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जंतर-मंतर आंदोलन, सरकार की नरमी और कानून का दायरा

प्रकाशित: 05-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
नीट-यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन ने देशभर में छात्रों की पीड़ा, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और सरकार की जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया। इस आंदोलन के बाद घटपाम कई नए मोड़ों से गुजरा। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर यह स्पष्ट किया कि आंदोलन में शामिल छात्रों के विरुद्ध कोई नई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। दूसरी ओर, हिंसा, तोड़फोड़ और गंभीर अपराधों के आरोपों में दर्ज लगभग 2700 एफआईआर वापस नहीं ली जाएंगी। इससे सरकार ने एक संदेश देने का प्रयास किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानून तोड़ने के बीच स्पष्ट अंतर किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से कहा कि छात्रों के भविष्य को देखते हुए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है या हिंसक गतिविधियों में भाग लिया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी। मुख्य न्यायाधीश ने भी यह टिप्पणी की कि यदि पुलिस ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छात्र आंदोलन की आड़ में किसी भी गंभीर अपराध के आरोपी को संरक्षण न मिले। यह टिप्पणी लोकतंत्र और कानून के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। नीट परीक्षा से जुड़े विवाद ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को मानसिक तनाव दिया। ऐसे समय में युवाओं का अपनी आवाज उठाना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।