उत्तराखंड लोक संस्कृति में रचा-बसा मां नंदा देवी लोकजात, राजजात
प्रकाशित: 09-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. प्रवेश कुमार
जा मेरी लाड़ली नंदा ते उचा कैलाश।
ना ना बाबा मैं नी जानदू ते ऊंचा कैलाश।।
इस गीत की पंक्तियों के साथ माँ नंदा देवी की यात्रा शुरू हो जाती है। हमारी भारत भूमि अपनी विविधता और उनमें विद्यमान एकता के लिए विश्व में पहचानी जाती है। इस विविधता को एक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी प्रकार हमारे पहाड़ों में हर चोटी पर एक देवता और उसे पूजने वाले भक्त हमें मिल जाते हैं। इस लेख में मैंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति में रची - बसी माँ नंदादेवी लोकजात और राजजात पर चर्चा की है। अभी पिछले दिनों यह यात्रा (लोकजात) प्रत्येक वर्ष की भाँति प्रारंभ हुई हालाँकि लोकजात तो प्रत्येक वर्ष होती है। लेकिन पहले तो यह सुनने में आया कि इस बार लोकजात के साथ राजजात भी होगी। फिलहाल इस पर स्थानीय लोगों में कुछ संशय बना लेकिन फिर भी चौसिंघा खाड़ू के साथ 5 सितंबर को यह यात्रा प्रारंभ हो गयी।
अब यह भी समझने की जरूरत है कि यह जात क्या है। जिस प्रकार से हम तीर्थयात्रा या तीर्थाटन की बात करते है जो नादियों के निकट या उनको पार करना आदि इसमें शामिल होता है। उसी प्रकार से उत्तराखंड में जात का अर्थ धार्मिक यात्रा के साथ जोड़कर देखा जाता है। लोकजात आम जन के नेतृत्व में की गई यात्रा है तो वही प्रत्येक 12 वर्षों के बाद होने वाली यात्रा में राजपरिवार की प्रमुखता के कारण उसे राजजात कहा जाता है। हम सभी यह तो जानते ही हैं' की अपने पहाड़ों में देवी देवताओं का काफी महत्व है सभी क्षेत्रों में अपने स्थानीय देवता है।
इन स्थानीय देवों के प्रति लोगों की अगाध आस्था है जागर जैसे गायनों से धार्मिक उत्सवों में स्थानीय देवताओं की प्रकटीकरण का मैंने भी व्यक्तिगत अनुभव किया है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति, वहाँ के देव स्थानों और संतों के प्रभाव आदि पर मैंने पहले भी लिखा है।
वास्तव में पहाड़ की यात्रा अंतहीन सी लगने वाली यात्रा ही मुझे लगती है, इसी में जागर गायन जो की देवता के आवाहन से जुड़ा है। तो वही माँ नंदा की जात यानि की यात्रा सैकड़ों की संख्या में पूरे उत्तराखंड के देवताओं का एक स्थान पर जुटना है। हम सभी को यह ज्ञात होना चाहिए कि माँ नंदा को उत्तराखंड की बेटी के रूप में देखा जाता है। इसी लिए लोकगीतों में माँ नंदा वर्णन आता है, ग्रामीण महिलाएं जिस प्रकार से अपने मायके से विदा होती है उसी प्रकार से माँ नंदा की विदाई के साथ यहां यात्रा जुड़ी है।
महिलाओं के गीतों को सुनने मात्र से माँ नंदा के प्रति उनके भावों को जाना और समझा जा सकता है। जा मेरी लाडली नंदा ते ऊँचा कैलाशा, ना ना बाबा मैं ना जानदू ते ऊँचा कैलाशा। यह पहाड़ी गीत लड़की की विदाई को बताता हुआ पुत्री और पिता के मां के भावों को व्यक्त करता है प्रोफेसर राकेश कुंवर जो की पंवार वंशी राज परिवार से जुड़े हैं उनके अनुसार मां नंदा की यात्रा में संपूर्ण उत्तराखंड से लगभग 500 से अधिक देवी देवताओं का यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर मिलना होता है। मां नंदा की यह जात या यात्रा संपूर्ण देवभूमि को एक-दूसरे के साथ जोड़ने का काम करती है। यह यात्रा नौटी गांव और लोकजात कुरुड़ से प्रारंभ होती है, एक राजजात के नाम से तो वहीं दूसरी लोकजात के नाम से। मां नंदा की यात्रा गढ़वाल क्षेत्र में होने वाली प्राचीनतम यात्रा के रूप में जानी जाती है।
मां नंदा की वर्षों से होने वाली यात्रा में पंवार वंशी राजाओं का अपना महत्व है यह भी मान्यता है कि पंवारो के शासन से पूर्व इस क्षेत्र में कत्यूरी राजवंश का शासन था मां नंदा की जात इस समय भी होती थी ऐसा भी प्रमाण मिलते हैं लेकिन राजा की भूमिका इसमें कुछ खास नहीं रहती थी इस वंश ने लगभग 300 से 500 वर्षों तक शासन किया। उनकी शुरुआती राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) पहले पवार वंश ने चांदपुर गढ़ पर शासन किया तदोपरांत 1412 में इस वंश का राजा अजय पाल अपनी राजधानी श्रीनगर के पास देवलगढ़ ले गया 15 वर्ष यहां रहा फिर अपनी राजधानी श्रीनगर गढ़वाल में बनाई गोरखों के आक्रमण के कारण बाद में टिहरी रियासत बनी । कत्यूरियों के बाद पवार वंश ने लगभग 770 ईस्वी से 1790 ईस्वी तक लंबे समय तक शासन किया। कत्यूरी राजवंश के बाद परमार (पँवार) राजवंश का गढ़वाल क्षेत्र पर मुख्य शासन रहा। बाद में गोरखा आक्रमण और अंग्रेजों के साथ संधि के बाद इस वंश के राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी स्थापित की। यह वही राजवंश था जिसने मां नंदा की राजजात की शुरुआत की जो की 12 वर्षों के पश्चात राजा की देखरेख में यह यात्रा होने लगी। यह यात्रा चमोली जिले के नौटी गांव से होते हुए होमकुंड जिसे भगवान शिव के साथ जोड़कर देखा जाता है, वहां तक जाती है प्रोफेसर राकेश कुंवर की माने तो ‘मां नंदा की राजजात जो 12 वर्षों के बाद होती है। जिसकी शुरुआत नौटी गांव में पूजन के साथ होती है और होमकुंड तक की यह यात्रा होती है'।
इस यात्रा की शुरुआत नौटी से होकर पहले दिन का पड़ाव कर्णप्रयाग के पास ईड़ाबनाडी गांव तक होता है। यहां से फिर यात्रा वापस नौटी गांव आती है, नौटी से कांसुवा गाँव होते हुए ईड़ाबनाडी, चांदपुर गढ़ में दिन में टिहरी नरेश शाही पूजा करते है सेमगाँव, कोटी, भगौती (यहां माँ नंदा के मायके का आखिरी गाँव है) इसके बाद कुलसारी गांव पड़ता हैं यहां पर दक्षिण काली का यंत्र भूमिगत है यहां यात्रा अमावश्य की पूजा पाकर आगे चेपडियों पहुंचती है (यह गांव बुटोला थोकदार इाल्daत् थ्दे् का हैं) आगे नंदकेसरी नामक स्थान पर राजजात व कुरूड की व अल्मोड़ा की नंदा देवी से मिलन होता है फिर यात्रा फल्दिया गांव फिर मुंदेली फिर वाण गांव यह आबादी का आखिरी गाँव है, यहां से यात्रा निर्जन पड़ावों से गुजरती है यही से देवी के आगे लाटू देवता चलता हैं यह देवी का धर्म भाई है, यात्रा फिर गैरोली पातल, वेदनी कुंड में राजकुंवर अपने पितरों का तर्पण करते हैं, उनके साथ इसमें यात्रीगण भी शामिल होते हैं, तदोपरांत पातर नचौनियां रात्रि में प्रवास होता है, फिर कलुवा विनायक (गणेश जी प्रतिमा) में पूजा करते हुए रूपकुंड, फिर ज्यूरागली (17500 फीट की ऊंचाई)को पार करते हुए फिर नीचे शिला समुद्र आते है रात्रि प्रवास हेतु (शिला समुद्र से आशय चट्टानों की अधिकता यह स्थान ग्लेशियर के ऊपर है) दूसरे व अंतिम दिन होमकुंड अष्टमी व नवमीं के मिलन पर पहुंचते हैं यही पर देवी को चौसिंगिया मेढ़े के साथ विदा किया जाता है, बताया जाता है कि द्वापर में इस स्थान पर शिव व नंदा का विवाह उपरोक्त तिथि पर हुआ था, इसके बाद यात्रा चंदनिया घट रुकती है फिर सुतोल गाँव पहुंचती है यह आबादी का इस तरफ से पहला गांव है फिर घाट, नंदप्रयाग होते हुए कर्णप्रयाग फिर नौटी इस दौरान नौटी में देवी भागवत चल रहा होता है वहां से सुफल पाकर राजकुंवर अपने पैतृक गांव कांसुवा लौटते हैं। इस तरह यात्रा समाप्त हो जाती है फिर जनमानस को अगली यात्रा का इंतजार रहता है। अभी 2014 की राजजात में 35 लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे, इसी प्रकार से लोकजात में भी काफी संख्या में लोगों का एकत्रीकरण होता है। लोकजात का तो कोई वर्णन नहीं मिलता कि यहाँ कब से शुरू हुई है लेकिन राजजात के तो प्रमाण मिल जाते है।
कांसुवा से मिले दस्तावेजों के आधार पर (जो कि राजकुंवरों का गांव है पंवार राजवंश की कनिष्ठ शाखा चांदपुर गढ़ से यही बसी इन्हीं पर राजजात संपन्न करने का प्रभार है) उपलब्ध आंकड़ों की मानें तो 1843 से इस राजजात के प्रमाण मिल जाते हैं। इसी प्रकार से वर्ष 1863,1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987, 2000 और हाल ही में संपन्न हुई राजजात 2014 में हुई थी। माँ नंदा को उत्तराखंड में बेटी के रूप में माना जाता है, इस लिए यात्रा के दौरान एक गीत गया जाता है कि तू जाम से नंदा लेकिन जल्दी आए तू हिमालय पर्वत की चेली हो, तुम इस पहाड़ की चेली हो, खुपोऊ की पहली बाली हो, धिनाई की पहली नाली पे तेरा ही अधिकार है, हमार हर खुशी में तू छे, हर दुख में तकेची बुलानु, तुम हमार भगवान छा, और हमार कुलदेवी हो, हमार लीजे तू भगवान नी छे, तू वो चेली छे जब तेरी बिदाई ही पुर पहाड़ रोऊ, आज हम तेके डोली बैठाऊ मुई, तो जा चेली जा-जा बस येतु याद धरिये की यो पहाड़ तेर मेत छू'। इसलिए माँ नंदा की जात यह लोक मन को स्पर्श करने का विषय है, हमारे देश में इन विषयों पर कुछ बातें तो हुई लेकिन विलियम एस सेक्स, बिल एटिकन जैसे विदेशी लेखकों के द्वारा माँ नंदा की यात्रा को बड़े ही विस्तार से बताने का प्रयास हुआ है। लोक गीतों के शब्द माँ नंदा के प्रति लोगें के मन के भावों को कितने ही मार्मिक ढंग से व्यक्त करते हैं यह भी जानने और समझने के लायक है। इस वर्ष लोक जात हो रही है। 2027 में राज जात होगी।
(लेखक तुलनात्मक अध्ययन एवं राजनीतिक सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली हैं।)
जा मेरी लाड़ली नंदा ते उचा कैलाश।
ना ना बाबा मैं नी जानदू ते ऊंचा कैलाश।।
इस गीत की पंक्तियों के साथ माँ नंदा देवी की यात्रा शुरू हो जाती है। हमारी भारत भूमि अपनी विविधता और उनमें विद्यमान एकता के लिए विश्व में पहचानी जाती है। इस विविधता को एक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी प्रकार हमारे पहाड़ों में हर चोटी पर एक देवता और उसे पूजने वाले भक्त हमें मिल जाते हैं। इस लेख में मैंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति में रची - बसी माँ नंदादेवी लोकजात और राजजात पर चर्चा की है। अभी पिछले दिनों यह यात्रा (लोकजात) प्रत्येक वर्ष की भाँति प्रारंभ हुई हालाँकि लोकजात तो प्रत्येक वर्ष होती है। लेकिन पहले तो यह सुनने में आया कि इस बार लोकजात के साथ राजजात भी होगी। फिलहाल इस पर स्थानीय लोगों में कुछ संशय बना लेकिन फिर भी चौसिंघा खाड़ू के साथ 5 सितंबर को यह यात्रा प्रारंभ हो गयी।
अब यह भी समझने की जरूरत है कि यह जात क्या है। जिस प्रकार से हम तीर्थयात्रा या तीर्थाटन की बात करते है जो नादियों के निकट या उनको पार करना आदि इसमें शामिल होता है। उसी प्रकार से उत्तराखंड में जात का अर्थ धार्मिक यात्रा के साथ जोड़कर देखा जाता है। लोकजात आम जन के नेतृत्व में की गई यात्रा है तो वही प्रत्येक 12 वर्षों के बाद होने वाली यात्रा में राजपरिवार की प्रमुखता के कारण उसे राजजात कहा जाता है। हम सभी यह तो जानते ही हैं' की अपने पहाड़ों में देवी देवताओं का काफी महत्व है सभी क्षेत्रों में अपने स्थानीय देवता है।
इन स्थानीय देवों के प्रति लोगों की अगाध आस्था है जागर जैसे गायनों से धार्मिक उत्सवों में स्थानीय देवताओं की प्रकटीकरण का मैंने भी व्यक्तिगत अनुभव किया है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति, वहाँ के देव स्थानों और संतों के प्रभाव आदि पर मैंने पहले भी लिखा है।
वास्तव में पहाड़ की यात्रा अंतहीन सी लगने वाली यात्रा ही मुझे लगती है, इसी में जागर गायन जो की देवता के आवाहन से जुड़ा है। तो वही माँ नंदा की जात यानि की यात्रा सैकड़ों की संख्या में पूरे उत्तराखंड के देवताओं का एक स्थान पर जुटना है। हम सभी को यह ज्ञात होना चाहिए कि माँ नंदा को उत्तराखंड की बेटी के रूप में देखा जाता है। इसी लिए लोकगीतों में माँ नंदा वर्णन आता है, ग्रामीण महिलाएं जिस प्रकार से अपने मायके से विदा होती है उसी प्रकार से माँ नंदा की विदाई के साथ यहां यात्रा जुड़ी है।
महिलाओं के गीतों को सुनने मात्र से माँ नंदा के प्रति उनके भावों को जाना और समझा जा सकता है। जा मेरी लाडली नंदा ते ऊँचा कैलाशा, ना ना बाबा मैं ना जानदू ते ऊँचा कैलाशा। यह पहाड़ी गीत लड़की की विदाई को बताता हुआ पुत्री और पिता के मां के भावों को व्यक्त करता है प्रोफेसर राकेश कुंवर जो की पंवार वंशी राज परिवार से जुड़े हैं उनके अनुसार मां नंदा की यात्रा में संपूर्ण उत्तराखंड से लगभग 500 से अधिक देवी देवताओं का यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर मिलना होता है। मां नंदा की यह जात या यात्रा संपूर्ण देवभूमि को एक-दूसरे के साथ जोड़ने का काम करती है। यह यात्रा नौटी गांव और लोकजात कुरुड़ से प्रारंभ होती है, एक राजजात के नाम से तो वहीं दूसरी लोकजात के नाम से। मां नंदा की यात्रा गढ़वाल क्षेत्र में होने वाली प्राचीनतम यात्रा के रूप में जानी जाती है।
मां नंदा की वर्षों से होने वाली यात्रा में पंवार वंशी राजाओं का अपना महत्व है यह भी मान्यता है कि पंवारो के शासन से पूर्व इस क्षेत्र में कत्यूरी राजवंश का शासन था मां नंदा की जात इस समय भी होती थी ऐसा भी प्रमाण मिलते हैं लेकिन राजा की भूमिका इसमें कुछ खास नहीं रहती थी इस वंश ने लगभग 300 से 500 वर्षों तक शासन किया। उनकी शुरुआती राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) पहले पवार वंश ने चांदपुर गढ़ पर शासन किया तदोपरांत 1412 में इस वंश का राजा अजय पाल अपनी राजधानी श्रीनगर के पास देवलगढ़ ले गया 15 वर्ष यहां रहा फिर अपनी राजधानी श्रीनगर गढ़वाल में बनाई गोरखों के आक्रमण के कारण बाद में टिहरी रियासत बनी । कत्यूरियों के बाद पवार वंश ने लगभग 770 ईस्वी से 1790 ईस्वी तक लंबे समय तक शासन किया। कत्यूरी राजवंश के बाद परमार (पँवार) राजवंश का गढ़वाल क्षेत्र पर मुख्य शासन रहा। बाद में गोरखा आक्रमण और अंग्रेजों के साथ संधि के बाद इस वंश के राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी स्थापित की। यह वही राजवंश था जिसने मां नंदा की राजजात की शुरुआत की जो की 12 वर्षों के पश्चात राजा की देखरेख में यह यात्रा होने लगी। यह यात्रा चमोली जिले के नौटी गांव से होते हुए होमकुंड जिसे भगवान शिव के साथ जोड़कर देखा जाता है, वहां तक जाती है प्रोफेसर राकेश कुंवर की माने तो ‘मां नंदा की राजजात जो 12 वर्षों के बाद होती है। जिसकी शुरुआत नौटी गांव में पूजन के साथ होती है और होमकुंड तक की यह यात्रा होती है'।
इस यात्रा की शुरुआत नौटी से होकर पहले दिन का पड़ाव कर्णप्रयाग के पास ईड़ाबनाडी गांव तक होता है। यहां से फिर यात्रा वापस नौटी गांव आती है, नौटी से कांसुवा गाँव होते हुए ईड़ाबनाडी, चांदपुर गढ़ में दिन में टिहरी नरेश शाही पूजा करते है सेमगाँव, कोटी, भगौती (यहां माँ नंदा के मायके का आखिरी गाँव है) इसके बाद कुलसारी गांव पड़ता हैं यहां पर दक्षिण काली का यंत्र भूमिगत है यहां यात्रा अमावश्य की पूजा पाकर आगे चेपडियों पहुंचती है (यह गांव बुटोला थोकदार इाल्daत् थ्दे् का हैं) आगे नंदकेसरी नामक स्थान पर राजजात व कुरूड की व अल्मोड़ा की नंदा देवी से मिलन होता है फिर यात्रा फल्दिया गांव फिर मुंदेली फिर वाण गांव यह आबादी का आखिरी गाँव है, यहां से यात्रा निर्जन पड़ावों से गुजरती है यही से देवी के आगे लाटू देवता चलता हैं यह देवी का धर्म भाई है, यात्रा फिर गैरोली पातल, वेदनी कुंड में राजकुंवर अपने पितरों का तर्पण करते हैं, उनके साथ इसमें यात्रीगण भी शामिल होते हैं, तदोपरांत पातर नचौनियां रात्रि में प्रवास होता है, फिर कलुवा विनायक (गणेश जी प्रतिमा) में पूजा करते हुए रूपकुंड, फिर ज्यूरागली (17500 फीट की ऊंचाई)को पार करते हुए फिर नीचे शिला समुद्र आते है रात्रि प्रवास हेतु (शिला समुद्र से आशय चट्टानों की अधिकता यह स्थान ग्लेशियर के ऊपर है) दूसरे व अंतिम दिन होमकुंड अष्टमी व नवमीं के मिलन पर पहुंचते हैं यही पर देवी को चौसिंगिया मेढ़े के साथ विदा किया जाता है, बताया जाता है कि द्वापर में इस स्थान पर शिव व नंदा का विवाह उपरोक्त तिथि पर हुआ था, इसके बाद यात्रा चंदनिया घट रुकती है फिर सुतोल गाँव पहुंचती है यह आबादी का इस तरफ से पहला गांव है फिर घाट, नंदप्रयाग होते हुए कर्णप्रयाग फिर नौटी इस दौरान नौटी में देवी भागवत चल रहा होता है वहां से सुफल पाकर राजकुंवर अपने पैतृक गांव कांसुवा लौटते हैं। इस तरह यात्रा समाप्त हो जाती है फिर जनमानस को अगली यात्रा का इंतजार रहता है। अभी 2014 की राजजात में 35 लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे, इसी प्रकार से लोकजात में भी काफी संख्या में लोगों का एकत्रीकरण होता है। लोकजात का तो कोई वर्णन नहीं मिलता कि यहाँ कब से शुरू हुई है लेकिन राजजात के तो प्रमाण मिल जाते है।
कांसुवा से मिले दस्तावेजों के आधार पर (जो कि राजकुंवरों का गांव है पंवार राजवंश की कनिष्ठ शाखा चांदपुर गढ़ से यही बसी इन्हीं पर राजजात संपन्न करने का प्रभार है) उपलब्ध आंकड़ों की मानें तो 1843 से इस राजजात के प्रमाण मिल जाते हैं। इसी प्रकार से वर्ष 1863,1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987, 2000 और हाल ही में संपन्न हुई राजजात 2014 में हुई थी। माँ नंदा को उत्तराखंड में बेटी के रूप में माना जाता है, इस लिए यात्रा के दौरान एक गीत गया जाता है कि तू जाम से नंदा लेकिन जल्दी आए तू हिमालय पर्वत की चेली हो, तुम इस पहाड़ की चेली हो, खुपोऊ की पहली बाली हो, धिनाई की पहली नाली पे तेरा ही अधिकार है, हमार हर खुशी में तू छे, हर दुख में तकेची बुलानु, तुम हमार भगवान छा, और हमार कुलदेवी हो, हमार लीजे तू भगवान नी छे, तू वो चेली छे जब तेरी बिदाई ही पुर पहाड़ रोऊ, आज हम तेके डोली बैठाऊ मुई, तो जा चेली जा-जा बस येतु याद धरिये की यो पहाड़ तेर मेत छू'। इसलिए माँ नंदा की जात यह लोक मन को स्पर्श करने का विषय है, हमारे देश में इन विषयों पर कुछ बातें तो हुई लेकिन विलियम एस सेक्स, बिल एटिकन जैसे विदेशी लेखकों के द्वारा माँ नंदा की यात्रा को बड़े ही विस्तार से बताने का प्रयास हुआ है। लोक गीतों के शब्द माँ नंदा के प्रति लोगें के मन के भावों को कितने ही मार्मिक ढंग से व्यक्त करते हैं यह भी जानने और समझने के लायक है। इस वर्ष लोक जात हो रही है। 2027 में राज जात होगी।
(लेखक तुलनात्मक अध्ययन एवं राजनीतिक सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली हैं।)