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फुटपाथ पर अतिक्रमण एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा

प्रकाशित: 22-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में में फुटपाथ पर अतिक्रमण एक आम बात है जिस पर सरकार काम भी करती है लेकिन फुटपाथ से अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका है। सड़क पर दुर्घटनाओं के कारण 1,75,000 लोगों की मृत्यु सन 2024 में रिकॉर्ड की गई है इनमें से अकेले 25000 फुटफाथ के अभाव में सड़क पर चलने वाले पैदल यात्री है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने। एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और सुगम फुटपाथ केवल शहरी सुविधाओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन और गरिमा से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का अभिन्न अंग हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायालय ने पैदल यात्रियों के अधिकारों को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार प्राप्त है और यह अधिकार किसी भी आधुनिक एवं संवेदनशील समाज की बुनियादी आवश्यकता है। अपामांक राष्ट्रव्यापी समस्या है जिस पर सभी राजनीतिक दल के उदासीनता स्पष्ट दिखाई देती है जब तक इस मुद्दे पर राज्य सरकार है गंभीर नहीं होगी तब तक यह समस्या बनी रहेगी। यह निर्णय उस मामले के संदर्भ में आया जिसमें फुटपाथ के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही के कारण एक बच्चे की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि यदि संबंधित क्षेत्र में सुरक्षित फुटपाथ की व्यवस्था होती तो संभवत उस बच्चे की जान बचाई जा सकती थी। न्यायालय ने पीड़ित परिवार को दी गई मुआवजा राशि को बढ़ाने का भी निर्देश दिया और यह संदेश दिया कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि भारत के शहरों में विकास की योजनाएं अक्सर मोटर वाहनों को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं, जबकि पैदल चलने वाले लोग, बच्चे, बुजुर्ग, दिव्यांग और महिलाएं सबसे अधिक उपेक्षित रहते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं हैं, बल्कि पैदल यात्रियों का भी उन पर समान अधिकार है। यदि नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो यह उनके जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि किसी भी शहर की सभ्यता और संवेदनशीलता का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वहां पैदल चलने वालों के लिए कितनी सुरक्षित और व्यवस्थित व्यवस्था है। सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष हजारों लोग अपनी जान गंवा देते हैं और इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की होती है जो सड़क किनारे पैदल चल रहे होते हैं। ऐसे में सुरक्षित फुटपाथ केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का भी महत्वपूर्ण साधन हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक मानवीय और प्रगतिशील दृष्टिकोण को सामने लाता है। यह निर्णय इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे पहले अधिकार उस आम नागरिक का है जो पैदल चल रहा है। सुरक्षित फुटपाथ, सुरक्षित जीवन का आधार हैं और राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक नागरिक को भयमुक्त और सुरक्षित वातावरण में चलने का अवसर उपलब्ध कराए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।