अक्षया ध्येयनिष्ठा में अहंकार का घुन?
प्रकाशित: 05-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. बलराम मिश्र
गत जुलाई मास के उत्तरार्ध में देश में नेपाल एवं बांग्लादेश जैसी अराजकता उत्पन्न करने के प्रयासों के अंतर्गत कुछ भारत विरोधी विदेशी तत्वों के द्वारा छात्रों के नाम पर प्रायोजित/भड़काए गए उपद्रव अतीव लज्जाजनक रहे। ऐसी स्थिति बनी क्यों, यह हर भारतीय के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
लोक सेवा आयोग एवं इंडियन मिलिटरी अकादेमी के द्वारा निर्मित, और प्रचलित स्टील फ्रेम के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वीरव्रती स्वयं सेवकों के द्वारा निर्मित देशव्यापी संघ शाखाओं का भी एक सुदृढ़ स्टील फ्रेम है, जो व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में अहर्निशि सक्रिय रहने के लिए कृतसंकल्प है। इस ने ही बजरंग दल एवं दुर्गा वाहिनी जैसे अनेक सक्षम संगठन खड़े किये। इन दोनों स्टील फ्रेमों के होते हुए भी दिल्ली एवं कुछ अन्य स्थानों पर हुड़दंग कैसे हुए? यह सभी के, और प्रमुख रूप से, संघ के लिए सोचने का विषय है। संघ अपने आत्मीय संपर्क एवं संवाद के लिए जाना जाता रहा। दिल्ली में संघ कार्य की पैनी प्रबलता एवं सक्षमता का लोहा नेहरू सरकार ने भी माना था, यद्यपि उन्हों ने संघ को कुचलकर नष्ट करने की बात कही थी।
वर्ष 1946 में एक बार जब महात्मा गांधी दिल्ली की बाल्मीकि कॉलोनी (तब उसे भंगी कॉलोनी कहा जाता था) में ठहरे थे तो तत्कालीन नेहरू सरकार को यह सूचना मिली कि कुछ रक्त पिपासु लीगी गुंडे गांधी जी पर जानलेवा हमला करने वाले है। तब गांधी जी की सुरक्षा हेतु कांग्रेस सरकार ने तत्कालीन दिल्ली प्रांत के संघ प्रचारक श्री मान बसंतराव ओक जी से यह निवेदन करें कि वे गांधी जी की सुरक्षा की व्यवस्था करें। संघ की अद्भुत कार्य शैली के अनुसार अविलंब पूर्ण गणवेश धारी स्वयं सेवकों का एक जत्था गांधी जी कि सुरक्षा में तैनात हो गया।
वर्ष 2006 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक प पू श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर, उपाख्य श्री गुरुजी के जीवन एवं उपलब्धियों पर बनी फिल्म कर्मयोगी के लिए शोध कार्य करते हुए इन पंक्तियों के लेखक को उन में से कुछ स्वयंसेवकों से बात करने का सौभाग्य मिला था जो गांधी जी की सुरक्षा में तैनात थे, वे हैं सर्वश्री लाला दुलीचंद जी, रामेश्वर दास जी, मास्टर ऋषिपाल जी, सत्यप्रकाश जी।
विभाजन के कुछ ही दिनों के बाद, सितंबर 1947 में गांधी जी ने श्रीगुरु जी से मिलने की इच्छा प्रकट की थी। गांधी जी को यह भली भाँति पता था कि संघ का देश प्रेम अटूट है और संघ की शक्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जब श्री गुरु जी को गांधी जी की इच्छा की जानकारी मिली तो वे स्वयं दिल्ली आए और बिड़ला भवन में उन से भेंट किया। उसके बाद गांधी जी ने शांति की जो अपील जारी की उस में श्री गुरु जी से भेंट का उल्लेख किया। उस भेंट में गांधी जी ने संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करने की इच्छा व्यक्त की। तदनुसार 16 सितंबर 1947 को तत्कालीन भंगी कॉलोनी में एक खुले मैदान में संघ के 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया। अगले दिन समाचार पत्र ‘हिन्दू' में गांधी जी के भाषण का समाचार प्रकाशित हुआ, वर्षों पूर्व जब संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार जीवित थे, गांधी जी ने एक संघ शिविर देखा था। वे उन का (स्वयंसेवकों का) अनुशासन, उन की कठोर सादगी और अस्पृश्यता से सर्वथा मुक्त उन का आचरण देख कर गदगद हो उठे थे। महात्मा गांधी ने विश्वास व्यक्त किया था, जो भी संगठन इस प्रकार की सेवा और त्याग के उच्च आदर्श से अनुप्राणित हो गा उस की शक्ति तो दिनोंदिन बढ़ती ही जाएगी।
1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा यातायात एवं नागरिक सुरक्षा में दिए योगदान से नेहरू सरकार ने वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए संघ को आमंत्रित किया था। पूर्ण गणवेश एवं घोष के साथ लगभग तीन हजार स्वयंसेवकों ने राजपथ (वर्तमान कर्तव्य पथ) पर उस पथसञ्चलन में भाग लिया था। ऐसे अनेक अवसरों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवकों ने भारत माता के प्रति भक्तिभाव से प्रेरित कार्य किया, किन्तु उन की चर्चा करने का अर्थ कुछ वैसा ही होता जैसे कोई व्यक्ति यह डींग मारे कि उसने आपनी माता जी की सेवा किया। संघ में आत्मश्लाघा की परंपरा कभी नहीं रही। किसी भी आपदा प्रबंधन में संघ के स्वयंसेवक टिड्डी दल की भाँति उपस्थित हो जाते हैं।
संघ की इस प्रकार की अतुल्य प्रष्टभूमि होते हुए भी दिल्ली हिला देने वाली ऐसी घटना क्यों घटी? इस का विश्लेषण करते समय सम्राट अशोक के युग में बौद्ध भिक्षुओं के उत्कर्ष तथा बौद्ध धर्म के क्रमिक ह्रास की घटना याद आती है। आइए अब वर्तमान वस्तुस्थिति का विहंगावलोकन करें।
बाल्यकाल से ही संघ के स्वयंसेवक रहे प्रधान मंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी आज देश के राष्ट्रवादी युवा वर्ग के लिए एक रोलमोडेल हैं। हर तरुण विस्तारक/ प्रचारक आगे चल कर मोदी जैसा बनने के सपने देख रहा लगता है। स्वयंसेवक समृद्ध होते जा रहे हैं, किन्तु संघ में गुणात्मक क्षरण दिखाई देता है, इसी लिए फोकस व्यक्ति निर्माण से हट कर नेता निर्माण पर पर टिक गया लगता है, शाखाओं पर नहीं, चुनाव बूथों पर।
संघ ने इस तथ्य की ओर ध्यान ही नहीं दिया लगता कि प्रचारक वर्ग में, विशेष रूप से युवकों में, संकल्प से सिद्धि की ओर अंगद पद बढ़ाने की प्रक्रिया में वे जाने अनजाने भयंकर अहंकार का शिकार बनते जा रहे हैं, जो आज संघ सृष्टि के लगभग हर प्रकल्प में मिलता है।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व संघ की कार्य पद्धति में स्वयंसेवकों की चिंता बिल्ली के द्वारा अपने बच्चे को मुंह में दबा कर चलने जैसी थी। स्वयंसेवकों की चिंता होती थी। श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी कहा करते थे, कार्य की नहीं, कार्यकर्ता की चिंता करो, सब ठीक रहेगा, इस पर ध्यान नहीं दिया गया। मोदी युग प्रारंभ होते ही संघ की कार्य पद्धति बंदर और उस के बच्चे जैसी हो गई, जिस में बच्चे से अपेक्षा रहती है कि यदि जीवित रहना है तो वह माँ के पेट से चिपका रहे। प्रचारक स्वयं को अति समर्थ बॉस मानने लगा। लोक संग्रही सेवा भाव के स्थान पर अहंकार युक्त आदेश की परंपरा चल पड़ी। चाटुकारिता को गुण माना जाने लगा।
आज वस्तुस्थिति यह है कि देश की सभी समस्याओं के उपजने या समाधान में समाज संघ की भूमिका सूंघने का आदी बन गया। सर्वाधिक चिंता का विषय होना चाहिए भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का दुर्गंध युक्त डबल अहंकार, एक संघ की पृष्टभूमि का और दूसरा मंत्रिपद का, जिस की फल श्रुति से ऐसे लोग उपजे जो संघ के इस गीत तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें को इस प्रकार गाने लगे, मेरा वैभव अमर रहे माँ तू दिन चार रहे न रहे। अब आशा के केवल दो ही केंद्र हैं, परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं परम वंदनीय प्रधान मंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार, जो भारत की गौरव युक्त अस्मिता की रक्षा एवं भारत राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर ले जाने के लिए कटिबद्ध है।
गत जुलाई मास के उत्तरार्ध में देश में नेपाल एवं बांग्लादेश जैसी अराजकता उत्पन्न करने के प्रयासों के अंतर्गत कुछ भारत विरोधी विदेशी तत्वों के द्वारा छात्रों के नाम पर प्रायोजित/भड़काए गए उपद्रव अतीव लज्जाजनक रहे। ऐसी स्थिति बनी क्यों, यह हर भारतीय के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
लोक सेवा आयोग एवं इंडियन मिलिटरी अकादेमी के द्वारा निर्मित, और प्रचलित स्टील फ्रेम के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वीरव्रती स्वयं सेवकों के द्वारा निर्मित देशव्यापी संघ शाखाओं का भी एक सुदृढ़ स्टील फ्रेम है, जो व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में अहर्निशि सक्रिय रहने के लिए कृतसंकल्प है। इस ने ही बजरंग दल एवं दुर्गा वाहिनी जैसे अनेक सक्षम संगठन खड़े किये। इन दोनों स्टील फ्रेमों के होते हुए भी दिल्ली एवं कुछ अन्य स्थानों पर हुड़दंग कैसे हुए? यह सभी के, और प्रमुख रूप से, संघ के लिए सोचने का विषय है। संघ अपने आत्मीय संपर्क एवं संवाद के लिए जाना जाता रहा। दिल्ली में संघ कार्य की पैनी प्रबलता एवं सक्षमता का लोहा नेहरू सरकार ने भी माना था, यद्यपि उन्हों ने संघ को कुचलकर नष्ट करने की बात कही थी।
वर्ष 1946 में एक बार जब महात्मा गांधी दिल्ली की बाल्मीकि कॉलोनी (तब उसे भंगी कॉलोनी कहा जाता था) में ठहरे थे तो तत्कालीन नेहरू सरकार को यह सूचना मिली कि कुछ रक्त पिपासु लीगी गुंडे गांधी जी पर जानलेवा हमला करने वाले है। तब गांधी जी की सुरक्षा हेतु कांग्रेस सरकार ने तत्कालीन दिल्ली प्रांत के संघ प्रचारक श्री मान बसंतराव ओक जी से यह निवेदन करें कि वे गांधी जी की सुरक्षा की व्यवस्था करें। संघ की अद्भुत कार्य शैली के अनुसार अविलंब पूर्ण गणवेश धारी स्वयं सेवकों का एक जत्था गांधी जी कि सुरक्षा में तैनात हो गया।
वर्ष 2006 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक प पू श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर, उपाख्य श्री गुरुजी के जीवन एवं उपलब्धियों पर बनी फिल्म कर्मयोगी के लिए शोध कार्य करते हुए इन पंक्तियों के लेखक को उन में से कुछ स्वयंसेवकों से बात करने का सौभाग्य मिला था जो गांधी जी की सुरक्षा में तैनात थे, वे हैं सर्वश्री लाला दुलीचंद जी, रामेश्वर दास जी, मास्टर ऋषिपाल जी, सत्यप्रकाश जी।
विभाजन के कुछ ही दिनों के बाद, सितंबर 1947 में गांधी जी ने श्रीगुरु जी से मिलने की इच्छा प्रकट की थी। गांधी जी को यह भली भाँति पता था कि संघ का देश प्रेम अटूट है और संघ की शक्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जब श्री गुरु जी को गांधी जी की इच्छा की जानकारी मिली तो वे स्वयं दिल्ली आए और बिड़ला भवन में उन से भेंट किया। उसके बाद गांधी जी ने शांति की जो अपील जारी की उस में श्री गुरु जी से भेंट का उल्लेख किया। उस भेंट में गांधी जी ने संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करने की इच्छा व्यक्त की। तदनुसार 16 सितंबर 1947 को तत्कालीन भंगी कॉलोनी में एक खुले मैदान में संघ के 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया। अगले दिन समाचार पत्र ‘हिन्दू' में गांधी जी के भाषण का समाचार प्रकाशित हुआ, वर्षों पूर्व जब संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार जीवित थे, गांधी जी ने एक संघ शिविर देखा था। वे उन का (स्वयंसेवकों का) अनुशासन, उन की कठोर सादगी और अस्पृश्यता से सर्वथा मुक्त उन का आचरण देख कर गदगद हो उठे थे। महात्मा गांधी ने विश्वास व्यक्त किया था, जो भी संगठन इस प्रकार की सेवा और त्याग के उच्च आदर्श से अनुप्राणित हो गा उस की शक्ति तो दिनोंदिन बढ़ती ही जाएगी।
1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा यातायात एवं नागरिक सुरक्षा में दिए योगदान से नेहरू सरकार ने वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए संघ को आमंत्रित किया था। पूर्ण गणवेश एवं घोष के साथ लगभग तीन हजार स्वयंसेवकों ने राजपथ (वर्तमान कर्तव्य पथ) पर उस पथसञ्चलन में भाग लिया था। ऐसे अनेक अवसरों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवकों ने भारत माता के प्रति भक्तिभाव से प्रेरित कार्य किया, किन्तु उन की चर्चा करने का अर्थ कुछ वैसा ही होता जैसे कोई व्यक्ति यह डींग मारे कि उसने आपनी माता जी की सेवा किया। संघ में आत्मश्लाघा की परंपरा कभी नहीं रही। किसी भी आपदा प्रबंधन में संघ के स्वयंसेवक टिड्डी दल की भाँति उपस्थित हो जाते हैं।
संघ की इस प्रकार की अतुल्य प्रष्टभूमि होते हुए भी दिल्ली हिला देने वाली ऐसी घटना क्यों घटी? इस का विश्लेषण करते समय सम्राट अशोक के युग में बौद्ध भिक्षुओं के उत्कर्ष तथा बौद्ध धर्म के क्रमिक ह्रास की घटना याद आती है। आइए अब वर्तमान वस्तुस्थिति का विहंगावलोकन करें।
बाल्यकाल से ही संघ के स्वयंसेवक रहे प्रधान मंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी आज देश के राष्ट्रवादी युवा वर्ग के लिए एक रोलमोडेल हैं। हर तरुण विस्तारक/ प्रचारक आगे चल कर मोदी जैसा बनने के सपने देख रहा लगता है। स्वयंसेवक समृद्ध होते जा रहे हैं, किन्तु संघ में गुणात्मक क्षरण दिखाई देता है, इसी लिए फोकस व्यक्ति निर्माण से हट कर नेता निर्माण पर पर टिक गया लगता है, शाखाओं पर नहीं, चुनाव बूथों पर।
संघ ने इस तथ्य की ओर ध्यान ही नहीं दिया लगता कि प्रचारक वर्ग में, विशेष रूप से युवकों में, संकल्प से सिद्धि की ओर अंगद पद बढ़ाने की प्रक्रिया में वे जाने अनजाने भयंकर अहंकार का शिकार बनते जा रहे हैं, जो आज संघ सृष्टि के लगभग हर प्रकल्प में मिलता है।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व संघ की कार्य पद्धति में स्वयंसेवकों की चिंता बिल्ली के द्वारा अपने बच्चे को मुंह में दबा कर चलने जैसी थी। स्वयंसेवकों की चिंता होती थी। श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी कहा करते थे, कार्य की नहीं, कार्यकर्ता की चिंता करो, सब ठीक रहेगा, इस पर ध्यान नहीं दिया गया। मोदी युग प्रारंभ होते ही संघ की कार्य पद्धति बंदर और उस के बच्चे जैसी हो गई, जिस में बच्चे से अपेक्षा रहती है कि यदि जीवित रहना है तो वह माँ के पेट से चिपका रहे। प्रचारक स्वयं को अति समर्थ बॉस मानने लगा। लोक संग्रही सेवा भाव के स्थान पर अहंकार युक्त आदेश की परंपरा चल पड़ी। चाटुकारिता को गुण माना जाने लगा।
आज वस्तुस्थिति यह है कि देश की सभी समस्याओं के उपजने या समाधान में समाज संघ की भूमिका सूंघने का आदी बन गया। सर्वाधिक चिंता का विषय होना चाहिए भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का दुर्गंध युक्त डबल अहंकार, एक संघ की पृष्टभूमि का और दूसरा मंत्रिपद का, जिस की फल श्रुति से ऐसे लोग उपजे जो संघ के इस गीत तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें को इस प्रकार गाने लगे, मेरा वैभव अमर रहे माँ तू दिन चार रहे न रहे। अब आशा के केवल दो ही केंद्र हैं, परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं परम वंदनीय प्रधान मंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार, जो भारत की गौरव युक्त अस्मिता की रक्षा एवं भारत राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर ले जाने के लिए कटिबद्ध है।