नाटक 'ािढयाकर्म ट्वेंटी फोर सेवन एक द रेट जीमेल डाट काम' का मंचन,व्यंग्य से करुणा तक संवेदनहीन होते समय का आईना
प्रकाशित: 09-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
लखनऊ,(वीअ)। बदलते पारिवारिक मूल्यों और बुजुर्ग माता-पिता के प्रति घटती संवेदनशीलता की ऐसी ही एक बेचैन करने वाली तस्वीर सामने रखता है नाटक 'ािढयाकर्म ट्वेंटी फोर सेवन एक द रेट जीमेल डाट काम'। राम किशोर नाग के लिखे नाटक को आज शाम बिम्ब सांस्कृतिक मंच के कलाकारों ने संस्कृति मंत्रालय दिल्ली और संस्कृति निदेशालय उत्तर प्रदेश के सहयोग से महर्षि कपूर के निर्देशन में प्रस्तुत किया।
साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब नहीं होता, वह उसके भीतर छिपी उन दरारों को भी दिखाता है, जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते। मंचित नाटक की कहानी का केंद्र एक वृद्ध दंपती और उनके तीन बेटे हैं। तीनों अपनी-अपनी नौकरी, परिवार और सुविधाओं में इस कदर उलझे हैं कि माता-पिता के अंतिम संस्कार जैसा पारंपरिक पारिवारिक दायित्व भी उन्हें एक ‘समस्या' दिखाई देने लगता है। समाधान के लिए वे एक ऐसी कंपनी का सहारा लेते हैं, जो अंतिम संस्कार के अलग-अलग पैकेज उपलब्ध कराती है। तीनों भाई भावनाओं के बजाय सुविधा और खर्च के हिसाब से सबसे सस्ता विकल्प चुनते हैं।
यहीं कहानी का व्यंग्य अपनी धार पाता है। जिस ािढया-कर्म में कभी श्रद्धा, संस्कार और पुत्रधर्म की भावना जुड़ी होती थी, वह अब बाजार की भाषा में ‘पैकेज' बन जाता है। लेखक इस विडंबना पर कोई उपदेश नहीं देता, बल्कि परिस्थितियों के माध्यम से पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचाता है।
कहानी का सबसे मार्मिक प्रसंग अंत में आता है। शेखर का बेटा डब्बू पूरी बातचीत सुनने के बाद कंपनी के मैनेजर को अपने माता-पिता के ािढया-कर्म के लिए सौ रुपये अग्रिम देता है। पिता की डाँट पर डब्बू का मासूम जवाब पूरी कहानी का आईना बन जाता है कि जब उसके माता-पिता अपने माता-पिता के लिए समय और संवेदना नहीं निकाल पा रहे, तो अगली पीढ़ी भी उसी व्यवहार को क्यों न अपनाए?
यही कहानी का मूल प्रश्न है। हम अपने बच्चों के लिए जो मूल्य छोड़ रहे हैं, क्या वही कल हमारे हिस्से में लौटकर नहीं आएँगे? कहानी का अंत पाठक को चुप कर देता है।
साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब नहीं होता, वह उसके भीतर छिपी उन दरारों को भी दिखाता है, जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते। मंचित नाटक की कहानी का केंद्र एक वृद्ध दंपती और उनके तीन बेटे हैं। तीनों अपनी-अपनी नौकरी, परिवार और सुविधाओं में इस कदर उलझे हैं कि माता-पिता के अंतिम संस्कार जैसा पारंपरिक पारिवारिक दायित्व भी उन्हें एक ‘समस्या' दिखाई देने लगता है। समाधान के लिए वे एक ऐसी कंपनी का सहारा लेते हैं, जो अंतिम संस्कार के अलग-अलग पैकेज उपलब्ध कराती है। तीनों भाई भावनाओं के बजाय सुविधा और खर्च के हिसाब से सबसे सस्ता विकल्प चुनते हैं।
यहीं कहानी का व्यंग्य अपनी धार पाता है। जिस ािढया-कर्म में कभी श्रद्धा, संस्कार और पुत्रधर्म की भावना जुड़ी होती थी, वह अब बाजार की भाषा में ‘पैकेज' बन जाता है। लेखक इस विडंबना पर कोई उपदेश नहीं देता, बल्कि परिस्थितियों के माध्यम से पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचाता है।
कहानी का सबसे मार्मिक प्रसंग अंत में आता है। शेखर का बेटा डब्बू पूरी बातचीत सुनने के बाद कंपनी के मैनेजर को अपने माता-पिता के ािढया-कर्म के लिए सौ रुपये अग्रिम देता है। पिता की डाँट पर डब्बू का मासूम जवाब पूरी कहानी का आईना बन जाता है कि जब उसके माता-पिता अपने माता-पिता के लिए समय और संवेदना नहीं निकाल पा रहे, तो अगली पीढ़ी भी उसी व्यवहार को क्यों न अपनाए?
यही कहानी का मूल प्रश्न है। हम अपने बच्चों के लिए जो मूल्य छोड़ रहे हैं, क्या वही कल हमारे हिस्से में लौटकर नहीं आएँगे? कहानी का अंत पाठक को चुप कर देता है।