लोकतंत्र का संकल्प
प्रकाशित: 13-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
विपक्ष द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए संकल्प के अस्वीकृत होने के एक दिन बाद ओम बिरला ने सदन के पीठ पर विराजमान हुए और उन्होंने सदस्यों का इस बात के लिए आभार व्यक्त किया कि उन्होंने उनके प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया किन्तु जिन विपक्षी सदस्यों ने उनके खिलाफ तर्क देते हुए आरोप लगाया था कि वह विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का अवसर नहीं देते, बिरला ने उन्हें भी दो टूक जवाब देते हुए कहा कि इस सदन में बोलने से लोकतंत्र का संकल्प मजबूत होता है और सरकार की जवाबदेही भी तय होती है किन्तु साथ ही उन्होंने विपक्ष को जवाब देते हुए कहा कि चाहे सदन के नेता हों, चाहे नेता प्रतिपक्ष हों, मंत्रिगण या अन्य कोई सदस्य हो, सभी को सदन के नियमों के तहत निर्धारित प्रािढया का पालन करते हुए ही बोलने का अधिकार मिलता है। लोकसभा के अध्यक्ष ने अपने खिलाफ संकल्प लाने वाले सदस्यों का यह भ्रम दूर करते हुए स्पष्ट किया कि नेता विपक्ष सदन में कभी भी उठकर किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, यह उनका विशेषाधिकार है, तो यह बिल्कुल सही नहीं है। सदन नियमों से चलता है और सदन के कार्यों का संचालन नियम सदन द्वारा ही बनाए गए हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने जो भी बातें सदन में कही, वह बिल्कुल सही है। सरकार कोई भी हो संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही निर्धारित नियमों के अनुसार ही होती रही है। यह सच है कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ विपक्ष पहली बार यह जानते हुए भी कि वह संख्या बल के आधार पर ओम बिरला को पद से हटा नहीं पाएगा, फिर भी अविश्वास प्रस्ताव ले आया किन्तु जब वोटिंग का समय आया तो मैदान छोड़कर बाहर निकल लिए। इसका मतलब है कि विपक्ष के पास वह नैतिक बल है ही नहीं जो विपक्ष के पास होता है। विपक्ष को इस बात से डरने की जरूरत क्या थी कि यदि वोटिंग हुई तो विपक्ष के सदस्यों का वोट एकजुट नहीं होगा, यह विपक्ष की निर्बल नैतिकता का प्रतीक है। यह लोकसभा अध्यक्ष का ही विशेषाधिकार है कि वह उदारता दिखाते हुए सदस्यों को बोलने की सुविधा दे सकता है किन्तु सच पूछें तो सदन की कार्यवाही रूल बुल के अनुसार ही चल सकती है। अविश्वास प्रस्ताव के पहले नेता प्रतिपक्ष सदन में खड़े होकर ऐसे विषयों पर कई बार बोल चुके हैं। जिसके बारे में उन्होंने कभी भी नोटिस नहीं दिया था। फिर भी यदि उन्हें अवसर मिला तो यह लोकसभा अध्यक्ष के विशेषाधिकार के कारण ही संभव हुआ। अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के एक दिन बाद ही नेता प्रतिपक्ष बृहस्पतिवार को फिर किसी ऐसे विषय पर बोलना चाहते थे जिस पर उन्होंने नोटिस नहीं दिया था, लेकिन बदले परिवेश एवं सदन में तनातनी के बीच लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने आईना दिखाते हुए राहुल गांधी को अनुमति देने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि उन्होंने उक्त विषय पर बोलने का नोटिस नहीं दिया था।
बहरहाल संसद के दोनों सदनों की पीठें सर्वाधिक सम्मानीय हैं किन्तु उनका सम्मान तभी कायम रह सकता है जब पक्ष-विपक्ष दोनों उसका आदर करें। आज लोकसभा अध्यक्ष को मात्र इसलिए राजनीति में घसीटा जा रहा है क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष संसदीय मर्यादा की किसी एक परिभाषा को मानते ही नहीं। पहले सरकारों और विपक्षी पार्टियों के बीच संवाद सूत्र होते थे जो अवरोधों को दूर करने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में होते थे। सदन की पीठ भी दोनों सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सहयोगत्मक प्रािढया के अनुरूप आचरण करती थी। आज जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं तो पीठासीन अधिकारी यानि लोकसभा अध्यक्ष पर ही विपक्ष द्वारा गुस्सा निकालना स्वाभाविक है। यदि विपक्ष को सरकार से नाराजगी है तो वह सदन में नोटिस देकर सरकार के खिलाफ मामला उठाए अथवा अविश्वास प्रस्ताव लाए किन्तु संसदीय मर्यादाओं के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी खुंदक लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ न निकाली जाए तो देश के लोकतंत्र के प्रति राजनीतिक पार्टियों का बहुत बड़ा एहसान होगा क्योंकि जब लोकसभा अध्यक्ष बिना किसी दबाव के नियमानुसार दोनों पक्षों को बोलने के अवसर देंगे तभी तो लोकतंत्र का संकल्प मजबूत होगा।
बहरहाल संसद के दोनों सदनों की पीठें सर्वाधिक सम्मानीय हैं किन्तु उनका सम्मान तभी कायम रह सकता है जब पक्ष-विपक्ष दोनों उसका आदर करें। आज लोकसभा अध्यक्ष को मात्र इसलिए राजनीति में घसीटा जा रहा है क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष संसदीय मर्यादा की किसी एक परिभाषा को मानते ही नहीं। पहले सरकारों और विपक्षी पार्टियों के बीच संवाद सूत्र होते थे जो अवरोधों को दूर करने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में होते थे। सदन की पीठ भी दोनों सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सहयोगत्मक प्रािढया के अनुरूप आचरण करती थी। आज जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं तो पीठासीन अधिकारी यानि लोकसभा अध्यक्ष पर ही विपक्ष द्वारा गुस्सा निकालना स्वाभाविक है। यदि विपक्ष को सरकार से नाराजगी है तो वह सदन में नोटिस देकर सरकार के खिलाफ मामला उठाए अथवा अविश्वास प्रस्ताव लाए किन्तु संसदीय मर्यादाओं के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी खुंदक लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ न निकाली जाए तो देश के लोकतंत्र के प्रति राजनीतिक पार्टियों का बहुत बड़ा एहसान होगा क्योंकि जब लोकसभा अध्यक्ष बिना किसी दबाव के नियमानुसार दोनों पक्षों को बोलने के अवसर देंगे तभी तो लोकतंत्र का संकल्प मजबूत होगा।