समुद्र से समृद्धि का रहा है हमारा गौरवशाली इतिहास
प्रकाशित: 25-09-2025 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
भारत को दुनिया की एक बड़ी समुद्री शत्ति बनाने के लिए तीन और बड़ी स्कीम्स पर भारत सरकार काम कर रही है। इन तीन योजनाओं से शिप बिाल्डग सेक्टर को आर्थिक मदद मिलने में आसानी होगी। इन पर आने वाले वर्षो में सत्तर ह़जार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाएंगे। हम देश में नए और बड़े पोट्र्स का निर्माण भी कर रहे हैं।
भारत का समुद्री इतिहास, पािमी सयता के जन्म से पहले का है। माना जाता है कि विश्व का पहला ज्वारीय बंदरगाह लोथल में हड़प्पा सयता के दौरान 2300 ईं0 पू0 के आसपास बनाया गया था, जो वर्तमान में गुजरात तट पर मांगरोल बंदरगाह के पास है।
भारतीय पुराणों में महासागर, समुद्र और नदियों से जुड़ी हुईं ऐसी कईं घटनाएँ मिलती हैं जिससे इस बात का पता चलता है कि मानव को समुद्र और महासागर से जलीय संपदा के रूप में का़फी आर्थिक सहायता प्राप्त हुईं है।
भारतीय साहित्य, कला, मरूतिकला, चित्रकला और पुरातत्व-विज्ञान से प्राप्त कईं साक्ष्यों से भारत की समुद्री परंपराओं के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त होता है।
प्राचीन काल से लेकर कईं शताब्दियों तक हिद महासागर पर भारतीय उपमहाद्वीप का वर्चस्व कायम रहा था। इसके बाद व्यापार के लिए भारतीय समुद्री रास्तों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। 16 वीं शताब्दी तक का काल देशों के मध्य समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार, संस्वृति और परंपरागत लेन-देन का गवाह रहा है। मौर्यं काल में बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार गतिविधियाँ हुईं जिनसे अनेक राष्ट्रों से भारत की निकटता बढ़ी। मौर्यं साम्राज्य के दौरान, भारतीयों ने पहले ही दक्षिण पूर्व एशिया में थाईंलैंड और मलेशिया प्रायद्वीप से वंबोडिया और दक्षिणी वियतनाम तक व्यापारिक संबंध बना लिए थे। मौर्यं वंश की समुद्री गतिविधियों के चलते भारत से इंडोनेशिया और आस-पास के द्वीपों पर जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
वर्तमान में भारत विश्व का 16वाँ सबसे बड़ा समुद्री देश है और भारत में समुद्री परिवहन मात्रा के हिसाब से 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से 68 प्रतिशत व्यापार संभालता है। भारत विश्व के शीर्ष 5 जहा़ज रीसाक्षक्लग देशों में से एक है और वैश्विक जहा़ज रीसाक्षक्लग बा़जार में 30 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है व भारत जहा़ज तोड़ने वाले उदृाोग में 30 फीसदी से अधिक वैश्विक बा़जार हिस्सेदारी का मालिक है और अलंग, गुजरात में विश्व की सबसे बड़ी जहा़ज तोड़ने वाली सुविधा का स्थान है। दिसंबर 2021 तक, भारत के पास 13, 011 हजार के सकल टन भार के बेड़े की ताकत थी। हालाँकि, क्षमता के मामले में भारतीय बेड़ा विश्व के बेड़े का सिर्प 1.2 प्रतिशत है। वर्ष 2017 में, सरकार ने बंदरगाह-आधारित विकास और रसद-गहन उदृाोगों के विकास की दृष्टि से महत्त्वाकांक्षी सागर माला कार्यांम शुरू किया। भारत में वर्तमान में 12 प्रमुख और 200 गैर-प्रमुख या कहें मध्यवता बंदरगाह (राज्य सरकार प्रशासन के तहत) हैं।
जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट भारत का सबसे बड़ा प्रमुख बंदरगाह है, जबकि मुंद्रा सबसे बड़ा निजी बंदरगाह है।
समुद्री परिवहन से तात्पर्यं जलमार्गो के माध्यम से जहाजों और अन्य जलयानों द्वारा माल और लोगों की आवाजाही से है।
यह वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख घटक है, जो तेल, अनाज और विर्निमित वस्तुओं जैसी वस्तुओं के थोक परिवहन को सक्षम बनाता है। समुद्री परिवहन वैश्विक आपरूति श्रृंखला और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी देश की आर्थिक सफलता निर्धारित करते समय समुद्री व्यापार और गहरे जल क्षेत्र तक पहुँच महत्वपूर्ण होती है। आज, समुद्री माल ढुलाईं की ईंधन दक्षता और परिवहन के साधन के रूप में जल पर विश्वव्यापी निर्भरता के कारण, लगभग 75 फीसदी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जलमार्ग से होता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार एक आवश्यक तत्व है।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में समुद्री व्यापार विकसित हुआ है।
वर्तमान में, दुनिया भर में 4500 से अधिक गहरे पानी के बंदरगाह हैं इन सब बातों के मद्देनजर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीे ने भावनगर में समुद्र से समृद्धि की ओर देश को ले जाने की भविष्य की योजना के बारे में चर्चा की थी। पोर्ट-लेड डेवलपमेंट को गति देने के लिए, ह़जारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और उद्घाटन उनके द्वारा किया गया। देश में व््राूज टूरिज्म को प्रमोट करने के लिए मुंबईं में इंटरनेशनल व््राूज र्टमिनल का भी लोकार्पण किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार भारत में जहा़ज निर्माण पर जोर देने के बजाय, विदेशी जहा़जों को किराया-भाड़ा दे कर काम चलाया जा रहा था। इससे भारत में शिपबिाल्ड ग इकोसिस्टम ठप हो गया, विदेशी जहा़जों पर निर्भरता हमारी मजबूरी बन गयी। परिणाम ये हुआ कि 50 साल पहले जहां चालीस परसेंट व्यापार, भारतीय जहा़जों पर होता था, वो हिस्सा घटकर सिर्प पांच परसेंट रह गया। यानी ट्रेड के लिए हम विदेशी जहा़जों पर निर्भर हो गए। विदेशी जहाजों पर इस निर्भरता का हमें बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। आज भारत हर साल, करीब 75 बिलियन डॉलर यानी लगभग छह लाख करोड़ रुपए विदेशी शिपिग वंपनियों को शिपिग स्रविसेस के लिए देता है, किराया देता है। ये आज भारत का जितना डिपेंस बजट है, करीब-करीब उतना पैसा किराये में दिया जा रहा है।
इसीलिए उन्होंने कहा कि हमें शिप भारत में ही बनाने होंगे। भारत सदियों से बड़े-बड़े जहाज बनाने में एक्सपर्ट रहा है। हमारे पास कौशल की कोईं कमी नहीं है। बड़े शिप बनाने के लिए सिर्प राजनीतिक इच्छाशत्ति की जरूरत है। देश के मैरीटाइम सेक्टर को मजबूती देने के लिए एक बहुत ऐतिहासिक निर्णय हुआ है। अब सरकार ने बड़े जहाजों को इंप्रास्ट्रक्चर के रूप में मान्यता दी है। अब बड़े शिप बनाने वाली वंपनियों को बैंकों से लोन मिलने में आसानी होगी, उन्हें ब्याज दर में भी छूट मिलेगी। भारत को दुनिया की एक बड़ी समुद्री शत्ति बनाने के लिए, तीन और बड़ी स्कीम्स पर भारत सरकार काम कर रही है।
इन तीन योजनाओं से शिप बिाल्डग सेक्टर को आर्थिक मदद मिलने में आसानी होगी। इन पर आने वाले वर्षो में सत्तर ह़जार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाएंगे। हम देश में नए और बड़े पोट्र्स का निर्माण भी कर रहे हैं। हाल में ही केरल में, देश का पहला डीप वॉटर वंटेनर ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट शुरु किया है। 75 हजार करोड़ से ज्यादा की लागत से महाराष्ट्र में वाढवण पोर्ट बन रहा है। ये दुनिया के टॉप टेन पोट्र्स में से एक होगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं।) एस.एन. वर्मा
भारत का समुद्री इतिहास, पािमी सयता के जन्म से पहले का है। माना जाता है कि विश्व का पहला ज्वारीय बंदरगाह लोथल में हड़प्पा सयता के दौरान 2300 ईं0 पू0 के आसपास बनाया गया था, जो वर्तमान में गुजरात तट पर मांगरोल बंदरगाह के पास है।
भारतीय पुराणों में महासागर, समुद्र और नदियों से जुड़ी हुईं ऐसी कईं घटनाएँ मिलती हैं जिससे इस बात का पता चलता है कि मानव को समुद्र और महासागर से जलीय संपदा के रूप में का़फी आर्थिक सहायता प्राप्त हुईं है।
भारतीय साहित्य, कला, मरूतिकला, चित्रकला और पुरातत्व-विज्ञान से प्राप्त कईं साक्ष्यों से भारत की समुद्री परंपराओं के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त होता है।
प्राचीन काल से लेकर कईं शताब्दियों तक हिद महासागर पर भारतीय उपमहाद्वीप का वर्चस्व कायम रहा था। इसके बाद व्यापार के लिए भारतीय समुद्री रास्तों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। 16 वीं शताब्दी तक का काल देशों के मध्य समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार, संस्वृति और परंपरागत लेन-देन का गवाह रहा है। मौर्यं काल में बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार गतिविधियाँ हुईं जिनसे अनेक राष्ट्रों से भारत की निकटता बढ़ी। मौर्यं साम्राज्य के दौरान, भारतीयों ने पहले ही दक्षिण पूर्व एशिया में थाईंलैंड और मलेशिया प्रायद्वीप से वंबोडिया और दक्षिणी वियतनाम तक व्यापारिक संबंध बना लिए थे। मौर्यं वंश की समुद्री गतिविधियों के चलते भारत से इंडोनेशिया और आस-पास के द्वीपों पर जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
वर्तमान में भारत विश्व का 16वाँ सबसे बड़ा समुद्री देश है और भारत में समुद्री परिवहन मात्रा के हिसाब से 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से 68 प्रतिशत व्यापार संभालता है। भारत विश्व के शीर्ष 5 जहा़ज रीसाक्षक्लग देशों में से एक है और वैश्विक जहा़ज रीसाक्षक्लग बा़जार में 30 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है व भारत जहा़ज तोड़ने वाले उदृाोग में 30 फीसदी से अधिक वैश्विक बा़जार हिस्सेदारी का मालिक है और अलंग, गुजरात में विश्व की सबसे बड़ी जहा़ज तोड़ने वाली सुविधा का स्थान है। दिसंबर 2021 तक, भारत के पास 13, 011 हजार के सकल टन भार के बेड़े की ताकत थी। हालाँकि, क्षमता के मामले में भारतीय बेड़ा विश्व के बेड़े का सिर्प 1.2 प्रतिशत है। वर्ष 2017 में, सरकार ने बंदरगाह-आधारित विकास और रसद-गहन उदृाोगों के विकास की दृष्टि से महत्त्वाकांक्षी सागर माला कार्यांम शुरू किया। भारत में वर्तमान में 12 प्रमुख और 200 गैर-प्रमुख या कहें मध्यवता बंदरगाह (राज्य सरकार प्रशासन के तहत) हैं।
जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट भारत का सबसे बड़ा प्रमुख बंदरगाह है, जबकि मुंद्रा सबसे बड़ा निजी बंदरगाह है।
समुद्री परिवहन से तात्पर्यं जलमार्गो के माध्यम से जहाजों और अन्य जलयानों द्वारा माल और लोगों की आवाजाही से है।
यह वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख घटक है, जो तेल, अनाज और विर्निमित वस्तुओं जैसी वस्तुओं के थोक परिवहन को सक्षम बनाता है। समुद्री परिवहन वैश्विक आपरूति श्रृंखला और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी देश की आर्थिक सफलता निर्धारित करते समय समुद्री व्यापार और गहरे जल क्षेत्र तक पहुँच महत्वपूर्ण होती है। आज, समुद्री माल ढुलाईं की ईंधन दक्षता और परिवहन के साधन के रूप में जल पर विश्वव्यापी निर्भरता के कारण, लगभग 75 फीसदी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जलमार्ग से होता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार एक आवश्यक तत्व है।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में समुद्री व्यापार विकसित हुआ है।
वर्तमान में, दुनिया भर में 4500 से अधिक गहरे पानी के बंदरगाह हैं इन सब बातों के मद्देनजर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीे ने भावनगर में समुद्र से समृद्धि की ओर देश को ले जाने की भविष्य की योजना के बारे में चर्चा की थी। पोर्ट-लेड डेवलपमेंट को गति देने के लिए, ह़जारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और उद्घाटन उनके द्वारा किया गया। देश में व््राूज टूरिज्म को प्रमोट करने के लिए मुंबईं में इंटरनेशनल व््राूज र्टमिनल का भी लोकार्पण किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार भारत में जहा़ज निर्माण पर जोर देने के बजाय, विदेशी जहा़जों को किराया-भाड़ा दे कर काम चलाया जा रहा था। इससे भारत में शिपबिाल्ड ग इकोसिस्टम ठप हो गया, विदेशी जहा़जों पर निर्भरता हमारी मजबूरी बन गयी। परिणाम ये हुआ कि 50 साल पहले जहां चालीस परसेंट व्यापार, भारतीय जहा़जों पर होता था, वो हिस्सा घटकर सिर्प पांच परसेंट रह गया। यानी ट्रेड के लिए हम विदेशी जहा़जों पर निर्भर हो गए। विदेशी जहाजों पर इस निर्भरता का हमें बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। आज भारत हर साल, करीब 75 बिलियन डॉलर यानी लगभग छह लाख करोड़ रुपए विदेशी शिपिग वंपनियों को शिपिग स्रविसेस के लिए देता है, किराया देता है। ये आज भारत का जितना डिपेंस बजट है, करीब-करीब उतना पैसा किराये में दिया जा रहा है।
इसीलिए उन्होंने कहा कि हमें शिप भारत में ही बनाने होंगे। भारत सदियों से बड़े-बड़े जहाज बनाने में एक्सपर्ट रहा है। हमारे पास कौशल की कोईं कमी नहीं है। बड़े शिप बनाने के लिए सिर्प राजनीतिक इच्छाशत्ति की जरूरत है। देश के मैरीटाइम सेक्टर को मजबूती देने के लिए एक बहुत ऐतिहासिक निर्णय हुआ है। अब सरकार ने बड़े जहाजों को इंप्रास्ट्रक्चर के रूप में मान्यता दी है। अब बड़े शिप बनाने वाली वंपनियों को बैंकों से लोन मिलने में आसानी होगी, उन्हें ब्याज दर में भी छूट मिलेगी। भारत को दुनिया की एक बड़ी समुद्री शत्ति बनाने के लिए, तीन और बड़ी स्कीम्स पर भारत सरकार काम कर रही है।
इन तीन योजनाओं से शिप बिाल्डग सेक्टर को आर्थिक मदद मिलने में आसानी होगी। इन पर आने वाले वर्षो में सत्तर ह़जार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाएंगे। हम देश में नए और बड़े पोट्र्स का निर्माण भी कर रहे हैं। हाल में ही केरल में, देश का पहला डीप वॉटर वंटेनर ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट शुरु किया है। 75 हजार करोड़ से ज्यादा की लागत से महाराष्ट्र में वाढवण पोर्ट बन रहा है। ये दुनिया के टॉप टेन पोट्र्स में से एक होगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं।) एस.एन. वर्मा