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छात्रों के मुद्दे पर राजनीतिक दलों का हृदय परिवर्तन

प्रकाशित: 10-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
देश की राजधानी जंतर मंतर पर एवं राज्यों के अन्य राजधानियों में और विशेष का झारखंड की राजधानी रांची के उभरते छात्र आंदोलनों ने राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को नई दिशा दी है। यह छात्र शक्ति का ही प्रभाव है कि आज सभी राजनीतिक दल छात्र और युवा की समस्याओं को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं। रोजगार, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक, शैक्षणिक सुविधाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों ने राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में अपनी जगह बना ली है। जिस विषय पर कुछ समय पहले तक सीमित चर्चा हो रही थी, वह आज राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है। यह कड़वा सच है कि करीब एक माह पहले तक केंद्र और राज्य सरकारों का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अलग दिखाई देता था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के पक्ष में अपनी आवाज उठाते रहे हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी छात्रों के एक बड़े समूह को संबोधित करते हुए युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की और लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए छात्र प्रदर्शनों और उनकी मांगों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा देखने को मिली है।
छात्र आंदोलनों के शुरुआती दौर में कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रति कठोर और आलोचनात्मक टिप्पणियां भी की गई थीं। कई नेताओं ने आंदोलनों को लेकर आपत्तिजनक और विवादास्पद बयान दिए, जिससे व्यापक बहस छिड़ी। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक दलों और नेताओं के रवैये में बदलाव दिखाई दे रहा है। अब अधिकांश दल यह समझते प्रतीत हो रहे हैं कि युवाओं की आवाज को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से भी संभव नहीं है।
वीरेंद्र कुमार जाटव, दिल्ली।