गुजरात नगर निकाय और पंचायत चुनाव में फिर खिला कमल
प्रकाशित: 29-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
संजय सक्सेना
गुजरात की राजनीतिक जमीन पर एक बार फिर भाजपा ने अपनी मजबूत पकड़ दिखा दी है। अगले साल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए नगर निकाय और पंचायत चुनावों में भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन किया, जिससे विपक्षी दलों के चेहरों पर हताशा छा गईं।
इस बार वुल पंद्रह नगर निगमों, 94 नगर पालिकाओं, चौंतीस जिला पंचायतों और ढाईं सौ साठ तालुका पंचायतों में मतदान हुआ। नवसारी, गांधीधाम, मोरबी और वापी समेत नौ नए नगर निगमों में भी पहली बार वोट पड़े, और इन सबमें भाजपा ने कमाल कर दिखाया।
मतदान में करीब अठारह लाख मतदाताओं ने हिस्सा लिया, जो वुल मतदाताओं का पचपन प्रतिशत से ज्यादा है। बड़े शहरों में भाजपा को खासा समर्थन मिला, जिसने पाटा को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी। यह जीत न केवल स्थानीय मुद्दों पर वेंद्रित रही, बल्कि विकास, बुनियादी सुविधाओं और शासन की दक्षता पर जनता के भरोसे को भी उजागर करती है।
विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, को इन चुनावों में करारी शिकस्त मिली, जो उनकी कमजोर संगठन क्षमता और जनाधार खोने का संकेत देती है।
इस जीत ने गुजरात की जनता के मनोबल को ऊंचा कर दिया है।
भाजपा कार्यंकर्ताओं में उत्साह की लहर दौड़ गईं है, जबकि विपक्षी खेमे में सन्नाटा पसर गया। राज्य सरकार के विकास कार्यो, जैसे सड़वें, पानी की आपरूति, स्वच्छता अभियान और बिजली व्यवस्था पर जनता का विश्वास मजबूत हुआ है।
बड़े शहरों में भाजपा ने न केवल सीटें हथियाईं, बल्कि पार्षदों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी की।
छोटे नगरों और ग्रामीण इलाकों में भी यही कहानी दोहराईं गईं। यह चुनाव गुजरात मॉडल के पक्ष में एक बड़ा स्टांप लगाने जैसा साबित हुआ। जनता ने साफ संदेश दिया कि स्थानीय स्तर पर शासन की गुणवत्ता ही असली मुद्दा है। भाजपा ने जातिगत समीकरणों को तोड़ते हुए व्यापक समर्थन जुटाया, जो उसके संगठन की ताकत को दर्शाता है।
नगर निगम चुनावों में भाजपा ने अपनी ताकत का पूर्ण प्रदर्शन किया। पंद्रह नगर निगमों में से अधिकांश में भाजपा ने साफ बहुमत हासिल कर लिया।
अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट जैसे प्रमुख शहरों में भाजपा ने पार्षदों की भारी संख्या जीती। इन शहरों में विकास कार्यो का श्रेय लेकर भाजपा ने मतदाताओं का दिल जीत लिया।
उदाहरण के लिए, अहमदाबाद नगर निगम में भाजपा ने वुल सीटों में से आधे से ज्यादा पर कब्जा जमाया। सूरत में भी यही हाल रहा, जहां व्यापारी वर्ग ने भाजपा को जमकर समर्थन दिया। नए नगर निगमों जैसे गांधीधाम और वापी में पहली बार चुनाव होने पर भाजपा ने सारी सीटें जीत लीं। यह नईं जगहों पर भी पाटा की पैठ बढ़ने का प्रमाण है।
कांग्रेस को इन चुनावों में बुरी तरह पछाड़ा गया। जहां भाजपा ने बड़े शहरों में मजबूत बढ़त बनाईं, वहीं कांग्रेस को छोटे-मोटे लाभ ही मिले। सूरत और वडोदरा जैसे शहरों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। आम आदमी पाटा ने भी वुछ जगहों पर कोशिश की, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे।
जनता ने कांग्रेस को ठुकरा दिया क्योंकि पाटा स्थानीय मुद्दों पर कमजोर रही। भाजपा ने स्वच्छता, सीवरेज व्यवस्था और सड़क निर्माण जैसे कार्यो पर जोर देकर मतदाताओं को आर्कषित किया।
मतदान प्रतिशत पचपन से ऊपर रहने से साफ पता चलता है कि शहरी मतदाता सव्रिय थे और उन्होंने भाजपा के पक्ष में पैसला लिया। यह जीत भाजपा को अगले विधानसभा चुनावों में शहरी सीटों पर मजबूत स्थिति देगी। विपक्ष को अब आत्ममंथन करना होगा कि आखिर जनता ने उन्हें क्यों नकार दिया।
उधर, पंचायत चुनावों ने भाजपा की ग्रामीण पकड़ को और पुख्ता कर दिया। चौंतीस जिला पंचायतों और ढाईं सौ साठ तालुका पंचायतों में भाजपा ने बहुमत हासिल किया। ग्रामीण इलाकों में पानी की व्यवस्था, बिजली पहुंच, स्वूलों का निर्माण और वृषि योजनाओं पर भाजपा के प्रयासों को जनता ने सराहा। जिला पंचायतों में भाजपा ने साठ प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीतीं। तालुका स्तर पर भी यही ट्रेंड दिखा। छोटे गांवों से लेकर बड़े तहसील मुख्यालयों तक भाजपा का बोलबाला रहा।
कांग्रेस को पंचायतों में भी करारी हार मिली। कईं जगहों पर कांग्रेस उम्मीदवार जमानत जब्त कराने पर रह गए। आम आदमी पाटा का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में न के बराबर रहा। जनता ने भाजपा को अपनाया क्योंकि पाटा ने ग्रामीण विकास पर ठोस कदम उठाए। मनरेगा जैसी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने, सिचाईं सुविधाओं का विस्तार और स्वास्थ्य वेंद्रों की स्थापना ने ग्रामीण मतदाताओं का दिल जीता।
विपक्ष को ठुकराने का कारण उनकी वादाखिलाफी और संगठन की कमजोरी रही। भाजपा ने ओबीसी, आदिवासी और पटेल समुदायों में अपनी पैठ मजबूत की।
यह जीत ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों के लिए भाजपा को मजबूत आधार देगी।
बहरहाल, इन चुनावों के नतीजों से साफ है कि जनता ने भाजपा को अपनाया और विपक्ष को ठुकरा दिया। भाजपा को वुल मिलाकर अस्सी प्रतिशत से ज्यादा सीटें मिलीं, जो उसके शासन पर भरोसे को दर्शाता है। बड़े शहरों में शहरी विकास और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं ने भाजपा को आगे रखा। कांग्रेस की हार उनकी आंतरिक कलह और कमजोर नेतृत्व का नतीजा है।
आम आदमी पाटा नया खिलाड़ी होने के बावजूद असफल रही।
जनता ने स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी, जैसे स्वच्छता, पानी, बिजली और सड़वें।
भाजपा ने इन पर बेहतर प्रदर्शन किया। यह जीत अगले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त देगी। विपक्ष को अब मजबूत रणनीति बनानी होगी। गुजरात की जनता ने विकास मॉडल को चुना, जो भाजपा की लगातार जीत का राज है। वुल मिलाकर, यह चुनाव गुजरात की राजनीति में भाजपा के प्रभुत्व को स्थापित करते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) भाजपा ने इन पर बेहतर प्रदर्शन किया। यह जीत अगले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त देगी। विपक्ष को अब मजबूत रणनीति बनानी होगी। गुजरात की जनता ने विकास मॉडल को चुना, जो भाजपा की लगातार जीत का राज है।
वुल मिलाकर, यह चुनाव गुजरात की राजनीति में भाजपा के प्रभुत्व को स्थापित करते हैं।
गुजरात की राजनीतिक जमीन पर एक बार फिर भाजपा ने अपनी मजबूत पकड़ दिखा दी है। अगले साल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए नगर निकाय और पंचायत चुनावों में भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन किया, जिससे विपक्षी दलों के चेहरों पर हताशा छा गईं।
इस बार वुल पंद्रह नगर निगमों, 94 नगर पालिकाओं, चौंतीस जिला पंचायतों और ढाईं सौ साठ तालुका पंचायतों में मतदान हुआ। नवसारी, गांधीधाम, मोरबी और वापी समेत नौ नए नगर निगमों में भी पहली बार वोट पड़े, और इन सबमें भाजपा ने कमाल कर दिखाया।
मतदान में करीब अठारह लाख मतदाताओं ने हिस्सा लिया, जो वुल मतदाताओं का पचपन प्रतिशत से ज्यादा है। बड़े शहरों में भाजपा को खासा समर्थन मिला, जिसने पाटा को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी। यह जीत न केवल स्थानीय मुद्दों पर वेंद्रित रही, बल्कि विकास, बुनियादी सुविधाओं और शासन की दक्षता पर जनता के भरोसे को भी उजागर करती है।
विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, को इन चुनावों में करारी शिकस्त मिली, जो उनकी कमजोर संगठन क्षमता और जनाधार खोने का संकेत देती है।
इस जीत ने गुजरात की जनता के मनोबल को ऊंचा कर दिया है।
भाजपा कार्यंकर्ताओं में उत्साह की लहर दौड़ गईं है, जबकि विपक्षी खेमे में सन्नाटा पसर गया। राज्य सरकार के विकास कार्यो, जैसे सड़वें, पानी की आपरूति, स्वच्छता अभियान और बिजली व्यवस्था पर जनता का विश्वास मजबूत हुआ है।
बड़े शहरों में भाजपा ने न केवल सीटें हथियाईं, बल्कि पार्षदों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी की।
छोटे नगरों और ग्रामीण इलाकों में भी यही कहानी दोहराईं गईं। यह चुनाव गुजरात मॉडल के पक्ष में एक बड़ा स्टांप लगाने जैसा साबित हुआ। जनता ने साफ संदेश दिया कि स्थानीय स्तर पर शासन की गुणवत्ता ही असली मुद्दा है। भाजपा ने जातिगत समीकरणों को तोड़ते हुए व्यापक समर्थन जुटाया, जो उसके संगठन की ताकत को दर्शाता है।
नगर निगम चुनावों में भाजपा ने अपनी ताकत का पूर्ण प्रदर्शन किया। पंद्रह नगर निगमों में से अधिकांश में भाजपा ने साफ बहुमत हासिल कर लिया।
अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट जैसे प्रमुख शहरों में भाजपा ने पार्षदों की भारी संख्या जीती। इन शहरों में विकास कार्यो का श्रेय लेकर भाजपा ने मतदाताओं का दिल जीत लिया।
उदाहरण के लिए, अहमदाबाद नगर निगम में भाजपा ने वुल सीटों में से आधे से ज्यादा पर कब्जा जमाया। सूरत में भी यही हाल रहा, जहां व्यापारी वर्ग ने भाजपा को जमकर समर्थन दिया। नए नगर निगमों जैसे गांधीधाम और वापी में पहली बार चुनाव होने पर भाजपा ने सारी सीटें जीत लीं। यह नईं जगहों पर भी पाटा की पैठ बढ़ने का प्रमाण है।
कांग्रेस को इन चुनावों में बुरी तरह पछाड़ा गया। जहां भाजपा ने बड़े शहरों में मजबूत बढ़त बनाईं, वहीं कांग्रेस को छोटे-मोटे लाभ ही मिले। सूरत और वडोदरा जैसे शहरों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। आम आदमी पाटा ने भी वुछ जगहों पर कोशिश की, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे।
जनता ने कांग्रेस को ठुकरा दिया क्योंकि पाटा स्थानीय मुद्दों पर कमजोर रही। भाजपा ने स्वच्छता, सीवरेज व्यवस्था और सड़क निर्माण जैसे कार्यो पर जोर देकर मतदाताओं को आर्कषित किया।
मतदान प्रतिशत पचपन से ऊपर रहने से साफ पता चलता है कि शहरी मतदाता सव्रिय थे और उन्होंने भाजपा के पक्ष में पैसला लिया। यह जीत भाजपा को अगले विधानसभा चुनावों में शहरी सीटों पर मजबूत स्थिति देगी। विपक्ष को अब आत्ममंथन करना होगा कि आखिर जनता ने उन्हें क्यों नकार दिया।
उधर, पंचायत चुनावों ने भाजपा की ग्रामीण पकड़ को और पुख्ता कर दिया। चौंतीस जिला पंचायतों और ढाईं सौ साठ तालुका पंचायतों में भाजपा ने बहुमत हासिल किया। ग्रामीण इलाकों में पानी की व्यवस्था, बिजली पहुंच, स्वूलों का निर्माण और वृषि योजनाओं पर भाजपा के प्रयासों को जनता ने सराहा। जिला पंचायतों में भाजपा ने साठ प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीतीं। तालुका स्तर पर भी यही ट्रेंड दिखा। छोटे गांवों से लेकर बड़े तहसील मुख्यालयों तक भाजपा का बोलबाला रहा।
कांग्रेस को पंचायतों में भी करारी हार मिली। कईं जगहों पर कांग्रेस उम्मीदवार जमानत जब्त कराने पर रह गए। आम आदमी पाटा का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में न के बराबर रहा। जनता ने भाजपा को अपनाया क्योंकि पाटा ने ग्रामीण विकास पर ठोस कदम उठाए। मनरेगा जैसी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने, सिचाईं सुविधाओं का विस्तार और स्वास्थ्य वेंद्रों की स्थापना ने ग्रामीण मतदाताओं का दिल जीता।
विपक्ष को ठुकराने का कारण उनकी वादाखिलाफी और संगठन की कमजोरी रही। भाजपा ने ओबीसी, आदिवासी और पटेल समुदायों में अपनी पैठ मजबूत की।
यह जीत ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों के लिए भाजपा को मजबूत आधार देगी।
बहरहाल, इन चुनावों के नतीजों से साफ है कि जनता ने भाजपा को अपनाया और विपक्ष को ठुकरा दिया। भाजपा को वुल मिलाकर अस्सी प्रतिशत से ज्यादा सीटें मिलीं, जो उसके शासन पर भरोसे को दर्शाता है। बड़े शहरों में शहरी विकास और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं ने भाजपा को आगे रखा। कांग्रेस की हार उनकी आंतरिक कलह और कमजोर नेतृत्व का नतीजा है।
आम आदमी पाटा नया खिलाड़ी होने के बावजूद असफल रही।
जनता ने स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी, जैसे स्वच्छता, पानी, बिजली और सड़वें।
भाजपा ने इन पर बेहतर प्रदर्शन किया। यह जीत अगले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त देगी। विपक्ष को अब मजबूत रणनीति बनानी होगी। गुजरात की जनता ने विकास मॉडल को चुना, जो भाजपा की लगातार जीत का राज है। वुल मिलाकर, यह चुनाव गुजरात की राजनीति में भाजपा के प्रभुत्व को स्थापित करते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) भाजपा ने इन पर बेहतर प्रदर्शन किया। यह जीत अगले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त देगी। विपक्ष को अब मजबूत रणनीति बनानी होगी। गुजरात की जनता ने विकास मॉडल को चुना, जो भाजपा की लगातार जीत का राज है।
वुल मिलाकर, यह चुनाव गुजरात की राजनीति में भाजपा के प्रभुत्व को स्थापित करते हैं।