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सामाजिक ढांचा अब भी जातिगत ऊंच-नीच की सोच से मुक्त नहीं

प्रकाशित: 25-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
मध्य प्रदेश के दमोह जिले में एक दिव्यांग दूल्हे को दबंगों के द्वारा घोड़ी से नीचे उतारने एवं परिवार के सदस्यों को पीटने का मामला सामने आया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना क्षेत्रीय सामाजिक ताने-बाने को खंडित करता है। इतना ही नहीं यह भारतीय समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए संकुचित मानसिकता का प्रतिबिंब है जो संविधानिक समानता के बावजूद व्यवहारिक स्तर पर अब भी कायम है। एक तरफ देश डिजिटल इंडिया, 5उ तकनीक, अंतरिक्ष मिशन और तीसरी आर्थिक शक्ति हम बन रहे हैं जिस पर हमें गर्व है। दूसरी तरफ सामाजिक ढांचा अब भी जातिगत ऊँच-नीच की सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। किसी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारकर अपमानित करना पूरे समुदाय की गरिमा पर हमला है। यह घटना दिखाती है कि कानून और विकास के दावे जमीन पर आज भी कमजोर हैं। सदियों पुरानी जातिगत श्रेष्ठता की भावना कुछ लोगों के मन में अब भी जीवित है। यह कड़वा सच है कि सामाजिक सुधार की प्रािढया आज भी अधूरी है। अक्सर प्रशासनिक ढिलाई और समय पर सख्त कार्रवाई का अभाव में जब अपराधियों को यह भरोसा होता है कि उन्हें गंभीर सजा नहीं मिलेगी तो वे इस तरह के कृत्यों को दोहराने से नहीं डरते। पीड़ित पक्ष अक्सर सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और सुरक्षा की कमी के कारण खुलकर न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाता जिससे अपराधियों का मनोबल और बढ़ जाता है। जिन क्षेत्रों में सामाजिक और संवैधानिक मूल्यों की समझ कम होती है वहाँ भेदभाव अधिक देखने को मिलता है। इसके अलावा राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी न्याय प्रािढया को कमजोर करता है। समाधान के लिए सबसे पहले कानून का कठोर और निष्पक्ष पालन जरूरी है। अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानूनों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर प्रभावी ढंग से लागू करना होगा दोषियों को त्वरित और सख्त सजा मिलनी चाहिए। जातीय उत्पीड़न अत्याचार और भेदभाव की घटनाओं पर पुलिस और प्रशासन को संवेदनशील बनाना होगा और ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पहले से ही निगरानी तंत्र मजबूत करना होगा। शिक्षा के माध्यम से समाज में समानता और मानवाधिकारों की समझ को गहराई तक पहुँचाना होगा एवं स्कूलों से लेकर पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मुद्दों को गंभीरता से उठाएँ और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में काम करें। आर्थिक सशक्तिकरण भी एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि जब तक वंचित वर्ग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा तब तक वह सामाजिक अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़ा नहीं हो पाएगा। अंतत यह केवल सरकार या कानून का नहीं बल्कि पूरे समाज का प्रश्न है जब तक आम लोगों की सोच नहीं बदलेगी तब तक ऐसी घटनाओं पर पूर्ण विराम लगाना मुश्किल रहेगा जरूरत इस बात की है कि हम संविधान में निहित समानता और सम्मान के मूल्यों को केवल शब्दों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी अपनाएँ और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित न किया जाए तभी एक सच्चे अर्थों में आधुनिक और न्यायपूर्ण भारत का निर्माण संभव होगा। ऐसी घटनाएँ दुर्भाग्य से अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर सामने आती रही हैं और उनका स्वरूप लगभग एक जैसा होता है - दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ना, बारात निकालना या बैंड-बाजा बजाना कुछ लोगों को “परंपरा के खिलाफ’’ माना जाता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।