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आप में पड़ी पूट, राघव चड्ढा ने साथ छोड़ा, केजरीवाल के लिए झटका

प्रकाशित: 30-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आप में पड़ी पूट, राघव चड्ढा ने साथ छोड़ा, केजरीवाल के लिए झटका
अशोक उपाध्याय
न्यायपालिका को इस लड़ाईं में घसीटने की उनकी कोशिश भले ही उनके वुछ समर्थकों को बांधे रखने में सफल होती दिखे लेकिन अंत में कानून अपना रास्ता अख्तियार करेगा जहां वह खुद का बचाव कर सकते थे, केजरीवाल के लिए पाटा और व्यत्तिगत रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है।
आप में पड़ी पूट, राघव चड्ढा ने साथ छोड़ा, केजरीवाल के लिए झटका भारतीय जनता पाटा में शामिल होने के बाद अपने पहले बयान में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने कहा है कि उन्होंने आम आदमी पाटा से मोहभंग होने के बाद पाटा छोड़ दी। उन्होंने कहा कि पाटा की विषात्त कार्यंशैली से निराशा के कारण उन्होंने यह कदम उठाया और कहा कि वे सार्वजनिक जीवन में सव्रिय रहेंगे।
37 वषाय राज्यसभा सांसद ने पिछले सप्ताह इंस्टाग्राम छोड़ने के बाद एक ही दिन में अपने दस लाख फॉलोअर्स खो दिये। अब राघव चड्ढा ने इंस्टाग्राम पर वापसी की है जिसे अक्सर जेनरेशन जेड मतदाताओं के बीच किसी राजनेता की लोकप्रियता का सूचक माना जाता है ताकि अपनी लोकप्रियता में आईं गिरावट को रोका जा सके और अपने फॉलोअर्स के बीच गलतफहमी दूर की जा सके।
अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आम आदमी पाटा समय के साथ बदल गईं है और अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। इसके वर्तमान कामकाज की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आज यह पाटा पुरानी पाटा नहीं रही। आज इस पाटा में काम करने का माहौल बहुत खराब है।
आपको काम करने से रोका जाता है। आपको संसद में बोलने से रोका जाता है।’’
आम आदमी पाटा (आप) के सात राज्यसभा सदस्यों के सामूहिक दल-बदल ने आप के नेता अरविद केजरीवाल को करारा झटका दिया है। राघव चड्ढा और संदीप पाठक के नेतृत्व में इस समूह ने भाजपा में विलय के लिए आवश्यक दो-तिहाईं बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया जिससे उन्हें बतौर सांसद अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ेगा।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने बहुमत हासिल कर लिया है। पहले राज्यसभा में भाजपा की संख्या 106 थी जबकि एनडीए के पास 121 सदस्य थे। राघव चड्ढा, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिह, अशोक मित्तल, विाम साहनी और राजेंद्र गुप्ता के शामिल होने से भाजपा की व्यत्तिगत संख्या बढ़कर 113 हो गईं है। एनडीए की वुल सीटों की संख्या बढ़कर 128 हो गईं है। 243 सदस्यों वाली सदन में बहुमत के लिए 122 सीटों की आवश्यकता होती है। 128 सीटों के साथ एनडीए को साधारण बहुमत का लाभ मिल जाएगा। यह एक ऐतिहासिक बदलाव है कांग्रेस के एकदलीय वर्चस्व के युग के बाद पहली बार किसी सत्ताधारी गठबंधन को विवादास्पद सामान्य कानूनों को पारित करने के लिए ठतटस्थठ क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।
जानेमाने सामाजिक कार्यंकर्ता अन्ना हजारे ने कहा है कि अगर आम आदमी पाटा (आप) ने सही रास्ता अपनाया होता तो राघव चड्ढा और छह अन्य आम आदमी पाटा (आप) के राज्यसभा सांसदों के पाटा छोड़ने से बचा जा सकता था।
उन्होंने कहा लोकतंत्र में हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है। उन्हें ( राघव चड्ढा और अन्य लोगों को) वुछ परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, इसीलिए वे चले गए।
अन्ना हजारे की टिप्पणी राघव चड्ढा अशोक मित्तल और संदीप पाठक सहित सात राज्यसभा सांसदों के पाटा छोड़ने के बाद आईं है। अन्ना हजारे ने कहा, ठयह उनकी (आप नेतृत्व की) गलती है।
अगर उस पाटा ने सही रास्ता अपनाया होता तो वे पाटा छोड़कर नहीं जाते। अन्ना हजारे ने कहा, उनके पाटा छोड़ने का कोईं न कोईं कारण जरूर होगा। लोकतंत्र में हर व्यत्ति का अपना मत होता है कि उसे कहां रहना है और कहां छोड़ना है।
अरविद केजरीवाल के खिलाफ अन्ना हजारे की टिप्पणी के मायने गंभीर हैं जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है। इसका असर पंजाब की राजनीति पर पड़ेगा जहां आप की सरकार है। दिल्ली की सत्ता खोने के बाद आप के लिये पंजाब में सत्ता को बचाये रखने की नईं चुनौती खड़ी हो गईं है। भले ही मुख्यमंत्री भगवंत सिह मान इसे बड़ी चुनौती नहीं मान रहे हैं लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पाटा के राज्यसभा सांसदों के पलायन से जनता में गलत संदेश गया है।
खासतौर से राघव चड्ढा की छवि साफ सुथरी रही है और वह अरविद केजरीवाल पर शराब घोटाले और ‘शीशमहल’ घोटाले के बचाव में कभी भी सामने नहीं आये।
केजरीवाल अब ईंडी मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा पर व्यत्तिगत दोषारोपण का सहारा ले रहे हैं और केजरीवाल द्वारा उन्हें भेजे एक पत्र के बाद सियासी और कानूनी हलकों में नईं बहस छिड़ गईं है। इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें अब न्यायाधीश स्वर्णकांता शर्मा की अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही जिसके चलते उन्होंने न केवल स्वयं अदालत में पेश न होने का निर्णय लिया है बल्कि अपने वकील को भी पेश न होने देने की बात कही है। केजरीवाल ने अपने इस पैसले को महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रेरित बताते हुए कहा कि अब वे कानूनी लड़ाईं के बजाय नैतिक और वैचारिक विरोध का रास्ता अपनाएंगे।
केजरीवाल भले ही न्यायाधीश स्वर्ण कांता पर अविश्वास की चादर डालकर राजनीति के नये हथियार उठाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कानून के लंबे हाथ पहले भी उनके लिये मुसीबतें खड़ी कर चुके हैं जिस कारण से उन्हें दिल्ली की सत्ता गंवानी पड़ी। पहले भी उन्होंने घोटालों में पंसने के बाद कईं राजनीतिक प्रयोग किये लेकिन उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी।
नैतिकता और वैचारिक लड़ाईं के नाम पर केजरीवाल के प्रयोग ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया लेकिन केजरीवाल हर पायदान पर खुद फिसलते चले गये। न्यायपालिका को इस लड़ाईं में घसीटने की उनकी कोशिश भले ही उनके वुछ समर्थकों को बांधे रखने में सफल होती दिखे लेकिन अंत में कानून अपना रास्ता अख्तियार करेगा जहां वह खुद का बचाव कर सकते थे, केजरीवाल के लिये पाटा और व्यत्तिगत रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है।
(लेखक यूनीवार्ता के पूर्व संपादक हैं।)