स्वतंत्रता दिवस विशेष: सर्जिकल स्ट्राइक के बीच 3 लाख सीमावर्तियों का सुरक्षित रेस्क्यू, आईएएस ईशा कालिया के नेतृत्व में फाजिल्का प्रशासन ने रचा था इतिहास
प्रकाशित: 12-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
रोहतक, (तारीफ शर्मा)। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर जहां पूरा देश वीर जवानों के शौर्य को नमन करता है, वहीं सीमा पर तैनात प्रशासनिक योद्धाओं का समर्पण भी उतना ही अविस्मरणीय रहता है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक प्रसंग वर्ष 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान पंजाब के संवेदनशील सीमावर्ती जिले फाजिल्का में देखने को मिला था।
उरी हमले के जवाब में जब भारतीय सेना ने सीमा पार पराम दिखाया, तो पाकिस्तान सीमा से सटे फाजिल्का के 169 गांवों के लगभग तीन लाख निवासियों को सुरक्षित निकालना प्रशासन के समक्ष एक अत्यंत विकट और रणनीतिक चुनौती थी। कर्मचारियों की हड़ताल के कठिन समय में भी फाजिल्का की तत्कालीन उपायुक्त एवं 2009 बैच की पंजाब कैडर की आईएएस अधिकारी ईशा कालिया (जो वर्तमान में भारत सरकार के शहरी मामलों के मंत्रालय में संयुक्त सचिव पद पर कार्यरत हैं) ने अद्वितीय धैर्य, कुशल नेतृत्व और मानवीय संवेदनशीलता का परिचय दिया। मुहार जमशेर जैसे तीन तरफ से अंतरराष्ट्रीय सीमा से घिरे और मुख्य भू-भाग से कटे अति-संवेदनशील गांवों से नागरिकों को बिना किसी अफरा-तफरी के निकालना सबसे पहली प्राथमिकता थी। अफवाहों और भय के माहौल को रोकने के लिए प्रशासनिक टीम ने गुरुद्वारों के पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम, पटवारियों और पंचायत सचिवों के माध्यम से सीधे ग्रामीणों से संवाद स्थापित किया। देखते ही देखते जिले में 26 सर्वसुविधायुक्त राहत शिविर स्थापित कर दिए गए, जहां प्रभावित परिवारों के लिए भरपेट भोजन, सुरक्षित परिवहन और उनके मवेशियों के लिए चारे-पानी का अभूतपूर्व प्रबंध किया गया। सेना और बीएसएफ के साथ पल-पल का समन्वय, गांवों में ठीकरी पहरा और स्थानीय व्यापार मंडलों व स्वयंसेवी संस्थाओं की सािढय भागीदारी से इस पूरे अभियान को अत्यंत सुचारू रूप से संचालित किया गया। लगभग 10 दिनों तक चले इस ऐतिहासिक रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे खास बात यह रही कि शिविरों में महज बुनियादी राहत ही नहीं दी गई, बल्कि वहां रहने वाले लोगों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए कई नवाचार किए गए। बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो इसके लिए अस्थायी कक्षाएं और आंगनबाड़ी केंद्र शुरू किए गए, महिलाओं की समस्याओं के समाधान और परस्पर संवाद के लिए 'नारी चौपाल' सजायी गई, तथा तनावमुक्त वातावरण बनाए रखने के लिए शाम को फिल्मों की पीनिंग तक की व्यवस्था की गई।
हरियाणा के गांव गढ़ी आजमा निवासी रिटायर्ड आईएएस महेंद्र कुमार की सुपुत्री ईशा कालिया के इस सफल प्रबंधन ने यह साबित कर दिखाया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, आपदा में सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, अंतर-विभागीय तालमेल और पारदर्शी जनभागीदारी के बल पर देश पर आई किसी भी बड़ी प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौती पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
उरी हमले के जवाब में जब भारतीय सेना ने सीमा पार पराम दिखाया, तो पाकिस्तान सीमा से सटे फाजिल्का के 169 गांवों के लगभग तीन लाख निवासियों को सुरक्षित निकालना प्रशासन के समक्ष एक अत्यंत विकट और रणनीतिक चुनौती थी। कर्मचारियों की हड़ताल के कठिन समय में भी फाजिल्का की तत्कालीन उपायुक्त एवं 2009 बैच की पंजाब कैडर की आईएएस अधिकारी ईशा कालिया (जो वर्तमान में भारत सरकार के शहरी मामलों के मंत्रालय में संयुक्त सचिव पद पर कार्यरत हैं) ने अद्वितीय धैर्य, कुशल नेतृत्व और मानवीय संवेदनशीलता का परिचय दिया। मुहार जमशेर जैसे तीन तरफ से अंतरराष्ट्रीय सीमा से घिरे और मुख्य भू-भाग से कटे अति-संवेदनशील गांवों से नागरिकों को बिना किसी अफरा-तफरी के निकालना सबसे पहली प्राथमिकता थी। अफवाहों और भय के माहौल को रोकने के लिए प्रशासनिक टीम ने गुरुद्वारों के पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम, पटवारियों और पंचायत सचिवों के माध्यम से सीधे ग्रामीणों से संवाद स्थापित किया। देखते ही देखते जिले में 26 सर्वसुविधायुक्त राहत शिविर स्थापित कर दिए गए, जहां प्रभावित परिवारों के लिए भरपेट भोजन, सुरक्षित परिवहन और उनके मवेशियों के लिए चारे-पानी का अभूतपूर्व प्रबंध किया गया। सेना और बीएसएफ के साथ पल-पल का समन्वय, गांवों में ठीकरी पहरा और स्थानीय व्यापार मंडलों व स्वयंसेवी संस्थाओं की सािढय भागीदारी से इस पूरे अभियान को अत्यंत सुचारू रूप से संचालित किया गया। लगभग 10 दिनों तक चले इस ऐतिहासिक रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे खास बात यह रही कि शिविरों में महज बुनियादी राहत ही नहीं दी गई, बल्कि वहां रहने वाले लोगों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए कई नवाचार किए गए। बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो इसके लिए अस्थायी कक्षाएं और आंगनबाड़ी केंद्र शुरू किए गए, महिलाओं की समस्याओं के समाधान और परस्पर संवाद के लिए 'नारी चौपाल' सजायी गई, तथा तनावमुक्त वातावरण बनाए रखने के लिए शाम को फिल्मों की पीनिंग तक की व्यवस्था की गई।
हरियाणा के गांव गढ़ी आजमा निवासी रिटायर्ड आईएएस महेंद्र कुमार की सुपुत्री ईशा कालिया के इस सफल प्रबंधन ने यह साबित कर दिखाया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, आपदा में सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, अंतर-विभागीय तालमेल और पारदर्शी जनभागीदारी के बल पर देश पर आई किसी भी बड़ी प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौती पर विजय प्राप्त की जा सकती है।