जस्टिस स्वर्णकांता के सामने पेश नहीं होंगे केजरीवाल, क्या मिलेगी सजा? क्या कहता है कानून
प्रकाशित: 30-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
दिल्ली के पूर्व सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है. उनके अलावा मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि वो या उनके वकील आबकारी मामले में जस्टिस स्वर्णकांता के सामने पेश नहीं होंगे. इस पूरे मामले के कानूनी पहलू को समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट की वकील से बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि किसी जज के सामने पेश होने से इनकार करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है.
जारी हो सकता है वारंट
सुप्रीम कोर्ट की वकील आरुषि कुलश्रेष्ठ ने ऐसे मामलों को लेकर होने वाली कानूनी कार्रवाई के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा, "किसी पक्षकार द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष उपिस्थत होने से जानबूझकर इनकार किया जाता है, जब अदालत ने उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति का स्पष्ट आदेश दिया हो, तो भारतीय कानून के तहत इसे आदेश की अवहेलना माना जाता है. ऐसी स्थिति में न्यायालय पहले बेलेबल वारंट और जरूरी होने पर नॉन-बेलेबल वारंट जारी कर सकता है."
आरुषि ने बताया कि बेलेबल वारंट वह वारंट होता है, जिसमें व्यक्ति को गिरफ्तार तो किया जा सकता है, लेकिन उसे जमानत पाने का अधिकार तुरंत मिलता है. वहीं नॉन-बैलेबल वारंट (NBW) ज्यादा सख्त होता है. इसमें गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को तुरंत जमानत का अधिकार नहीं होता. जमानत केवल अदालत की अनुमति से मिलती है. आमतौर पर ये तब जारी होता है जब व्यक्ति बार-बार अदालत में पेश नहीं होता या फिर कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करता है.
क्या हो सकता है नुकसान?
सुप्रीम कोर्ट की वकील ने बताया कि ऐसे में कार्यवाही को एक्स-पार्टी (बिना उसकी दलील सुने) आगे बढ़ाया जा सकता है. अगर केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक्स-पार्टी कार्यवाही हो जाती है, तो अपील में उनके अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं होते, लेकिन कुछ जरूरी ग्राउंड्स कमजोर हो सकते हैं, जिनमें-
• मुझे सुनवाई का मौका नहीं मिला (violation of natural justice)
• तथ्यों पर पहली बार विवाद (merits challenge)
• प्रक्रियात्मक आपत्तियां (procedural objections), जो निचली अदालत/उच्च न्यायालय में उठानी थीं, उन्हें बाद में उठाने पर रोक लग सकती है
अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है शुरू
कोर्ट में पेश होने से इनकार करने पर कोर्ट Contempt of Courts Act, 1971 के तहत अवमानना कार्यवाही भी शुरू कर सकता है. हालांकि, यदि विधिवत रूप से अधिवक्ता के माध्यम से प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो और व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य न हो, तो आमतौर पर ऐसे कठोर कदम नहीं उठाए जाते. केजरीवाल के मामले में न तो वो अपना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और न ही वकील को भेजने की बात कही गई है. ऐसे में कोर्ट चाहे तो अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकता है.
जारी हो सकता है वारंट
सुप्रीम कोर्ट की वकील आरुषि कुलश्रेष्ठ ने ऐसे मामलों को लेकर होने वाली कानूनी कार्रवाई के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा, "किसी पक्षकार द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष उपिस्थत होने से जानबूझकर इनकार किया जाता है, जब अदालत ने उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति का स्पष्ट आदेश दिया हो, तो भारतीय कानून के तहत इसे आदेश की अवहेलना माना जाता है. ऐसी स्थिति में न्यायालय पहले बेलेबल वारंट और जरूरी होने पर नॉन-बेलेबल वारंट जारी कर सकता है."
आरुषि ने बताया कि बेलेबल वारंट वह वारंट होता है, जिसमें व्यक्ति को गिरफ्तार तो किया जा सकता है, लेकिन उसे जमानत पाने का अधिकार तुरंत मिलता है. वहीं नॉन-बैलेबल वारंट (NBW) ज्यादा सख्त होता है. इसमें गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को तुरंत जमानत का अधिकार नहीं होता. जमानत केवल अदालत की अनुमति से मिलती है. आमतौर पर ये तब जारी होता है जब व्यक्ति बार-बार अदालत में पेश नहीं होता या फिर कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करता है.
क्या हो सकता है नुकसान?
सुप्रीम कोर्ट की वकील ने बताया कि ऐसे में कार्यवाही को एक्स-पार्टी (बिना उसकी दलील सुने) आगे बढ़ाया जा सकता है. अगर केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक्स-पार्टी कार्यवाही हो जाती है, तो अपील में उनके अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं होते, लेकिन कुछ जरूरी ग्राउंड्स कमजोर हो सकते हैं, जिनमें-
• मुझे सुनवाई का मौका नहीं मिला (violation of natural justice)
• तथ्यों पर पहली बार विवाद (merits challenge)
• प्रक्रियात्मक आपत्तियां (procedural objections), जो निचली अदालत/उच्च न्यायालय में उठानी थीं, उन्हें बाद में उठाने पर रोक लग सकती है
अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है शुरू
कोर्ट में पेश होने से इनकार करने पर कोर्ट Contempt of Courts Act, 1971 के तहत अवमानना कार्यवाही भी शुरू कर सकता है. हालांकि, यदि विधिवत रूप से अधिवक्ता के माध्यम से प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो और व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य न हो, तो आमतौर पर ऐसे कठोर कदम नहीं उठाए जाते. केजरीवाल के मामले में न तो वो अपना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और न ही वकील को भेजने की बात कही गई है. ऐसे में कोर्ट चाहे तो अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकता है.