नीतीश कुमार चले राज्यसभा की ओर, बिहार का नया मुख्यमंत्री कौन
प्रकाशित: 13-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अशोक उपाध्याय
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर चौंकाने वाला फैसला लिया और राज्यसभा की सदस्यता के लिये अपना नामांकन दाखिल किया है। इस फैसले ने राजनीतिक हल्कों में चर्चा की पोटली खोल दी है, कुछ इसे भविष्य के लिये नया राजनीतिक दांव मान रहे हैं तो कुछ यह कह रहे हैं नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाकर नया संदेश दिया है।
बिहार की सत्ता छोड़ने से पहले नीतीश कुमार समृद्धि यात्रा के अगले चरण के लिये निकल पडे हैं। नीतीश ने सुपौल को 569.36 करोड़ की योजनाओं की सौगात दी। दरअसल नीतीश कुमार पांच दिन में 10 जिलों का दौरा करेंगे जो 14 मार्च तक चलेगा। इस दौरे की जद में राज्य के सीमांचल और कोसी के इलाके रहेंगे। इस दौरान वह स्थानीय प्रशासन के साथ समीक्षा बैठकें करेंगे और जनहित की योजनाओं का शिलान्यास एवं उद्घाटन करेंगे।
नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच अब एक ही परिवार से जुड़ी दो अलग-अलग राजनीतिक यात्राओं की तैयारी की। एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी ‘समृद्धि यात्रा' के अंतिम चरण पर निकल पडे हैं तो दूसरी ओर उनके बेटे निशांत कुमार भी अपनी पहली राजनीतिक यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। पूरे घटपाम पर राजनीतिक दलों की प्रतिािढयाएं भी सामने आई हैं। भारतीय जनता पार्टी बिहार में जनता दल यूनाइटेड के साथ मिलकर सरकार चला रही है और उसने कहा कि निशांत कुमार की यात्रा पार्टी का आंतरिक मामला है। पार्टी नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार की यात्राएं हमेशा से जनता से सीधे जुड़ने का एक प्रभावी तरीका रही हैं।
विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल की अलग सोच है। पार्टी का कहना है कि नीतीश कुमार की यात्रा का मकसद यह दिखाना है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने का फैसला उन्होंने अपनी इच्छा से लिया है न कि किसी दबाव में। विपक्ष का यह भी कहना है कि राजनीति और प्रशासन को समझने के लिए निशांत कुमार को अलग से यात्रा करने के बजाय अपने पिता के साथ समृद्धि यात्रा में शामिल होना चाहिए था।
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में इन दोनों यात्राओं को काफी अहम माना जा रहा है। एक तरफ यह नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने का प्रयास है तो दूसरी ओर निशांत कुमार के राजनीतिक सफर की शुरुआत के तौर पर भी इसे देखा जा रहा है। ऐसे में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बन चुका है। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मिथिला की बेटी जानकी माता के नाम पर एक भव्य मंदिर का निर्माण शुरू करा दिया है। देश में सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान को मजबूत किया जा रहा है। दरअसल नीतीश कुमार विकास के पर्याय बन चुके हैं। यह भी सत्य है कि उनकी दूरदर्शी नीतियों के कारण आज बिहार के किसी भी कोने से पटना चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकता है।
जनता दल यूनाइटेड ने बिहार में सत्ता में बने रहने के लिये हर तरह के प्रयोग किये, कभी भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लडा तो कभी उसके साथ सरकार बनाई। उन्होंने विपक्ष का हाथ थामा और राष्ट्रीय जनता दल की अगुआईवाले महागठबंधन के साथ मिलकर भी सरकार बनाई और उनकी मेहरबानी के कारण ही राजद नेता तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बने। एक बारगी यह लगने लगा था कि तेजस्वी यादव बिहार की अगली पीढी के मुख्यमंत्री बन जायेंगे लेकिन नीतीश के फिर पासा पलटने उनका सारा गणित गड़बड़ा गया।
समय ने तेजी से करवट लिया और जनता दल यूनाइटेड ने भाजपा का दामन फिर से थाम लिया। भाजपा को नीतीश कुमार का साथ खूब भाया और वह बिहार में सबसे बडे राजनीतिक दल के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने में सफल रही। यह तय माना जा रहा है कि बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनेगा। इस बात की अटकलें जा लगने लगी हैं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, उपमुख्यमंत्री में कोई पदोन्नत किया जायेगा, कोई नया चेहरा होगा या कोई महिला मुख्यमंत्री बनेगी।
फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री का पद खाली नहीं है इसलिये नई तस्वीर सामने आने तक हर किसी को इंतजार ही रहेगा। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र में सरकार बनने के बाद भाजपा में खासतौर से चयन को लेकर किये गये हर फैसले चौंकानेवाले रहे हैं। भाजपा नई पीढी को आगे ला रही है और जिस तरह से अनेक राज्यों में मुख्यमंत्रियों का चयन किया गया उससे स्पष्ट है कि नई पीढी को पार्टी की विरासत को आगे बढाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। गठबंधन की राजनीति को लेकर भाजपा लंबे अरसे सजग है और उसने अपने सहयोगी दलों के साथ तय शर्तों को निभाने में खुद कोताही नही की। जब कभी सहयोगी दलों ने अपने राजनीतिक लाभ के लिये भाजपा से नाता तोडा तो उसने हमेशा ऐसा बर्ताव किया कि वे फिर से एक दूजे के हो सकते हैं। इस दौर में चाहे नीतीश कुमार रहे हों या चन्द्रबाबू नायडू, भाजपा ने संयम बरता और पिछला लोकसभा चुनाव का गणित एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सत्ता में ले आया।
कांग्रेस ने राजग को तोडने की भरसक कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुई। ये दोनों नेता राजग की धुरी बने रहे और नरेन्द्र मोदी के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के साथ भाजपा अपने भविष्य को लेकर संतुलन बनाये हुये है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लोकसभा ने नेता प्रतिपक्ष बने और उन्होंने बिहार फतह करने के लिये चुनाव आयोग को निशाने पर लिया। उन्होंने मतदाता सूची की समीक्षा से जुडी एसआईआर प्रािढया पर सवाल खडे किये और एटम बम फोडने की धमकी दी जो टायं टायं फुस्स हो गया। बिहार में कांग्रेस, राजद नीत महागठबंधन को शर्मनाक पराजय का सामना करना पडा।
नीतीश कुमार का नेतृत्व चट्टान की तरह अभेद्य रहा और भाजपा के साथ रहने का प्रतिफल है कि वह बिहार के सर्वोच्च नेता बने हुए हैं। भले ही वह मुख्यमंत्री पद छोड़ दें लेकिन बिहार पर उनकी पकड़ बनी रहने वाली है। ‘नीतीश कुमार का अगला दांव क्या होगा' इसे लेकर विपक्ष कहानियां तो गढेगा लेकिन कितनी यथार्थ के धरातल को छू पायेंगी ये वक्त बतायेगा।
(लेखक यूनीवार्ता के पूर्व संपादक हैं।)
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर चौंकाने वाला फैसला लिया और राज्यसभा की सदस्यता के लिये अपना नामांकन दाखिल किया है। इस फैसले ने राजनीतिक हल्कों में चर्चा की पोटली खोल दी है, कुछ इसे भविष्य के लिये नया राजनीतिक दांव मान रहे हैं तो कुछ यह कह रहे हैं नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाकर नया संदेश दिया है।
बिहार की सत्ता छोड़ने से पहले नीतीश कुमार समृद्धि यात्रा के अगले चरण के लिये निकल पडे हैं। नीतीश ने सुपौल को 569.36 करोड़ की योजनाओं की सौगात दी। दरअसल नीतीश कुमार पांच दिन में 10 जिलों का दौरा करेंगे जो 14 मार्च तक चलेगा। इस दौरे की जद में राज्य के सीमांचल और कोसी के इलाके रहेंगे। इस दौरान वह स्थानीय प्रशासन के साथ समीक्षा बैठकें करेंगे और जनहित की योजनाओं का शिलान्यास एवं उद्घाटन करेंगे।
नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच अब एक ही परिवार से जुड़ी दो अलग-अलग राजनीतिक यात्राओं की तैयारी की। एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी ‘समृद्धि यात्रा' के अंतिम चरण पर निकल पडे हैं तो दूसरी ओर उनके बेटे निशांत कुमार भी अपनी पहली राजनीतिक यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। पूरे घटपाम पर राजनीतिक दलों की प्रतिािढयाएं भी सामने आई हैं। भारतीय जनता पार्टी बिहार में जनता दल यूनाइटेड के साथ मिलकर सरकार चला रही है और उसने कहा कि निशांत कुमार की यात्रा पार्टी का आंतरिक मामला है। पार्टी नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार की यात्राएं हमेशा से जनता से सीधे जुड़ने का एक प्रभावी तरीका रही हैं।
विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल की अलग सोच है। पार्टी का कहना है कि नीतीश कुमार की यात्रा का मकसद यह दिखाना है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने का फैसला उन्होंने अपनी इच्छा से लिया है न कि किसी दबाव में। विपक्ष का यह भी कहना है कि राजनीति और प्रशासन को समझने के लिए निशांत कुमार को अलग से यात्रा करने के बजाय अपने पिता के साथ समृद्धि यात्रा में शामिल होना चाहिए था।
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में इन दोनों यात्राओं को काफी अहम माना जा रहा है। एक तरफ यह नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने का प्रयास है तो दूसरी ओर निशांत कुमार के राजनीतिक सफर की शुरुआत के तौर पर भी इसे देखा जा रहा है। ऐसे में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बन चुका है। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मिथिला की बेटी जानकी माता के नाम पर एक भव्य मंदिर का निर्माण शुरू करा दिया है। देश में सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान को मजबूत किया जा रहा है। दरअसल नीतीश कुमार विकास के पर्याय बन चुके हैं। यह भी सत्य है कि उनकी दूरदर्शी नीतियों के कारण आज बिहार के किसी भी कोने से पटना चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकता है।
जनता दल यूनाइटेड ने बिहार में सत्ता में बने रहने के लिये हर तरह के प्रयोग किये, कभी भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लडा तो कभी उसके साथ सरकार बनाई। उन्होंने विपक्ष का हाथ थामा और राष्ट्रीय जनता दल की अगुआईवाले महागठबंधन के साथ मिलकर भी सरकार बनाई और उनकी मेहरबानी के कारण ही राजद नेता तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बने। एक बारगी यह लगने लगा था कि तेजस्वी यादव बिहार की अगली पीढी के मुख्यमंत्री बन जायेंगे लेकिन नीतीश के फिर पासा पलटने उनका सारा गणित गड़बड़ा गया।
समय ने तेजी से करवट लिया और जनता दल यूनाइटेड ने भाजपा का दामन फिर से थाम लिया। भाजपा को नीतीश कुमार का साथ खूब भाया और वह बिहार में सबसे बडे राजनीतिक दल के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने में सफल रही। यह तय माना जा रहा है कि बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनेगा। इस बात की अटकलें जा लगने लगी हैं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, उपमुख्यमंत्री में कोई पदोन्नत किया जायेगा, कोई नया चेहरा होगा या कोई महिला मुख्यमंत्री बनेगी।
फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री का पद खाली नहीं है इसलिये नई तस्वीर सामने आने तक हर किसी को इंतजार ही रहेगा। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र में सरकार बनने के बाद भाजपा में खासतौर से चयन को लेकर किये गये हर फैसले चौंकानेवाले रहे हैं। भाजपा नई पीढी को आगे ला रही है और जिस तरह से अनेक राज्यों में मुख्यमंत्रियों का चयन किया गया उससे स्पष्ट है कि नई पीढी को पार्टी की विरासत को आगे बढाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। गठबंधन की राजनीति को लेकर भाजपा लंबे अरसे सजग है और उसने अपने सहयोगी दलों के साथ तय शर्तों को निभाने में खुद कोताही नही की। जब कभी सहयोगी दलों ने अपने राजनीतिक लाभ के लिये भाजपा से नाता तोडा तो उसने हमेशा ऐसा बर्ताव किया कि वे फिर से एक दूजे के हो सकते हैं। इस दौर में चाहे नीतीश कुमार रहे हों या चन्द्रबाबू नायडू, भाजपा ने संयम बरता और पिछला लोकसभा चुनाव का गणित एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सत्ता में ले आया।
कांग्रेस ने राजग को तोडने की भरसक कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुई। ये दोनों नेता राजग की धुरी बने रहे और नरेन्द्र मोदी के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के साथ भाजपा अपने भविष्य को लेकर संतुलन बनाये हुये है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लोकसभा ने नेता प्रतिपक्ष बने और उन्होंने बिहार फतह करने के लिये चुनाव आयोग को निशाने पर लिया। उन्होंने मतदाता सूची की समीक्षा से जुडी एसआईआर प्रािढया पर सवाल खडे किये और एटम बम फोडने की धमकी दी जो टायं टायं फुस्स हो गया। बिहार में कांग्रेस, राजद नीत महागठबंधन को शर्मनाक पराजय का सामना करना पडा।
नीतीश कुमार का नेतृत्व चट्टान की तरह अभेद्य रहा और भाजपा के साथ रहने का प्रतिफल है कि वह बिहार के सर्वोच्च नेता बने हुए हैं। भले ही वह मुख्यमंत्री पद छोड़ दें लेकिन बिहार पर उनकी पकड़ बनी रहने वाली है। ‘नीतीश कुमार का अगला दांव क्या होगा' इसे लेकर विपक्ष कहानियां तो गढेगा लेकिन कितनी यथार्थ के धरातल को छू पायेंगी ये वक्त बतायेगा।
(लेखक यूनीवार्ता के पूर्व संपादक हैं।)