भारतीय संस्कृति का शाश्वत पर्यावरण-दर्शन
प्रकाशित: 05-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आचार्य राघवेन्द्र पी.तिवारी
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। जलवायु परिवर्तन, तापवृद्धि, जल-संकट, वायु-प्रदूषण, वन-विनाश और जैव-विविधता का क्षय गंभीर चुनौती बन गए हैं। आधुनिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अब ‘सतत विकास' तथा ‘पर्यावरणीय संतुलन' की आवश्यकता पर बल देने लगीं हैं, जबकि वैदिक परम्परा ने सहस्रों वर्ष पूर्व ही प्रकृति और मानव के सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध की बात की थी।
वेदों ने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग, देवतुल्य शक्ति और मातृस्वरूप स्वीकार किया। यही कारण है कि वेदों में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति, पर्वत, नदियों एवं समस्त जीव-जगत के प्रति गहन संवेदनशीलता एवं संरक्षण की भावना स्पष्ट झलकती है।
भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन ‘सह-अस्तित्व' पर आधारित है। वैदिक ऋषियों ने प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व में दिव्यता का अनुभव किया। यह दृष्टि आधुनिक पर्यावरणीय विचारधारा से कहीं अधिक व्यापक है। आज जब हम अपनी असीम भोगवादी प्रवृत्ति के कारण प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, तब वेदों का पर्यावरण-दर्शन सम्पूर्ण मानवता के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक हो सकता है।
पर्यावरण की वैदिक अवधारणा - ‘पर्यावरण' शब्द ‘परि' और ‘आवरण' से बना है, जिसका अर्थ है - वह आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। वेदों में पर्यावरण को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचमहाभूतों के रूप में देखा गया है। सम्पूर्ण सृष्टि इन पंचतत्त्वों से बनी है। इनका संतुलन बिगड़ने से सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था प्रभावित होती है।
वैदिक ऋषि जानते थे कि इन तत्वों का अतिक्रमण अंतत मानव के विनाश का कारण बनेगा। ऋग्वेद में प्रकृति के विविध तत्त्वों की स्तुति केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक चेतना की उद्घोषणा है।
पृथ्वी : माता के रूप में वैदिक दृष्टि - अथर्ववेद का ‘पृथ्वी सूक्त' विश्व के सबसे प्राचीन पर्यावरणीय घोषणापत्रों में से एक है। ‘माता भूमि पुत्रो?हं पृथिव्याः' मत्र भारतीय पर्यावरण-दर्शन का मूल आधार है। आधुनिक उपभोक्तावादी दृष्टि पृथ्वी को संसाधनों का भंडार, जबकि वैदिक दृष्टि उसे जीवनदायिनी शक्ति मानती है। पृथ्वी सूक्त में भूमि की उर्वरता, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों और जैव-विविधता के महत्व का अत्यंत मार्मिक वर्णन है- ‘यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा।' अर्थात् ‘पृथ्वी पर वृक्ष और वनस्पतियाँ स्थिर होकर सम्पूर्ण संसार का पालन करती हैं।' वर्तमान परिदृश्य में यह वैदिक चेतना अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है।
जल : जीवन और पवित्रता का आधार - वेदों में जल को केवल एक भौतिक तत्व नहीं, बल्कि सृष्टि के प्राणतत्त्व के रूप में देखा गया है। वैदिक साहित्य में जल को अमृत, औषधि तथा जीवनदाता कहा गया है। ऋषियों ने कहा था कि जहाँ जल है, वहीं जीवन, स्वास्थ्य, समृद्धि और सभ्यता का विकास संभव है। ऋग्वेद में कहा गया है- ‘आपो हिष्ठा मयोभुवाः।' अर्थात् ‘हे जल! तुम आनंद और कल्याण प्रदान करने वाले हो।' भारतीय मनीषा जानते थे कि जल की शुद्धता और संरक्षण के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है। अथर्ववेद में जल से प्रार्थना की गई है कि वह मनुष्य को आरोग्य, ऊर्जा और दीर्घायु प्रदान करे। ऋग्वेद में जल को औषधियों का भंडार बताते हुए कहा गया है - ‘अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा।' अर्थात् ‘जल में समस्त रोगों को दूर करने वाली औषधियाँ विद्यमान हैं।'
भारतीय समाज में नदियों को ‘माता' कहने के पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि गहरी पर्यावरणीय चेतना निहित थी। भारतीय परंपरा में जल-संरक्षण की अद्भुत व्यवस्थाएँ विकसित हुई थीं। राजस्थान के जोहड़, गुजरात की बावड़ियाँ, दक्षिण भारत के मंदिर-तालाब और हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोत इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय समाज जल के महत्व को भलीभाँति समझता था। वर्षाजल संचयन की परंपरा आज जिस रूप में आधुनिक विज्ञान प्रस्तुत कर रहा है, उसका व्यवहारिक रूप भारत में सदियों पहले विद्यमान था। कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब और सरोवर भारतीय ग्राम्य जीवन का महत्वपूर्ण भाग थे। इनकी नियमित सफाई और संरक्षण सामाजिक दायित्व माना जाता था।
आवश्यकता इस बात की है कि हम वैदिक दृष्टि और आधुनिक विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलें। जल-संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जनचेतना से ही सफल होगा है। वर्षाजल संचयन, नदियों की स्वच्छता, प्लास्टिक के उपयोग में कमी, वृक्षारोपण और जल के संयमित उपयोग को जीवनशैली का अंग बनाना होगा। यदि जल को केवल उपभोग की वस्तु माना गया, तो भविष्य में मानवता को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा।
वायु : प्राणतत्त्व - वायु को वेदों में ‘प्राण' कहा गया है। वायु के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। यजुर्वेद में प्रार्थना की गई है - ‘वात आ वातु भेषजं।' अर्थात् ‘वायु औषधि के समान कल्याणकारी होकर बहे।' भारतीय संस्कृति में प्रातकालीन शुद्ध वायु को स्वास्थ्य और दीर्घायु का आधार माना गया है। योग और प्राणायाम की परंपरा भी इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है। उपनिषदों में कहा गया है - ‘प्राणो वै वायुः।' अर्थात् ‘वायु ही प्राण है।' यह वैदिक अनुभूति आधुनिक विज्ञान की उस अवधारणा से मेल खाती है, जिसमें ऑक्सीजन को जीवन का मूल आधार माना गया है।
किन्तु औद्योगिक युग में वायु प्रदूषण गंभीर संकट बन चुका है। कारखानों का धुआँ, वाहनों से निकलने वाली विषैली गैसें, प्लास्टिक और पराली का दहन तथा वृक्षों की निरंतर कटाई वायुमंडल को दूषित कर रही है। अस्थमा, फेफड़ों के रोग, एलर्जी और श्वसन संबंधी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। महानगरों में धुंध और स्मॉग सामान्य दृश्य बन गए हैं। अत आवश्यकता है कि वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण-सुरक्षा को जीवन का अनिवार्य भाग बनाया जाए।
वृक्ष और वनस्पतियों की महिमा - भारतीय परम्परा में वृक्षों को देवतुल्य माना गया। ऋग्वेद और अथर्ववेद में वनस्पतियों की स्तुति करते हुए उन्हें जीवनदाता कहा गया है - ‘वनस्पते शतवल्शो वि रोह।' अर्थात् ‘हे वनस्पति! तुम सौ शाखाओं सहित विकसित हो।' अथर्ववेद में औषधियों के लिए कहा श्ह्न- ‘याः औषधय पूर्वा जाता देवभ्यस्त्रियुगं पुरा।' भारतीय आयुर्वेद का आधार भी वनस्पति-विज्ञान है। तुलसी, नीम, पीपल और वट जैसे वृक्षों का धार्मिक महत्व वास्तव में पर्यावरणीय महत्व से जुड़ा हुआ था। पीपल वृक्ष दिन-रात ऑक्सीजन देने वाला माना जाता है। तुलसी वातावरण को शुद्ध करती है। नीम औषधीय गुणों से भरपूर है। भारतीय समाज ने इन्हें पूजा से जोड़कर इनके संरक्षण की सामाजिक व्यवस्था बनाई थी।
यज्ञ और पर्यावरणीय संतुलन - वेदों में यज्ञ का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। यज्ञ सामूहिक कल्याण, वायुमंडलीय शुद्धि और प्राकृतिक संतुलन का माध्यम माना गया। भगवद्गीता में कहा गया है - ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ कर्मसमुद्भव?' अर्थात् ‘प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से और वर्षा यज्ञ से।' यहाँ ‘यज्ञ' का व्यापक अर्थ है- प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्वपूर्ण कर्म। आधुनिक भाषा में इसे ‘इकोलॉजिकल बैलेंस' कहा जा सकता है।
भारतीय परंपरा में पर्यावरणीय व्यवहार - भारतीय समाज की अनेक परम्पराएँ प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी थीं। इनमें गहन वैज्ञानिकता है। हम पीपल, वट, नीम, तुलसी, अशोक और बेल जैसे वृक्षों की पूजा करते थे। वट-सावित्री व्रत, तुलसी-विवाह और पीपल-पूजन जैसी परम्पराओं ने वृक्षों को सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान की। उद्देश्य द्गह्न- समाज वृक्षों को काटने के बजाय उनका संरक्षण करे। गोवर्धन पूजा, गिरिराज पूजन और वनदेवी की परम्परा के पीछे वन एवं पर्वत संरक्षण की चेतना थी। प्राचीन भारत में अनेक वन ‘देववन' घोषित किए जाते थे, जहाँ वृक्ष काटना निषिद्ध था। भारतीय त्योहार प्रकृति और ऋतु-पा से जुड़े थे। मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, हरियाली तीज, नागपंचमी और छठ जैसे पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के माध्यम थे। इनसे मानव और प्रकृति का संबंध जीवित बना रहता था।
आधुनिक पर्यावरण संकट और वैदिक समाधान - आज का संकट मूलत मानव की असीम भोगवादी प्रवृत्ति का परिणाम है। वैदिक संस्कृति ‘संयम' और ‘संतुलन' की शिक्षा देती है। ईशावास्योपनिषद् का मत्र है - ‘तेन त्यत्तेन भुञ्जीथा।' अर्थात् ‘त्यागपूर्वक भोग करो।' यह मंत्र संदेश देता है कि संसाधनों का उपयोग आवश्यकतानुसार हो, लालचवश नहीं। यही सतत विकास का मूल सिद्धांत है। तभी तो वेदों में सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना की गई है - ‘द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिपृथिवी शान्तिराप शान्ति।ओषधय शान्ति वनस्पतय शान्ति?' यह मत्र सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र की शांति और संतुलन की प्रार्थना है।
उपसंहार - वास्तव में वेदों का पर्यावरण-दर्शन भारत की सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए शाश्वत मार्गदर्शन है। यह धार्मिक कल्पना ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का समन्वित स्वरूप है।
आज विश्व के अनेक पर्यावरणविद् और चिंतक इस दर्शन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ‘लोकल नॉलेज' और ‘इंडिजिनस इकोलॉजी' की अवधारणाएँ वैदिक जीवन-पद्धति के निकट हैं। आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक विकास के साथ वैदिक जीवन-मूल्यों का समन्वय किया जाए। यदि मानव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, संयमित उपभोग और संरक्षण की भावना अपनाए, तो पर्यावरणीय संकटों का समाधान सम्भव है।
(लेखक कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा हैं।)
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। जलवायु परिवर्तन, तापवृद्धि, जल-संकट, वायु-प्रदूषण, वन-विनाश और जैव-विविधता का क्षय गंभीर चुनौती बन गए हैं। आधुनिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अब ‘सतत विकास' तथा ‘पर्यावरणीय संतुलन' की आवश्यकता पर बल देने लगीं हैं, जबकि वैदिक परम्परा ने सहस्रों वर्ष पूर्व ही प्रकृति और मानव के सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध की बात की थी।
वेदों ने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग, देवतुल्य शक्ति और मातृस्वरूप स्वीकार किया। यही कारण है कि वेदों में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति, पर्वत, नदियों एवं समस्त जीव-जगत के प्रति गहन संवेदनशीलता एवं संरक्षण की भावना स्पष्ट झलकती है।
भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन ‘सह-अस्तित्व' पर आधारित है। वैदिक ऋषियों ने प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व में दिव्यता का अनुभव किया। यह दृष्टि आधुनिक पर्यावरणीय विचारधारा से कहीं अधिक व्यापक है। आज जब हम अपनी असीम भोगवादी प्रवृत्ति के कारण प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, तब वेदों का पर्यावरण-दर्शन सम्पूर्ण मानवता के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक हो सकता है।
पर्यावरण की वैदिक अवधारणा - ‘पर्यावरण' शब्द ‘परि' और ‘आवरण' से बना है, जिसका अर्थ है - वह आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। वेदों में पर्यावरण को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचमहाभूतों के रूप में देखा गया है। सम्पूर्ण सृष्टि इन पंचतत्त्वों से बनी है। इनका संतुलन बिगड़ने से सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था प्रभावित होती है।
वैदिक ऋषि जानते थे कि इन तत्वों का अतिक्रमण अंतत मानव के विनाश का कारण बनेगा। ऋग्वेद में प्रकृति के विविध तत्त्वों की स्तुति केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक चेतना की उद्घोषणा है।
पृथ्वी : माता के रूप में वैदिक दृष्टि - अथर्ववेद का ‘पृथ्वी सूक्त' विश्व के सबसे प्राचीन पर्यावरणीय घोषणापत्रों में से एक है। ‘माता भूमि पुत्रो?हं पृथिव्याः' मत्र भारतीय पर्यावरण-दर्शन का मूल आधार है। आधुनिक उपभोक्तावादी दृष्टि पृथ्वी को संसाधनों का भंडार, जबकि वैदिक दृष्टि उसे जीवनदायिनी शक्ति मानती है। पृथ्वी सूक्त में भूमि की उर्वरता, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों और जैव-विविधता के महत्व का अत्यंत मार्मिक वर्णन है- ‘यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा।' अर्थात् ‘पृथ्वी पर वृक्ष और वनस्पतियाँ स्थिर होकर सम्पूर्ण संसार का पालन करती हैं।' वर्तमान परिदृश्य में यह वैदिक चेतना अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है।
जल : जीवन और पवित्रता का आधार - वेदों में जल को केवल एक भौतिक तत्व नहीं, बल्कि सृष्टि के प्राणतत्त्व के रूप में देखा गया है। वैदिक साहित्य में जल को अमृत, औषधि तथा जीवनदाता कहा गया है। ऋषियों ने कहा था कि जहाँ जल है, वहीं जीवन, स्वास्थ्य, समृद्धि और सभ्यता का विकास संभव है। ऋग्वेद में कहा गया है- ‘आपो हिष्ठा मयोभुवाः।' अर्थात् ‘हे जल! तुम आनंद और कल्याण प्रदान करने वाले हो।' भारतीय मनीषा जानते थे कि जल की शुद्धता और संरक्षण के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है। अथर्ववेद में जल से प्रार्थना की गई है कि वह मनुष्य को आरोग्य, ऊर्जा और दीर्घायु प्रदान करे। ऋग्वेद में जल को औषधियों का भंडार बताते हुए कहा गया है - ‘अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा।' अर्थात् ‘जल में समस्त रोगों को दूर करने वाली औषधियाँ विद्यमान हैं।'
भारतीय समाज में नदियों को ‘माता' कहने के पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि गहरी पर्यावरणीय चेतना निहित थी। भारतीय परंपरा में जल-संरक्षण की अद्भुत व्यवस्थाएँ विकसित हुई थीं। राजस्थान के जोहड़, गुजरात की बावड़ियाँ, दक्षिण भारत के मंदिर-तालाब और हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोत इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय समाज जल के महत्व को भलीभाँति समझता था। वर्षाजल संचयन की परंपरा आज जिस रूप में आधुनिक विज्ञान प्रस्तुत कर रहा है, उसका व्यवहारिक रूप भारत में सदियों पहले विद्यमान था। कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब और सरोवर भारतीय ग्राम्य जीवन का महत्वपूर्ण भाग थे। इनकी नियमित सफाई और संरक्षण सामाजिक दायित्व माना जाता था।
आवश्यकता इस बात की है कि हम वैदिक दृष्टि और आधुनिक विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलें। जल-संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जनचेतना से ही सफल होगा है। वर्षाजल संचयन, नदियों की स्वच्छता, प्लास्टिक के उपयोग में कमी, वृक्षारोपण और जल के संयमित उपयोग को जीवनशैली का अंग बनाना होगा। यदि जल को केवल उपभोग की वस्तु माना गया, तो भविष्य में मानवता को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा।
वायु : प्राणतत्त्व - वायु को वेदों में ‘प्राण' कहा गया है। वायु के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। यजुर्वेद में प्रार्थना की गई है - ‘वात आ वातु भेषजं।' अर्थात् ‘वायु औषधि के समान कल्याणकारी होकर बहे।' भारतीय संस्कृति में प्रातकालीन शुद्ध वायु को स्वास्थ्य और दीर्घायु का आधार माना गया है। योग और प्राणायाम की परंपरा भी इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है। उपनिषदों में कहा गया है - ‘प्राणो वै वायुः।' अर्थात् ‘वायु ही प्राण है।' यह वैदिक अनुभूति आधुनिक विज्ञान की उस अवधारणा से मेल खाती है, जिसमें ऑक्सीजन को जीवन का मूल आधार माना गया है।
किन्तु औद्योगिक युग में वायु प्रदूषण गंभीर संकट बन चुका है। कारखानों का धुआँ, वाहनों से निकलने वाली विषैली गैसें, प्लास्टिक और पराली का दहन तथा वृक्षों की निरंतर कटाई वायुमंडल को दूषित कर रही है। अस्थमा, फेफड़ों के रोग, एलर्जी और श्वसन संबंधी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। महानगरों में धुंध और स्मॉग सामान्य दृश्य बन गए हैं। अत आवश्यकता है कि वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण-सुरक्षा को जीवन का अनिवार्य भाग बनाया जाए।
वृक्ष और वनस्पतियों की महिमा - भारतीय परम्परा में वृक्षों को देवतुल्य माना गया। ऋग्वेद और अथर्ववेद में वनस्पतियों की स्तुति करते हुए उन्हें जीवनदाता कहा गया है - ‘वनस्पते शतवल्शो वि रोह।' अर्थात् ‘हे वनस्पति! तुम सौ शाखाओं सहित विकसित हो।' अथर्ववेद में औषधियों के लिए कहा श्ह्न- ‘याः औषधय पूर्वा जाता देवभ्यस्त्रियुगं पुरा।' भारतीय आयुर्वेद का आधार भी वनस्पति-विज्ञान है। तुलसी, नीम, पीपल और वट जैसे वृक्षों का धार्मिक महत्व वास्तव में पर्यावरणीय महत्व से जुड़ा हुआ था। पीपल वृक्ष दिन-रात ऑक्सीजन देने वाला माना जाता है। तुलसी वातावरण को शुद्ध करती है। नीम औषधीय गुणों से भरपूर है। भारतीय समाज ने इन्हें पूजा से जोड़कर इनके संरक्षण की सामाजिक व्यवस्था बनाई थी।
यज्ञ और पर्यावरणीय संतुलन - वेदों में यज्ञ का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। यज्ञ सामूहिक कल्याण, वायुमंडलीय शुद्धि और प्राकृतिक संतुलन का माध्यम माना गया। भगवद्गीता में कहा गया है - ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ कर्मसमुद्भव?' अर्थात् ‘प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से और वर्षा यज्ञ से।' यहाँ ‘यज्ञ' का व्यापक अर्थ है- प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्वपूर्ण कर्म। आधुनिक भाषा में इसे ‘इकोलॉजिकल बैलेंस' कहा जा सकता है।
भारतीय परंपरा में पर्यावरणीय व्यवहार - भारतीय समाज की अनेक परम्पराएँ प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी थीं। इनमें गहन वैज्ञानिकता है। हम पीपल, वट, नीम, तुलसी, अशोक और बेल जैसे वृक्षों की पूजा करते थे। वट-सावित्री व्रत, तुलसी-विवाह और पीपल-पूजन जैसी परम्पराओं ने वृक्षों को सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान की। उद्देश्य द्गह्न- समाज वृक्षों को काटने के बजाय उनका संरक्षण करे। गोवर्धन पूजा, गिरिराज पूजन और वनदेवी की परम्परा के पीछे वन एवं पर्वत संरक्षण की चेतना थी। प्राचीन भारत में अनेक वन ‘देववन' घोषित किए जाते थे, जहाँ वृक्ष काटना निषिद्ध था। भारतीय त्योहार प्रकृति और ऋतु-पा से जुड़े थे। मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, हरियाली तीज, नागपंचमी और छठ जैसे पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के माध्यम थे। इनसे मानव और प्रकृति का संबंध जीवित बना रहता था।
आधुनिक पर्यावरण संकट और वैदिक समाधान - आज का संकट मूलत मानव की असीम भोगवादी प्रवृत्ति का परिणाम है। वैदिक संस्कृति ‘संयम' और ‘संतुलन' की शिक्षा देती है। ईशावास्योपनिषद् का मत्र है - ‘तेन त्यत्तेन भुञ्जीथा।' अर्थात् ‘त्यागपूर्वक भोग करो।' यह मंत्र संदेश देता है कि संसाधनों का उपयोग आवश्यकतानुसार हो, लालचवश नहीं। यही सतत विकास का मूल सिद्धांत है। तभी तो वेदों में सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना की गई है - ‘द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिपृथिवी शान्तिराप शान्ति।ओषधय शान्ति वनस्पतय शान्ति?' यह मत्र सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र की शांति और संतुलन की प्रार्थना है।
उपसंहार - वास्तव में वेदों का पर्यावरण-दर्शन भारत की सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए शाश्वत मार्गदर्शन है। यह धार्मिक कल्पना ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का समन्वित स्वरूप है।
आज विश्व के अनेक पर्यावरणविद् और चिंतक इस दर्शन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ‘लोकल नॉलेज' और ‘इंडिजिनस इकोलॉजी' की अवधारणाएँ वैदिक जीवन-पद्धति के निकट हैं। आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक विकास के साथ वैदिक जीवन-मूल्यों का समन्वय किया जाए। यदि मानव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, संयमित उपभोग और संरक्षण की भावना अपनाए, तो पर्यावरणीय संकटों का समाधान सम्भव है।
(लेखक कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा हैं।)