वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

51 साल से इंतजार... अब चक दे इंडिया

प्रकाशित: 14-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
कभी भारतीय हॉकी का पूरी दुनिया में डंका बजता था। ओलंपिक में ऐतिहासिक आठ स्वर्ण पदक इसकी मिसाल हैं। पर यही जादू हॉकी विश्व कप में नहीं दिखाई देता। वर्ष 1971 में विश्व कप हॉकी की शुरुआत हुई और भारत ने पहले तीन संस्करणों में कांस्य, रजत और स्वर्ण पदक जीतकर शुरुआत में अपनी महारत कायम रखी। 1971 में कांस्य, 1973 में रजत और 1975 में स्वर्ण पदक हासिल किया था। ऐसा लगा कि ओलंपिक वाला गौरवशाली इतिहास विश्व कप हॉकी में भी दिखाई देगा पर सूरते-हाल यह है कि 1975 में कुआलालंपुर में मिले स्वर्ण पदक के बाद एक अदद पदक को तरस गए हैं। 51 साल का लंबा इंतजार हो गया है।
दरअसल 1976 मांट्रियल ओलंपिक में प्राकृतिक घास की जगह सिंथेटिक ट्रैक का प्रयोग शुरू हो गया था और ड्रिबलिंग के फन में माहिर भारतीय खिलाड़ी कई वर्षों तक एस्ट्रो टर्फ पर सही कदमताल नहीं बिठा सके। हालांकि तस्वीर अब बदल चुकी है। टोक्यो और पेरिस ओलंपिक में मिले लगातार दो पदक, एशिया कप और एशियाई खेलों की सफलताओं ने साबित किया है कि भारतीय हॉकी पटरी पर लौट रही है। इस बार हॉकी विश्व कप बेल्जियम-नीदरलैंड में 15 अगस्त से शुरू हो रहा है। सोलह टीमों को 4-4 के चार ग्रुप में बांटा गया है। भारतीय टीम ग्रुप डी में इंग्लैंड-पाकिस्तान और वेल्स के साथ है। इस बार फॉर्मेट नया है जहां क्वार्टर फाइनल नहीं है। हर ग्रुप की टॉप 2 टीमें अगले चरण में पहुंचेंगी। पहले चरण के प्रदर्शन का असर अगले चरण में भी पड़ेगा। कुल 8 टीमें दूसरे दौर में जाएंगे जिन्हें चार-चार के दो ग्रुप में बांटा जाएगा। फिर दोनों ग्रुपों की शीर्ष दो-दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचेंगी और फिर फाइनल होगा। निश्चित रूप से मुकाबला आसान नहीं है जैसे कि उम्मीद की जा रही है कि भारतीय टीम इंग्लैंड के साथ ग्रुप डी से दूसरे दौर में पहुंच सकती है क्योंकि अन्य टीमें पाकिस्तान और वेल्स अपेक्षाकृत उतनी मजबूत नहीं है लेकिन दूसरे दौर में असली अग्नि परीक्षा होगी जहां दुनिया की टॉप टीमें बेल्जियम, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया जर्मनी,स्पेन और अर्जेंटीना सामने होंगी। बेल्जियम तो इस समय दुनिया की नंबर एक टीम है और प्रो लीग चैंपियन भी है लेकिन टोक्यो और पेरिस ओलंपिक के पदकों ने भारतीय खिलाड़ियों में जीत का जज्बा भर दिया है।
पिछले दोनों ओलंपिक में हमने ब्रिटेन, अर्जेंटीना, स्पेन, जर्मनी जैसी मजबूत टीमों को हराया। दो साल पहले ओलंपिक में हमारी विश्व रैंकिंग सात थी और हमने दुनिया की दूसरे नंबर की टीम ब्रिटेन को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हराया। कांस्य पदक के मुकाबले में स्पेन को 2-1 से पराजित किया था। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक में अर्जेंटीना को 3-1 से और स्पेन को 3-0 से हराया था। कांस्य पदक के मुकाबले में जर्मनी को 5-4 से मात दी थी। भारतीय टीम की मौजूदा विश्व रैंकिंग 8 है।
हमने पिछले साल एशिया कप जीतकर विश्व कप के लिए क्वालिफाई किया। प्रो लीग में हालांकि हम आठवें स्थान पर रहे लेकिन हमने विश्व चैंपियन जर्मनी को 3-1 से हराया। कोच ाsढग फुल्टन की भारतीय टीम में दुनिया की शीर्ष टीमों को हराने की क्षमता है पर हमें अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखाना होगा। कप्तान हरमनप्रीत सिंह बेहतरीन ड्रेग फ्लिकर हैं। अनुभवी मिडफील्डर मनप्रीत सिंह भी टीम में हैं।
पिछले दो ओलंपिक में पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले गोलकीपर पीआर श्रीजेश अब संन्यास ले चुके हैं लेकिन सूरज करकेरा भी अनुभवी हैं। अन्य गोलकीपर एच एस मोहित का जरूर यह पहला विश्व कप है। हॉकी इंडिया स्पेशल गोलकीपिंग कैंप आयोजित कर चुकी है। गोलकीपिंग को घरेलू कोचिंग सिस्टम पर ना छोड़कर नीदरलैंड के डेनिस वान डे पॉल जैसे विशेषज्ञ की मदद ली जा चुकी है। उस कैंप में श्रीजेश के साथ सूरज करकेरा भी थे। उसके बाद करकेरा भी अच्छे गोलकीपर साबित होते आए हैं। श्रीजेश के बाद नए गोलकीपिंग यूनिट को तैयार करने पर फोकस रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में हॉकी इंडिया स्ट्रैंथ एंड मेंटल कंडीशनिंग कोच पैडी अप्टन की भी मदद ले चुकी है, जो दबाव में निपटने और बड़ी मानसिक चुनौती के लिए खिलाड़ियों को तैयार करते हैं। विश्व कप से पहले बेंगलुरु में लंबा शिविर भी रहा है। भारतीय टीम में शामिल कई खिलाड़ी स्विट्जरलैंड में तीन दिन के विशेष हाई इंटेंसिटी कैंप के भी हिस्से रह चुके हैं। कैंप में खिलाड़ियों को कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर मानसिक मजबूती हासिल करने और मैदान से बाहर भी आपसी तालमेल को मजबूत करने पर जोर रहता है।
1975 में अपनी कप्तानी में भारत को एकमात्र पदक दिलाने वाले अजित पाल सिंह कहते हैं हम एस्ट्रो टर्फ पर अच्छी हॉकी खेलना सीख चुके हैं। बस हमें यह याद रखना होगा कि हमें 11 खिलाड़ियों के रूप में नहीं बल्कि एक टीम के रूप में उतरना होगा हम पदक की दावेदारी में निश्चित रूप से हैं।
51 साल पहले विश्व चैंपियन बनी भारतीय टीम के फाइनल के हीरो अशोक ध्यानचंद रहे हैं जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक गोल किया था। उनका कहना है कि भविष्यवाणी तो नहीं कर सकते कि कौन सा पदक आएगा लेकिन टीम पर पूरा भरोसा है कि पोडियम फिनिश करेगी।
पुरुषों के विश्व कप के साथ नीदरलैंड और बेल्जियम में महिला हॉकी विश्व कप भी हो रहा है। भारतीय महिला टीम की कप्तानी सलीमा टेटे कर रही हैं। अनुभवी गोलकीपर सविता पूनिया हैं जो तीसरा विश्व कप खेलेंगीं।
अग्रिम पंक्ति में दीपिका सहरावत, नवनीत कौर और लालरेमसियामी पर भी काफी कुछ दारोमदार रहेगा। भारतीय महिला टीम के पूल में चीन, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड हैं। महिला टीम ने जून में महिला नेशंस कप जीता है जिसमें सभी मैचों में टीम अजेय रही लेकिन विश्व कप की चुनौती बड़ी है। महिला विश्व कप 1974 में शुरू हुआ था और तब टीम चौथे स्थान पर रही थी और यही उसका श्रेष्ठ प्रदर्शन है। इस बार बेहतर परिणाम देना उसके लिए चुनौती तो है पर साथ में अवसर भी।
भारत की शान तिरंगे के तले 11 खिलाड़ी मैदान में उतरेंगे और साथ में उतरेंगीं करोड़ों उम्मीदें। टोक्यो ओलंपिक में जब हमने पदक जीता था तो ओलंपिक में 41 साल का सूखा खत्म किया था। इस बार हॉकी विश्व कप में 51 साल के इंतजार को खत्म करने की आस है। आवाज अनेक हैं पर नारा एक है... चक दे इंडिया।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।)