वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

परमाणु ताकत में रूस दुनिया में सबसे आगे, भारत बना रहा है डिलेवरी सिस्टम को आधुनिक

प्रकाशित: 19-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
कांतिलाल मांडोत
दुनिया में बदलते सामरिक समीकरणों, बढ़ते तनाव और कई क्षेत्रों में जारी संघर्षों के बीच परमाणु हथियार आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी एसआईपीआरआई की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 तक दुनिया के नौ परमाणु हथियार संपन्न देशों के पास अनुमानित 12,187 परमाणु हथियार थे। इनमें करीब 9,745 हथियार सैन्य भंडार में संभावित इस्तेमाल के लिए उपलब्ध माने गए हैं। लगभग 4,012 परमाणु हथियार मिसाइलों और परिचालन वाले विमानों के साथ तैनात थे। जनवरी 2025 की तुलना में यह संख्या करीब 100 अधिक है। एसआईपीआरआई के अनुसार 2,100 से 2,200 परमाणु हथियार बैलिस्टिक मिसाइलों पर उच्च परिचालन सतर्कता की स्थिति में थे और इनमें लगभग सभी रूस तथा अमेरिका के थे।
रूस और अमेरिका के पास सबसे बड़ा परमाणु जखीरा
परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में रूस सबसे आगे है। एसआईपीआरआई के अनुमान के अनुसार रूस के पास करीब 5,420 और अमेरिका के पास करीब 5,042 परमाणु हथियार हैं। दोनों देशों के पास मिलाकर दुनिया के सैन्य परमाणु भंडार का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा है। इसके बाद चीन करीब 620 परमाणु हथियारों के साथ तीसरे स्थान पर है। फ्रांस के पास करीब 370 और ब्रिटेन के पास करीब 225 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। भारत करीब 190 के साथ छठे और पाकिस्तान करीब 170 के साथ सातवें स्थान पर है। इजराइल के पास करीब 90 और उत्तर कोरिया के पास करीब 60 परमाणु हथियार होने का अनुमान है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति का वैश्विक संतुलन अभी भी मुख्य रूप से रूस और अमेरिका के इर्द-गिर्द केंद्रित है। हालांकि चीन की दिशा भी महत्वपूर्ण हो गई है। एसआईपीआरआई के अनुसार चीन अपने परमाणु जखीरे का विस्तार किसी भी अन्य परमाणु शक्ति की तुलना में तेज गति से कर रहा है। उसके पास जनवरी 2026 तक करीब 620 परमाणु हथियार होने का अनुमान है और वह बड़ी संख्या में मिसाइल प्रणालियों को विकसित और तैनात कर रहा है। चीन के परमाणु आधुनिकीकरण का असर एशिया के सामरिक संतुलन पर भी पड़ता है।
भारत की स्थिति को केवल परमाणु हथियारों की संख्या से नहीं देखा जा सकता। किसी देश की सैन्य शक्ति में परमाणु क्षमता के साथ मिसाइल प्रणाली, समुद्री शक्ति, वायुसेना, थलसेना, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, साइबर क्षमता, रक्षा उद्योग और आधुनिक तकनीक की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इस दृष्टि से भारत दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियों में शामिल है। एसआईपीआरआई के अनुसार 2025 में भारत का सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़कर करीब 92.1 अरब डॉलर हो गया और भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा। अमेरिका 954 अरब डॉलर के साथ पहले, चीन 336 अरब डॉलर के साथ दूसरे और रूस 190 अरब डॉलर के साथ तीसरे स्थान पर था।
भारत की सुरक्षा स्थिति अन्य परमाणु देशों से अलग है। भारत के सामने पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर में चीन जैसी दो परमाणु हथियार संपन्न शक्तियां हैं। दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं और रणनीतिक नीतियों का भारत की सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ता है। चीन के पास भारत की तुलना में परमाणु हथियारों का अनुमानित जखीरा तीन गुने से भी अधिक है और उसका परमाणु आधुनिकीकरण तेज गति से जारी है। दूसरी ओर पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान है।
यही कारण है कि भारत के लिए सैन्य शक्ति को लगातार आधुनिक बनाना महत्वपूर्ण है। सीमा सुरक्षा केवल सैनिकों की संख्या या परमाणु हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। आधुनिक मिसाइल रक्षा, वायु सुरक्षा, समुद्री निगरानी, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, ड्रोन, अंतरिक्ष तकनीक, साइबर सुरक्षा और स्वदेशी रक्षा उत्पादन आज राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं।
दुनिया के बड़े देशों में सैन्य खर्च बढ़ने का एक कारण भी यही बदलता हुआ सुरक्षा वातावरण है। एसआईपीआरआई के अनुसार 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च 2.9 प्रतिशत बढ़कर करीब 2.9 लाख करोड़ डॉलर के बराबर पहुंच गया और लगातार 11वें वर्ष इसमें वृद्धि हुई। अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत दुनिया के पांच सबसे बड़े सैन्य खर्च करने वाले देश रहे।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह सुरक्षा जरूरतों और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करे। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन बढ़ने से न केवल सुरक्षा मजबूत होती है बल्कि विदेशी निर्भरता भी कम होती है। आधुनिक तकनीक और अनुसंधान में निवेश आने वाले समय में पारंपरिक हथियारों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
मजबूत प्रतिरोधक क्षमता ही सुरक्षा की आधारशिला
परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाना अपने आप में किसी देश को अधिक सुरक्षित बनाने का एकमात्र रास्ता नहीं है। परमाणु शक्ति का वास्तविक महत्व विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता, सुरक्षित कमान और नियंत्रण तथा ऐसी क्षमता में है जिससे किसी भी संभावित हमले की स्थिति में प्रभावी जवाब दिया जा सके। भारत लंबे समय से विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता और प्रथम प्रयोग न करने की नीति की बात करता रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत अपनी परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता और प्रथम प्रयोग न करने की नीति के प्रति प्रतिबद्ध है।
वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में भारत को अपनी सुरक्षा नीति का लगातार मूल्यांकन करते रहना होगा। रूस और अमेरिका के विशाल परमाणु जखीरे, चीन के तेजी से बढ़ते परमाणु भंडार और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता के बीच भारत के लिए रणनीतिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है। इसके साथ ही आधुनिक युद्ध का स्वरूप भी बदल रहा है। अब केवल परमाणु हथियार ही नहीं बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर तकनीक, ड्रोन, अंतरिक्ष और सटीक मारक क्षमता भी युद्ध की दिशा प्रभावित कर सकती है।
इसलिए भारत को अपनी रक्षा शक्ति को व्यापक आधार पर मजबूत करना होगा। स्वदेशी रक्षा उत्पादन, अत्याधुनिक अनुसंधान, मजबूत सीमाई ढांचा, समुद्री सुरक्षा, वायु शक्ति और विश्वसनीय रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता पर लगातार निवेश आवश्यक है। किसी भी देश की सुरक्षा केवल बयानबाजी से नहीं बल्कि उसकी वास्तविक क्षमता से सुनिश्चित होती है।
एसआईपीआरआई ने यह भी चेतावनी दी है कि दुनिया में परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण के साथ गलत आकलन और तनाव बढ़ने का खतरा भी बढ़ रहा है। इसलिए भारत के सामने चुनौती दोहरी है। उसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय सैन्य क्षमता बनाए रखनी है और साथ ही परमाणु टकराव के जोखिम को नियंत्रित रखने के लिए जिम्मेदार नीति भी अपनानी है।
रूस का विशाल परमाणु जखीरा, अमेरिका की व्यापक सैन्य क्षमता और चीन का तेजी से बढ़ता सामरिक ढांचा यह संकेत देता है कि आने वाला समय तकनीकी और रणनीतिक रूप से और अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। भारत को इस बदलती दुनिया में अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत करते हुए आर्थिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और सैन्य क्षमता तीनों को साथ लेकर चलना होगा। यही दीर्घकालीन राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत आधारशिला बन सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)