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निर्वाण : जीवन के प्रति एक दृष्टि

प्रकाशित: 30-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
निर्वाण : जीवन के प्रति एक दृष्टि
शिव शंकर द्विवेदी
बुद्ध के विचारों को आज भी आत्मसात करने की आवश्यकता है, न कि इन प्रश्नों पर उलझनें की कि मृत्यु के उपरान्त क्या होगा? मृत्यु के उपरान्त की चिन्ता इतनी नासमझी भरी होती है कि इसके लिए व्यथित लोगों में वर्तमान जीवन को जीने का कोईं विकल्प ही नहीं सूझता है। ऐसे भविष्यजीवी लोग ही होते हैं जिन्हें वर्तमान से भय लगने लगता है।
निर्वाण : जीवन के प्रति एक दृष्टि कहते हैं कि राजवुमार सिद्धार्थ जो कालान्तर में महात्मा बुद्ध के नाम से लोक में विख्यात हुए, को घर से बाहर निकलने के लिए शव यात्राओं ने प्रेरित किया, उन्हें ़जरा के दु:खों से कराहते हुए लोगों ने प्रेरित किया, उन्हें ़जरा और मरण के लिए उत्तरदाईं जन्म ने प्रेरित किया। राजवुमार सिद्धार्थ के पूर्व असंख्य लोगों ने इन घटनाओं को देखा था किन्तु सिद्धार्थ के अतिरित्त किसी ने भी इनके आधार पर गृह त्याग का निर्णय नहीं लिया था, कारण वुछ भी हो सकते हैं।
ये घटनाएं विशेष रूप से ़जरा से कराहते हुए लोगों की आर्तवाणी और शव के साथ लिपट कर रोते बिलखते लोगों की आवाजें भले ही लोगों को उद्वेलित न कर सकी हों किन्तु इन्होंने राजवुमार सिद्धार्थ को घर से निकले के लिए अवश्य ही विवश किया था। इनके अतिरित्त उन्हें स्वर्ग प्राप्ति हेतु की जा रही यज्ञ साधनाओं के माध्यम से भौतिक संसाधनों के अपव्यय ने भी घर से बाहर निकलने के लिए विवश किया था तो यजमानों और पुरोहितों के मध्य खिची रेखाओं ने भी उन्हें घर में नहीं रुकने दिया था।
वर्षो की कठोर तपस्या के उपरान्त जब उन्हें यथार्थ का बोध हुआ तब वह समझ सके कि जिसके स्वर्ग के लिए वर्तमान में उपलब्ध प्रावृतिक संसाधनों का अपव्यय हो रहा है, जिसके लिए समाज यजमान और पुरोहितों के रूप में खिची रेखाओं से संत्रस्त हैं उसकी तो शाश्वत सत्ता ही नहीं है, फिर कौन स्वर्ग का उपभोग करेगा? जब कोईं स्वर्ग का उपभोत्ता ही नहीं है तो फिर स्वर्ग हेतु प्रावृतिक संसाधनों का अपव्यय क्यों और किसके लिए? समाज में समानता की स्वाभाविक स्थितियों को नष्ट करते हुए यजमान और पुरोहितों का अयुदय क्यों और किसके लिए? ज्ञान की श्रृंखला में उन्हें यह भी बोध हुआ कि दु:खों और दु:खद स्थितियों के प्रति दृष्टिकोण को बदलकर उन्हें देखा जाए तो ये न तो उबाऊ हो सकती हैं, न भयभीत करने वाली हो सकती हैं।
ऐतिहासिक रूप में यह बात तथ्यपरक है कि राजवुमार सिद्धार्थ जब बुद्ध हुए तब वापस समाज में लौटे थे क्योंकि उस समय उनकी दृष्टि में समाज एक वृहत्तर परिवार दिख रहा था। उन्हें पारिवारिक हितों की अपेक्षा सामाजिक हित वरेण्य दिख रहा था। बुद्ध होने के उपरान्त समाज में ही वह स्वयं के साथ परिवार को भी शामिल कर चुके थे।
महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के एक सौ साल बाद प्रथम संगती होती है जिसमें बौद्ध धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति को मूर्तरूप देने का प्रयास होता है। समझा जाता है कि यह प्रयास बुद्ध के जीवन आदर्श को केन्द्र में रखकर होता है, ऐसे में समझा जाता है कि बौद्ध लोग बुद्ध के ही अनुगामी हैं किन्तु बुद्ध को समझने के विषय में जानकारी प्राप्त करने हेतु केवल बौद्धों पर केन्द्रित होकर रहने पर बुद्व को नहीं समझा जा सकता है क्योंकि बौद्ध आपस में एकमत नहीं हो सके हैं और जब तक बुद्ध को न समझ लिया जायेगा तब तक बौद्ध धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति को नहीं समझा जा सकता है।
राजवुमार सिद्धार्थ भले ही ़जरा और मरण से उत्पन्न दु:ख और अन्य अनेक दु:खद परिस्थितियों से व्यथित थे किन्तु वह इनके कारण जीवन से न तो हताश थे, न ही जीवन से पलायन इनके किसी कार्यंयोजना में शामिल था। वह सोते हुए परिवारजन को छोड़कर घर से बाहर निकले तो बेहतर सामाजिक जीवन उनकी दृष्टि में था। वह जीवन को वर्तमान दु:खद परिस्थितियों से बाहर निकालने का मार्ग खोजने के उद्देश्य से बाहर निकले थे और जब उन्हें जीवन का यथार्थ बोध हुआ तब वह उस यथार्थ बोध से शेष संसार के लोगों को बोधयुत्त करने के उद्देश्य के साथ लोगों के बीच वापस आये। लोगों के बीच वापस आना ही बुद्ध के बोध का जीवन के प्रति जागरूक होने का परिचायक है। बुद्ध को जो बात समझ में आयी, वह तर्वसंगत थी या नहीं ? वह इसके पीछे उलझना नहीं चाहते थे। यही कारण रहा कि वह ऐसे समस्त प्रश्नों को अव्यावृत समझ कर उनके विषय में मौन रहना ही बेहतर समझा जो उन्हें जीवन के रत्रोत और जीवन के भविष्य की ओर खींचने के लिए होते थे। बुद्ध भले ही इन प्रश्नों पर मौन रहे किन्तु बौद्ध चुप नहीं रह सके।
यही कारण रहा कि उन्हें इन प्रश्नों के सम्बन्ध में सनातन चिन्तकों की ओर से गम्भीर चुनौतियां मिलीं जिनके आगे वे टिक नहीं सके और भारत भूमि से बौद्ध बाहर ही नहीं हुआ अपितु सामान्य जनजीवन में भी प्रभावशून्य होकर रह गया। परिणाम हुआ कि राजसत्ता के बल पर तेजी से बढ़ता हुआ बौद्ध प्रभाव वुछ ही समय में भारतीय समाज में उपेक्षित होकर रह गया।
यदि बौद्धों ने बुद्ध के आदर्श को आगे बढ़ाया होता तो वे धम्मम् को नियतकर्म समझाने में सफल हुए होते। बुद्ध के ज्ञान को समझाने में सफल हुए होते और संघम् सामाजिक समानता और सह- अस्तित्व का उद्घोष वाक्य के रूप में समादृत हुआ होता न कि ये पवित्र उद्घोष बुद्ध को एक सीमित पंथ के प्रवर्तक के रूप में प्रस्तुत कर अपनी भूमिकाओं को औचित्य देकर रह जाते।
बुद्ध के विचारों को आज भी आत्मसात करने की आवश्यकता है, न कि इन प्रश्नों पर उलझनें की, कि मृत्यु के उपरान्त क्या होगा? मृत्यु के उपरान्त की चिन्ता इतनी नासमझी भरी होती है कि इसके लिए व्यथित लोगों में वर्तमान जीवन को जीने का कोईं विकल्प ही नहीं सूझता है। ऐसे भविष्यजीवी लोग ही होते हैं जिन्हें वर्तमान से भय लगने लगता है।
वर्तमान के लोगों के प्रति उन्हें असहिष्णु होने में भी संकोच का अनुभव नहीं हो पाता है। ऐसे भविष्यजीवी लोगों के मन-मस्तिष्क में केवल स्व ही शेष बचता है और ये लोग यह सोच नहीं पाते हैं कि उनके अलावा और लोग भी हैं जिनके साथ रहना एक अपरिहार्यंता है और उनके साथ सह-अस्तित्व की भावना से ही रहा जा सकता है न कि इनके साथ दूरी बनाकर या इनके साथ कटुता का व्यवहार करके जिया जा सकता है। ऐसे ही भविष्यजीवी लोग होते हैं जो जीवन प्रव्रिया से मुत्ति के लिए कपोल कल्पित साधनाओं के चक्कर में पड़कर वर्तमान जीवन के आनन्द को खो बैठते हैं। ऐसे भविष्यजीवी लोगों के मन-मस्तिष्क में बुद्धं शरणं गच्छामि ज्ञान के शरण में जाना न होकर केवल बौद्ध पंथ का अनुगामी बनना ही होकर रह जाता है। ऐसे भविष्यजीवी लोगों के मन-मस्तिष्क में धम्मम् शरणं गच्छामि कर्तव्यनिष्ठ होने के स्थान पर बौद्ध धर्म में जाना ही होकर रह जाता है और ऐसे भविष्यजीवी लोगों के आचरण में सर्वसामाजिकता के स्थान पर केवल बौद्ध पंथ का अनुगामी बनना ही महान् कार्यं होकर रह जाता है।
उत्त के दृष्टिगत हमें यही समझते हुए आगे बढ़ना श्रेयस्कर ही नहीं लगता है अपितु बुद्ध के विचारों के अधिक निकट ले जाने वाला प्रयास लगता है कि भविष्य की चिन्ता को छोड़कर वर्तमान जीवन को महत्व दिया जाए और समझा जाए कि वर्तमान जीवन में यशोमय आनन्द की प्राप्ति तभी संभव है जब समाज को रेखांकित किया जाये और समाज में सह- अस्तित्व की भावनाओं से युत्त होकर रहा जाये। किसी को उसके कर्म की प्रवृति के आधार पर मूल्यांकित न किया जाए क्योंकि सामाजिक हित में सभी कर्म समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। अतएव इन्हें सम्पादित करने वाले लोग भी महत्वपूर्ण और सम्माननीय हैं।
समाज और जीवन के प्रति यही दृष्टिकोण ही वैयत्तिक और सामाजिक जीवन में वह व्रान्ति ला सकता है जिससे वैयत्तिक और सामाजिक जीवन यशोमय आनन्द के साथ खिल सकता है अन्यथा तो तर्को के सहारे केवल तर्वजीवी होकर ही रहा जा सकता है न कि यशोमय आनन्द के साथ।
महात्मा बुद्ध के जीवन के प्रति उत्त विचार ही अ-मोक्ष सोच हैं और बुद्ध के द्वारा बताये गये जीवन यापन के लिए साधनाएं अ-मोक्ष साधानाएं हैं क्योंकि ये साधनाएं जीवन से जुड़ी हैं।
महात्मा बुद्ध को उनके अवतरण दिवस पर कोटि-कोटि हरदिक नमन।
(लेखक उप्र शासन के पूर्व संयुक्त सचिव हैं।)