अधर्म के अंत और अटूट विश्वास का दिव्य शंखनाद है नृसिह अवतार नृसिह जयंती पर विशेष
प्रकाशित: 30-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में वुछ पर्व केवल तिथियों के उत्सव नहीं बल्कि जीवन-दर्शन के ऐसे प्रकाशस्तंभ हैं, जो युगों-युगों तक मानवता को दिशा देते रहते हैं। नृसिह जयंती ऐसा ही एक दिव्य पर्व है, जो यह उद्घोष करता है कि जब-जब अधर्म अपनी सीमाए लांघता है और अहंकार सत्य को चुनौती देता है, तब ईंश्वर स्वयं धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पावन दिवस भगवान विष्णु के चौथे अवतार (नृसिह) के प्राकटा का प्रतीक है। इस वर्ष नृसिह जयंती अथवा नृसिह प्रकटोत्सव 30 अप्रैल को मनाईं जा रही है। नृसिह अवतार की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि यह ईंश्वर के ‘उग्र’ और ‘करुण’ दोनों ही स्वरूपों का एक साथ दर्शन कराता है। आधा मनुष्य और आधा सिह रूप में प्रकट होकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि दिव्यता किसी सीमित परिभाषा में बंधी नहीं होती। यह अवतार केवल दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अंत का कारण नहीं बना बल्कि इससे यह संदेश भी मिला कि जब अन्याय अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है, तब न्याय किसी अप्रत्याशित रूप में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या करके ब्रrा से ऐसा वरदान प्राप्त किया, जिसने उसे लगभग अजेय बना दिया। वह न दिन में मारा जा सकता था, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न मनुष्य से, न पशु से। यह वरदान उसके लिए केवल सुरक्षा कवच नहीं बल्कि अहंकार का विष बन गया। उसने स्वयं को ईंश्वर घोषित कर दिया और समस्त प्रजा से अपनी ही पूजा करवाने लगा लेकिन इसी अंधकार के बीच उसके पुत्र प्रह्लाद ने सत्य और भत्ति का दीप जलाए रखा। यहां से इस कथा का सबसे गहरा आध्यात्मिक आयाम सामने आता है, एक ओर अहंकार से अंधा हुआ पिता और दूसरी ओर अटूट विश्वास से प्रकाशित पुत्र। प्रह्लाद की भत्ति केवल धरमिक कर्मकांड नहीं थी बल्कि वह सत्य के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक थी। उसे विष दिया गया, अग्नि में बैठाया गया, ऊंचाईं से गिराया गया कितु हर बार ईंश्वर की अदृश्य वृपा ने उसकी रक्षा की। प्रह्लाद का विश्वास था, ‘नारायण सर्वत्र हैं’ और यही विश्वास अंतत: साकार हो उठा।
जब अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, तब वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब ईंश्वर ने एक ऐसी लीला रची, जो आज भी अद्वितीय मानी जाती है। एक जड़ खंभे से गर्जना के साथ प्रकट होकर भगवान विष्णु ने ‘नृसिह’ रूप धारण किया। यह प्राकटा केवल चमत्कार नहीं था बल्कि यह घोषणा थी कि ईंश्वर जड़ और चेतन दोनों में समान रूप से विदृामान हैं।
उन्होंने संध्या समय, सभा भवन की देहरी पर, अपनी जंघा पर बैठाकर और अपने नखों से हिरण्यकशिपु का वध किया।
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या करके ब्रrा से ऐसा वरदान प्राप्त किया, जिसने उसे लगभग अजेय बना दिया। वह न दिन में मारा जा सकता था, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न मनुष्य से, न पशु से। यह वरदान उसके लिए केवल सुरक्षा कवच नहीं बल्कि अहंकार का विष बन गया। उसने स्वयं को ईंश्वर घोषित कर दिया और समस्त प्रजा से अपनी ही पूजा करवाने लगा लेकिन इसी अंधकार के बीच उसके पुत्र प्रह्लाद ने सत्य और भत्ति का दीप जलाए रखा। यहां से इस कथा का सबसे गहरा आध्यात्मिक आयाम सामने आता है, एक ओर अहंकार से अंधा हुआ पिता और दूसरी ओर अटूट विश्वास से प्रकाशित पुत्र। प्रह्लाद की भत्ति केवल धरमिक कर्मकांड नहीं थी बल्कि वह सत्य के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक थी। उसे विष दिया गया, अग्नि में बैठाया गया, ऊंचाईं से गिराया गया कितु हर बार ईंश्वर की अदृश्य वृपा ने उसकी रक्षा की। प्रह्लाद का विश्वास था, ‘नारायण सर्वत्र हैं’ और यही विश्वास अंतत: साकार हो उठा।
जब अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, तब वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब ईंश्वर ने एक ऐसी लीला रची, जो आज भी अद्वितीय मानी जाती है। एक जड़ खंभे से गर्जना के साथ प्रकट होकर भगवान विष्णु ने ‘नृसिह’ रूप धारण किया। यह प्राकटा केवल चमत्कार नहीं था बल्कि यह घोषणा थी कि ईंश्वर जड़ और चेतन दोनों में समान रूप से विदृामान हैं।
उन्होंने संध्या समय, सभा भवन की देहरी पर, अपनी जंघा पर बैठाकर और अपने नखों से हिरण्यकशिपु का वध किया।