताओं से मुक्त साझेदारी के निर्माण की बात की। नेपाल का बदला यह सुर दोनों देशों के बीच संबंधों के लिए सकारात्मक है।