भारत में धर्म की अवधारणा पश्चिमी रिलिजन से अलग : भागवत
प्रकाशित: 19-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
उज्जैन, (भाषा)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने पावार को कहा कि भारत में धर्म की अवधारणा पश्चिमी देशों में प्रचलित रिलिजन की धारणा से अलग है और देश ने विभिन्न मत-पंथों के बीच कभी भेदभाव नहीं किया जो उसकी पंथ-निरपेक्षता की समझ है।
भागवत यहां करीब 1,700 जेन जी प्रतिभागियों को युवा धर्म संसद में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उन्हंे खुशी है कि ऐसे समय में युवा धर्म पर चर्चा कर रहे हैं, जब कुछ लोग इसे बुजुर्गों का विषय मानते हैं। उन्होंने कहा, हमारे यहां राज्य की परंपरा हमेशा समावेशी रही है। वह अपने लोगों में भेदभाव नहीं करता। हमारे लिए पंथ-निरपेक्षता का यही अर्थ है।
भागवत ने कहा कि पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा शासकों और धार्मिक प्राधिकारों के बीच संघर्ष से विकसित हुई और इसलिए इसे भारतीय संदर्भ में उस तरह नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा गया है। धर्म और रिलिजन में अंतर बताते हुए भागवत ने कहा कि दोनों को समानार्थी नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म रिलिजन से ऊपर है और जहां रिलिजन बांधता है, वहीं धर्म मुक्ति और मोक्ष की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा में भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक समानार्थी शब्द नहीं है और पश्चिमी लोगों को समझाने के लिए ऐतिहासिक रूप से रिलिजन शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है। भागवत ने कहा कि धर्म से अलग होने पर रिलिजन संप्रदायवाद का रूप ले सकता है। उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया।
भागवत यहां करीब 1,700 जेन जी प्रतिभागियों को युवा धर्म संसद में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उन्हंे खुशी है कि ऐसे समय में युवा धर्म पर चर्चा कर रहे हैं, जब कुछ लोग इसे बुजुर्गों का विषय मानते हैं। उन्होंने कहा, हमारे यहां राज्य की परंपरा हमेशा समावेशी रही है। वह अपने लोगों में भेदभाव नहीं करता। हमारे लिए पंथ-निरपेक्षता का यही अर्थ है।
भागवत ने कहा कि पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा शासकों और धार्मिक प्राधिकारों के बीच संघर्ष से विकसित हुई और इसलिए इसे भारतीय संदर्भ में उस तरह नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा गया है। धर्म और रिलिजन में अंतर बताते हुए भागवत ने कहा कि दोनों को समानार्थी नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म रिलिजन से ऊपर है और जहां रिलिजन बांधता है, वहीं धर्म मुक्ति और मोक्ष की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा में भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक समानार्थी शब्द नहीं है और पश्चिमी लोगों को समझाने के लिए ऐतिहासिक रूप से रिलिजन शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है। भागवत ने कहा कि धर्म से अलग होने पर रिलिजन संप्रदायवाद का रूप ले सकता है। उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया।