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स्थाईं समाधान

प्रकाशित: 29-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
स्थाईं समाधान
स्थाईं समाधान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह इस वक्त संघाईं सहयोग संगठन यानि एससीओ के सम्मेलन में शामिल होने के लिए गए हैं। उन्होंने वहां रक्षा संबंधी मुद्दों पर सदस्य देशों के रक्षामंत्रियों के साथ अपने विचार रखे कितु उनकी सम्मेलन के इतर चीनी रक्षामंत्री के साथ बैठक के बाद जो संयुक्त बयान जारी हुआ उसमें ‘परमानेंट डि-स्केलेशन’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है।
अभी तक जब बयान जारी होते थे तो सिर्प बातचीत के जरिए आपसी विश्वास को जरिया बनाकर शांति स्थापित करने की बात होती थी लेकिन यह पहली बार है जब परमानेंट डि-स्केलेशन यानि स्थाईं समाधान की तरफ बढ़ने की बात की गईं है।
दरअसल चीन के साथ भारत के संबंध तो हमेशा ही नरम-गरम रहे हैं और दोनों देशों की तरफ से रिश्तों को सामान्य बनाने के प्रयास होते रहे। कितु 2020 में जब एक बार स्टैण्ड आफ हुआ और गलवान में हमारे 20 तथा उनके भी लगभग 40 जवान मारे गए तो दोनों देशों के बीच संबंध बेहद खराब हो गए थे। यह घटना थी तो अत्यंत दु:खद कितु वास्तविकता यह है कि इसी घटना के बाद चीन ने जिन नो मैन्स लैण्ड एरिया में निर्माण किया था, भारतीय सैन्य टुकिड़यों ने न सिर्प वहां तैनात चीनी सैन्य टुकिड़यों को चुनौती दी तथा अपने कमांडों ऊपर तैनात करके चीनी सैनिकों को निशाने पर ले लिया। पहले सीमा पर भारतीय सैन्य नेतृत्व चीन की सैन्य टुकड़ी को पीछे हटने का अनुरोध करती थी कितु 2020 के गलवान घाटी में संघर्ष के बाद भारतीय सैन्य वार्ताकारों से चीनी सेना के वार्ताकार इस बात के लिए सौदेबाजी करने लगे कि वे अपने अस्थाईं ढांचे हटा लेंगे बशतर्ेे भारतीय सैनिक ऊचाईंयों से नीचे अपनी पूर्व स्थिति में आ जाएं। मतलब कि 2020 के बाद भारतीय सेना बिल्वुल बदल चुकी है।
इसलिए अब चीन की तरफ घुसपैठ की घटनाएं पहले की तरह नहीं होतीं।
सच तो यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ का ऐसा आतंक पैलाया कि भारत और चीन दोनों देशों में इस बात पर विचार हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दो देश यदि आपस में मिलकर व्यापार करें तथा व्यापार संतुलन यानि आयात-निर्यांत की खाईं को पाटें तो उन्हें किसी दूसरे खासकर अमेरिका के नखरे बर्दाश्त करने ही नहीं होंगे। दोनों देशों में इस बात की चर्चा हुईं और वुछ दिन बाद ही चीन के विदेश मंत्री भारत आए और उन्होंने भारत से वादा किया कि चीन भारत से अच्छे संबंध चाहता है। उन्होंने भारत को यह भी संकेत दिया कि यदि नईं दिल्ली और पेइचिंग आपसी समझ विकसित करेंगे तो चीन भारत से आयात भी बढ़ाएगा और भारत की उन जरूरतों को पूरा करेगा जो उसे किसी भी देश से नहीं मिल सकता।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा संपन्न हुईं जहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बहुत सकारात्मक भाव से बातचीत की और आपसी विश्वास बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण वूटनीतिक पहल की।
भारत कभी भी नहीं चाहता कि हमारे संबंध अमेरिका से खराब हों कितु अब भारत यह अच्छी तरह समझ चुका है कि अमेरिका के लिए वह चीन से भी संबंध खराब करने को तैयार नहीं है। यही कारण है ब्रिक्स की अध्यक्षता जब भारत को मिली तो चीन बिल्वुल भी असहज नहीं हुआ बल्कि दोनों देश बड़ी ही सूझ-बूझ से पैसले ले रहे हैं। खबर है कि चीन के राष्ट्रपति भारत आने वाले हैं। इससे उम्मीद की जा रही है कि दोनों देशों में आपसी विश्वास बढ़ेगा और दोनों एक-दूसरे की जरूरतों को महसूस करके सीमा पर विवाद का स्थाईं समाधान निकालने के लिए जल्दी ही व्यावहारिक व ठोस पहल करेंगे।