वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा भारत

प्रकाशित: 05-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारत और ईरान के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर अमेरिका की बेचैनी एक बार फिर सामने आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की ओर से भारत को प्रतिबंधों की चेतावनी दिया जाना केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस अमेरिकी सोच का संकेत है जिसमें वह अब भी दुनिया के कई देशों की विदेश और व्यापार नीति को अपने हितों के अनुरूप देखना चाहता है। भारत के लिए यह स्थिति नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस, ईरान, पश्चिम एशिया और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को इस तरह संतुलित किया है कि राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना अलग-अलग देशों के साथ सहयोग जारी रखा जा सके। भारत और ईरान के बीच संबंधों का अपना लंबा इतिहास है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्ते सदियों पुराने हैं। आधुनिक दौर में भी ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से ईरान भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है। चाबहार बंदरगाह इसका बड़ा उदाहरण है। भारत के लिए यह बंदरगाह केवल व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की रणनीतिक संभावना भी है। ऐसे में यदि भारत ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने की कोशिश करता है तो इसे केवल अमेरिका के नजरिए से देखना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को सीमित करने जैसा होगा। अमेरिका का तर्क है कि ईरान से होने वाली आर्थिक गतिविधियों से वहां की सरकार को आर्थिक लाभ मिल सकता है और उसका इस्तेमाल उन गतिविधियों में हो सकता है जिनका अमेरिका विरोध करता है। यह अमेरिकी नीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन भारत के सामने प्रश्न यह है कि क्या उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश की प्राथमिकताओं के आधार पर तय होगी। भारत का स्पष्ट उत्तर होना चाहिए कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेगा। मित्र देशों की चिंताओं को सुना जा सकता है, लेकिन भारत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर मुद्दे पर किसी अन्य शक्ति की नीति का अनुसरण करे। भारत ने अतीत में भी अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है। ईरान से कच्चे तेल का आयात इसका महत्वपूर्ण उदाहरण रहा है। एक समय भारत ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता था और भुगतान की ऐसी व्यवस्था भी थी जिसमें डॉलर पर निर्भरता कम होती थी। तेल के बदले भारतीय उत्पादों की आपूर्ति का रास्ता भी दोनों देशों के बीच व्यापार को सुगम बनाता था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह व्यवस्था प्रभावित हुई और भारत को ईरान के साथ ऊर्जा व्यापार में काफी सावधानी बरतनी पड़ी। अब परिस्थितियां बदल रही हैं। दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।