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संसार के प्रति सकारात्मक सोच ही ईश्वर की पूजा है

प्रकाशित: 13-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
संसार के प्रति सकारात्मक सोच ही ईश्वर की पूजा है
शिव शंकर द्विवेदी
ईश्वर के सम्बन्ध में कवि और मनीषी - ईश्वर के सम्बन्ध में बुद्धि के द्वारा की गई कल्पना और मन के द्वारा की गई कल्पना में केवल एक बात ही समान होती है और वह यह है कि दोनों का इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व नहीं होता है अर्थात् जिस सत्ता के विषय में बुद्धि से विचार होता है उसका इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व नहीं होता है और जिस सत्ता के विषय में मन से विचार होता है उसका भी इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व नहीं होता है क्योंकि इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व की एक ही परिभाषा है कि जो इन्द्रियप्रत्यक्षगम्य है वह अस्तित्ववान् होता है ऐसे में उसका या तो इन्द्रिय प्रत्यक्ष होता है या उसका इन्द्रिय प्रत्यक्ष किया जा सकता है।
यही कारण रहा कि मनीषियों ने समझा है कि ईश्वर या परमात्मा का न तो साक्षात्कार होता न ही परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसका कारण यही है कि ईश्वर या परमात्मा का अस्तित्व यह है के रूप में नहीं है क्योंकि ईश्वर या परमात्मा के विषय में उनके कर्तृत्व आदि के विषय में मनीषियों ने बुद्धि से विमर्श पूर्वक विचार करके हृदय से स्वीकार किया कि ईश्वर हैं, उनकी सत्ता है और वह ही सम्पूर्ण सृष्टि के निर्माता, पालनकर्ता और संहार कर्ता हैं।
ईश्वर का इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व नहीं है क्योंकि ईश्वर दिखे नहीं हैं अपितु ईश्वर माने गये हैं। ईश्वर हैं, यह एक मान्यता है। ईश्वर का अस्तित्व ऐसी मान्यता है जिसका कभी भी इन्द्रिय प्रत्यक्षगम्य अस्तित्व संभव नहीं है, जिसका कभी भी इन्द्रिय प्रत्यक्ष संभव नहीं है। यह माना जाता है कि ईश्वर हैं और वह समग्रता के साथ ऐश्वर्यवान्, वीर्यवान्, यशस्वी, श्रीमान् ज्ञानवान् और वैरागी हैं।
भक्त और ईश्वर - मनीषियों के विपरीत जो लोग ईश्वर के विषय में मन से सोचते हैं वे ईश्वर को अनन्त गुणों से युक्त समझते हैं। ऐसे लोगों के ही ईश्वर कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् सक्षम होते हैं। ऐसे लोगों के ही ईश्वर एक साथ न्याधीश और करूणाकर दोनों होते हैं। ऐसे लोग मन की सभी कल्पनाओं को ईश्वर में एक साथ देख सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए ईश्वर के सम्बन्ध में औचित्यानौचित्य, संगति -असंगति आदि का कोई मतलब नहीं रह जाता है। ऐसे लोगों का ईश्वर इनके साथ खेलते खाते या राशि लीलाएं करते हैं। ऐसे लोगों का ईश्वर गुनाहों को माफ करने वाले होते हैं।
भक्त के ईश्वर और ऋतम् - विचारणीय है कि भक्त के ईश्वर से ऋतम् में सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है? स्पष्ट है कि नहीं क्योंकि ऐसा होने पर कोई भी व्यवस्था में व्यवधान करके अपने मनकल्पित ईश्वर की शरण में जाकर अपने गुनाहों को माफ करने के लिए कठोर साधनाओं के माध्यम से ईश्वर की करुणा दृष्टि पाकर गुनाहों के फल से मुक्त हो सकता है जबकि यथार्थ यह है कि कर्म को उसके फल देने से रोकने में कोई भी सक्षम नहीं है, यही तो कर्म-फल का ऋतम् है।
सनातन चिन्तन में ईश्वर - जब मैं उद्घोषित करता हूं कि सनातन में धर्म, दर्शन और साहित्य में लोक कल्याण को केंद्र में रखा गया है तो उसका आधार यही होता है सनातन धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति में में परमात्मा के सम्बन्ध में बुद्धि से विमर्श किया गया है। एक लोकहित संरक्षक या व्यवस्थापक के लिए न्यायप्रिय होना अपरिहार्य होता है जबकि व्यक्तिगत हित संरक्षक के लिए न्यायप्रिय नहीं अपितु करुणाकर होना अपेक्षित होता है जो उसके समस्त गुनाहों को माफ करने की शक्ति रखता हो। न्यायप्रिय के लिए मूल्यवान न्याय होता है। उसका न तो कोई प्रिय होता न अप्रिय। न्यायप्रिय चाटुकारिता में विश्वास नहीं करता है। उसके लिए आराधना, भेंट, पूजा, क्षमा प्रार्थना आदि का कोई मतलब नहीं होता है। न्यायप्रियता ऋतम् के लिए अपरिहार्य है। ऋतम् जीवन में शान्ति और आनन्द के लिए अपरिहार्य है। ऐसे में मन से परिकल्पित ईश्वर की अपेक्षा मनीषा अर्थात् बुद्धि के माध्यम से परिकल्पित ईश्वर को ही सनातन चिन्तन, धर्म और जीवन पद्धति में आदरणीय समझाया गया है।
ईश्वर के विषय में मनीषा अर्थात् बुद्धि से विचार करने के कारण सनातन धर्म, दर्शन एवं जीवन पद्धति में पाखंडी सोच को पूरी तरह से नकार दिया गया है। इस प्रकार से जो लोग ईश्वर के साक्षात्कार के लिए साधनाएं करते हैं वे असनातनी हैं और सनातन धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति की दृष्टि से पाखंडी हैं।
ईश्वर की आराधना का अपेक्षित है - मैं स्वयं ईश्वर की पूजा अर्चना और आराधना करता हूं क्योंकि मैं समझता हूं कि एक मनुष्य होने के कारण ईश्वर के प्रति समर्पित होना मेरी मनोवैज्ञानिक विवशता है। यही कारण है कि यह समझते हुए भी कि ईश्वर वैरागी हैं, उनका दर्शन नहीं हो सकता है फिर भी मन नहीं मानता है कि मैं अपने हित के लिए ईश्वर से प्रार्थना न करूं।
परिणाम यह होता है कि न चाहते हुए भी संकट से उबरने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने के लिए तत्पर हो जाता हूं। अपने हित के लिए ईश्वर की न्यायप्रियता में व्यवधान पैदा करने का प्रयास करना एक मनुष्य होने के कारण मेरी विवशता होती है। जिस क्षण मेरा विवेक मेरे इस मन पर भारी पड़ जायगा उस क्षण मुझे स्वहित के लिए ईश्वर के आराधना की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि उस समय मुझे स्वहित संवर्धन में ईश्वर की विवशता का बोध होने लगेगा और मैं समझने लगूगां कि ईश्वर मुझे मेरी प्रार्थना के आधार पर मेरी सहायता न करने के लिए विवश हैं। वह चाह कर भी मेरी सहायता नहीं कर सकते हैं क्योंकि वह ऋतम् के प्रति समर्पित हैं न कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति। अभी तो मन का दास होने के कारण मैं ईश्वर को भी बेइमानी करने के लिए विवश करने पर उतारू हूं और उन्हें कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् सक्षम समझ रहा हूं। ईश्वर के विषय में मेरी यही सोच पाखंडी सोच है अर्थात् मनमानी सोच है कि मैं अपनी विवशता को भी बौद्धिक समझूं।
अत एव पूजा-पाठ इस सोच के साथ करना चाहिए कि पूजा अर्चना एक विवशता है न कि यह सोच कर करना चाहिए कि पूजा, अर्चना ईश्वर तक पहुंच रही है या ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम है। यही कारण है कि जो लोग सनातन चिन्तन में विश्वास करते हुए भी ईश्वर के साक्षात्कार के लिए साधनाएं करते हैं और इस विश्वास से करते हैं कि ईश्वर का साक्षात्कार उन्हें हो सकता है तो समझना चाहिए कि वे ही पाखंडी हैं क्योंकि सनातन चिन्तन में समझा जाता है कि ईश्वर का साक्षात्कार किसी साधना से संभव नहीं है क्योंकि ईश्वर के अस्तित्व के विषय में मनीषियों की मनीषा के माध्यम से परिकल्पित धारणा ही एकमात्र प्रमाण है अन्य कुछ भी नहीं।
ईश्वर और श्रीकृष्ण - ईश्वर मनुष्यों के लिए एक मनोवैज्ञानिक विवशता हैं, यही सोच कर श्रीकृष्ण ने अन्तत अर्जुन को परामर्श दिया था कि वह हर समय परमात्मा का स्मरण करते हुए नियतकर्म करें -
तस्मात्सर्वेषुकालेषु मामनुस्मर युद्ध च।
मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम।
उक्त अभिकथन के माध्यम से परमात्मा के रुप में प्रतिष्ठित महान् दार्शनिक श्रीकृष्ण ने लोकहित में अपेक्षित कार्यों के सम्पादन के लिए लोगों से समर्पित होने का आह्वान किया है न कि परमात्मा के साक्षात्कार के माध्यम से मिलने वाली मुक्ति के लिए।
लोकहित में अपेक्षित कार्यों के लिए समर्पित होने के आह्वान के पीछे श्रीकृष्ण की यह सोच काम कर रही थी कि यह संसार शाश्वत रूप से है, यह पहले भी था और भविष्य में भी रहेगा। इस संसार का कोई अन्य विकल्प है ही नहीं। ऐसे में प्रतिकूलताओं से भयभीत होकर वर्तमान संसार से परे परिकल्पित संसार में पलायन करने का कोई औचित्य नहीं है। संसार के प्रति यही दृष्टिकोण ही अ-मोक्ष सोच है।
(लेखक उप्र शासन के पूर्व संयुक्त सचिव हैं।)