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नेपाल त्रासदी: क्या केवल प्राकृतिक आपदा समझना उचित होगा?

प्रकाशित: 30-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
नेपाल में हाल ही में घटी भयावह त्रासदी ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इसने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और मानव विकास की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। बाढ़, भूस्खलन, हिमनदों (ग्लेशियर) के टूटने और अचानक आने वाले मलबे के सैलाब जैसी घटनाओं को 'प्राकृतिक आपदा' कहकर आगे बढ़ जाना आसान हो सकता है। लेकिन क्या इस त्रासदी से हुई जन-धन की अपार हानि को केवल प्राकृतिक आपदा मानना उचित है? शायद नहीं।
यह घटना प्रकृति के बदलते स्वरूप को पहचानने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के सम्मिलित प्रभावों की नए सिरे से विवेचना करने का अवसर देती है।हिमालय क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अत्यधिक सािढय पर्वत प्रणालियों में से एक है। इसकी भौगोलिक संरचना स्वाभाविक रूप से इसे भूस्खलन, भूकंप, बाढ़ और हिमस्खलन जैसी घटनाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके बावजूद सदियों से स्थानीय समुदाय प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीते आए हैं। समस्या तब अधिक गंभीर हो जाती है, जब प्राकृतिक संवेदनशीलता को दरकिनार कर अप्राकृतिक मानवीय गतिविधियों और अवसंरचनात्मक दबाव को प्राथमिकता दी जाने लगती है।नेपाल की घटना को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। हिमनदों और हिमनदीय झीलों में हो रहे परिवर्तन, वैश्विक तापमान में वृद्धि, अत्यधिक मूसलाधार वर्षा और पहाड़ी ढलानों पर बिना योजना के बसती आबादी या अनियंत्रित पर्यटन जोखिम को कई गुना बढ़ा रहे हैं। किसी एक घटना को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से सही न हो, लेकिन बदलती जलवायु और हिमालयी पर्यावरण में आ रहे बदलावों को नजरअंदाज करना भी उतना ही अनुचित होगा।
इस त्रासदी का सबसे चिंताजनक पहलू सूचना ाढांति के युग में भी ऐसी घटनाओं का बड़े पैमाने पर अप्रत्याशित रूप से जन- धन नुकसान पहुंचाना है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि सामान्य बाढ़ की तुलना में ग्लेशियर फटने या हिमनदीय झील के टूटने से उत्पन्न मलबे का प्रवाह अत्यंत तीव्र और विनाशकारी होता है। पानी के साथ बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह नीचे की ओर बढ़ता है तथा रास्ते में आने वाली बस्तियों, सड़कों और पुलों को ध्वस्त कर देता है। ऐसे में मात्र कुछ मिनटों या घंटों की अग्रिम पूर्व चेतावनी भी हजारों जान-माल की रक्षा कर सकती है।
प्रश्न केवल यह नहीं है कि ऐसी विनाशकारी प्राकृतिक घटना कैसे घटी, बल्कि प्रश्न यह भी है कि हमने संवेदनशील स्थानों पर अनियोजित निर्माण की अनुमति क्यों और कैसे दी?,समय रहते सूचना क्यों नहीं प्राप्त की जा सकी?इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों, अस्पतालों, विद्यालयों, संचार व्यवस्था और बिजली का विकास आवश्यक है। लेकिन यदि यह विकास हिमालय की पारिस्थितिक वहन क्षमता को ध्यान में रखे बिना किया जाए, तो वही विकास आपदा का कारण बन जाता है। नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्रों में अतिक्रमण, अस्थिर ढलानों पर अवैज्ञानिक सड़क निर्माण, बहुमंजिला होटलों एवं भवनों का निर्माण और बिना पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के बड़ी परियोजनाएं किसी भी प्राकृतिक घटना को मानवीय त्रासदी में बदल देती हैं।इसलिए प्राकृतिक आपदा और मानवजनित आपदा के अंतर को समझना आवश्यक है। भूस्खलन एक प्राकृतिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन यदि अनियोजित निर्माण के कारण लोग वहां जोखिम में आते हैं, तो उसके विनाशकारी प्रभाव में मानवीय निर्णयों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह घटना भारत के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा लद्दाख और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य भी इसी हिमालयी पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं। केदारनाथ और चमोली जैसी त्रासदियों ने पहले ही यह साबित कर दिया है कि अत्यधिक वर्षा और मानवीय हस्तक्षेप का संयोजन कितना विनाशकारी हो सकता है। अत नेपाल के प्रति केवल संवेदना व्यक्त करना या राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं होगा; हमें इस घटना से सीख लेकर अपने देश में भी बहुत कुछ करना होगा।
आज आधुनिक विज्ञान, उपग्रह निगरानी, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, मौसम पूर्वानुमान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी संभव है। इसके साथ ही, भारत और नेपाल के बीच सीमा-पार आपदा सूचनाओं का त्वरित आदान-प्रदान समय की मांग है, क्योंकि नदियां और ग्लेशियर राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानते।
हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों को मैदानों की तर्ज पर विकसित करने का जोखिम नहीं लिया जा सकता। पहाड़ों में विकास का अर्थ अनियंत्रित निर्माण नहीं, बल्कि न्यूनतम पर्यावरणीय क्षति के साथ अधिकतम मानवीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
आपदा प्रबंधन केवल राहत सामग्री बांटने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह जोखिम की पूर्व पहचान, निर्माण पर नियंत्रण, स्थानीय समुदायों के प्रशिक्षण और वैज्ञानिक नियोजन से शुरू होता है। सरकारें प्रकृति को दोष देकर अपनी प्रशासनिक जवाबदेही से नहीं बच सकती। मनुष्य को प्रकृति पर विजय पाने का अहंकार छोड़कर उसके संकेतों को समझने और उसके अनुरूप विकास की नीति तय करने में ही बुद्धिमत्ता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)