पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता आम आदमी के लिए मुश्किल
प्रकाशित: 30-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
काफी दिनों से चल रहे खड़ी युद्ध ने पेट्रोल की बढ़ती हुई कीमतों से निपटने के लिय भारत सरकार ने पेट्रोल में ई20 फार्मूला लागू किया, जिसका अर्थ यह है कि पेट्रोल में 20ज्ञ् गन्ने के रस से इथेनॉल मिलाया जायेगा। इसका परिणाम यह हुआ कि बाजार में 40 रु. प्रति किलो मिलने वाली चीनी की कीमत रातोंरात 70 रु. प्रति किलो तक पहुंच गई है। अब त्योहारों का दौर चल रहा है और चीनी के दामों में वृद्धि से मिठाई की कीमतें बढ़ जाएंगी। आने वाले त्योहारों में मिठाई से लेकर ईद की सेवईया और बच्चों के ग्लूकोज के बिस्किट भी महंगे हो जायेंगे। बड़ों की छोड़िये छोटे बच्चे अपनी चॉकलेट बिस्कुट ट़ॉफी के लिए तरस जाएंगे। जब हम बचपन में होते थे तो चीनी की जगह गुड से काम चला लिया करते थे पर आधुनिकता की मार ने गुड की कीमत चीनी से डेढ़ गुना तक पहुंचा दिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आधुनिकता की इस होड़ में पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता ने हमारी रोज मर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है।
वर्ष 2014 के आम सभा चुनावों के दौरान मै श्री कलराज मिश्र जी के लोकसभा चुनाव क्षेत्र देवरिया में चुनाव प्रचार कर रहा था और डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दस वर्षो के शासन काल में बढ़ती हुई महंगाई और पेट्रोल डीजल के बढ़ते हुए दामों को लेकर सरकार की विफलताओं को गिराकर भाजपा के लिय वोट मांगा करते थे और उसी समय भाजपा की राष्ट्रीय नेत्री सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी 400 रु. के गैस सिलेंडर को जनता को दिखाकर नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने की अपील करती थी और देश की जनता को यह विश्वास हो गया था कि नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही हमे आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी, पर नरेंद्र मोदी जैसे सक्षम प्रधानमंत्री के होते हुए भी आवश्यक वस्तुओं की कीमत दुगने से ज्यादा स्तर पर पहुंच गई है और गैस सिलेंडर 400 रु. की जगह 1000 रु. से अधिक रेट के स्तर पर पहुंच गया है, इसका मुख्य कारणखाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल की बढ़ती हुई कीमतें है और इनके ऊपर हमारी अत्यधिक निर्भरता है या दूसरे शब्दों में यह कह सकते है कि ाtढड ऑयल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के आगे हमारी सरकार बढ़ती हुई कीमतों पर नियंत्रण करने में असमर्थ है।
आर्थिक सुधार युग से पूर्व हमारे देश में खेती और अन्य कार्य पशुओं पर आधारित होते थे, खेत की जुताई, सिंचाई फसल की मड़ाई सब बैलों से होती थी और किसान की हैसियत इस बात से आंकी जाती थी कि उसके पास कितने बैलों की खेती है और उसके घर में कितने दुधारू पशु हैं। सामान की ढुलाई का काम बैलगाड़ी से हो जाता था और पशु धन को किसान की पूजी माना जाता था पर आर्थिक सुधार युग के बाद से सारी प्राथमिकताएं बदल गई और खेती बाड़ी पशुओं पर आधारित होने के बजाय पेट्रोल और डीजल द्वारा चालित ट्रैक्टर, ट्यूब वेल, थ्रेसर आदि पर आधारित हो गई इसका परिणाम यह हुआ कि जो पशु हमारे एसेट माने जाते थे वे बोझ बन गए और अब गायों को खिलाने और पालने के लिए सरकार को सहायता देनी पड़ती है और खेती पेट्रोल और डीजल से चालित मशीनों के ऊपर आधारित होने के कारण घाटे का सौदा हो गई है और ग्रामीण किसान गांव में रहकर खेती करने के बजाय शहरों में मजदूरी करने के लिए बाध्य है।
दरअसल आर्थिक सुधार युग के बाद हमारी आदतों और संस्कृति में बहुत बड़ा बदलाव आया है जिससे इसने हमारी पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता को बढ़ावा दे दिया है। पहले के समय में कोई सामान खरीदने के लिए एकाध किलोमीटर स्थित बाजार पैदल जाना हमारी आदतों में शुमार होता था अगर घर में कोई मेहमान आ गया तो हम बाजार दौड़कर कर बाजार जाकर जरूरी सामान लेकर आ जाते थे, इससे हम स्वस्थ भी रहते थे और हमारी खरीददारी के लिय पेट्रोल और डीजल की खपत नहीं होती थी। पर अब हम एकाध किलोमीटर तो दूर 200 मीटर चलने के लिय मोटर साइकिल का इस्तेमाल करते हैं आज कोई भी ऐसा घर नहीं है जिसमे मोटर साइकिल न हो आजकल प्राय यह मजाक में कहा जाता है कि लोग बी पी एल योजना के अंतर्गत मिलने वाला 5 किलो राशन मोटर साइकिल पर जाते हैं, सरकार को चाहिए कि जिन घरों में पेट्रोल या डीजल से चलने वाला वाहन जैसे मोटर साइकिल या मोटर कार हो उन्हें बी पी एल के अंतर्गत मुफ़्त सुविधाएं बंद कर देनी चहिये। आजकल ग्रामीण भारत में चाहे घर पर छत न हो लड़के की 500 रु. कमाने की हैसियत न हो लेकिन उसे शादी में मोटर साइकिल अवश्य चाहिये, ऐसी संस्कृति के आने से देश में पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है और जब तक हम इस पर काबू नहीं पा लेते तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में ाtढड ऑयल की कीमतें बढ़ने से तंग रहेंगे और वो दिन दूर नहीं जब बेरोजगारी और मंहगाई चुनाव का मुद्दा नहीं रहेगा।
जब 1980 में जनसंघ जो जनता पार्टी में विलीन हो गया और फिर निकलकर भाजपा की स्थापना हुई और इसकी स्थापना के समय दिल्ली अधिवेशन में गांधीवादी समाजवाद की अवधारणा पर जोर दिया गया। गांधी वादी अवधारणा का अर्थ वह सपना था जो महात्मा गांधी ने आजाद भारत के लिए देखा था। ऐसा भारत विदेशी कर्ज पर निर्भर भारत न हो बल्कि ऐसा भारत हो जो इस देश की प्राकृतिक सम्पदा, पहाड़ों, नदियों यहां के पशुओं के आधार पर विकाश के सके जैसा हमारा मुख्य उद्देश्य स्वावलंबन का रास्ता हो, पर दुर्भाग्य वश महात्मा गांधी की हत्या के साथ गांधी जी स़िर्फ किताबों और पोस्टरों में रह गए। हमने ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित कर ली जो भारत के अपने संसाधनों के आधार पर विकसित भारत का निर्माण करने के बजाय विदेशी कर्ज, विदेशी मुद्रा और विदेशी पेट्रोल और डीजल के बल पर चल रही है।
वर्ष 2003 में पशुओं पर न्यायमूर्ति जी एम लोढ़ा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में गाय और उसकी संतान की रक्षा तथा भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित में कड़े कानून के गठन की आवश्यकता पर जोर दिया। आज भी देश के 75ज्ञ् अति पिछड़े गांवों में लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधियों चला रहे हैं। आधुनिकता कि मजबूरियों के बावजूद डीजल से चलने वाले ट्रैक्टर छोटे खेतों के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिय उपलब्ध भूमि लगभग 14 एकड़ के आस पास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण भी बढ़ाता है। इसलिए बहुत पहले एलबर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा था "भारत के लोगों को बताए अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो वे ट्रैक्टर को भूल जाए तथा प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे" (हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान पृष्ठ 191 लेखक डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी)। कैसी विडंबना है कि कई दशकों पूर्व एलबर्ट आइंस्टाइन द्वारा सर सीवी रमन को कही बात आर्थिक सुधार युग में भी सत्य साबित हो रही है और भारत अपने नागरिकों को सचमुच खुशहाल देखना चाहता है तो पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता को त्याग कर आधुनिकता और पारंपरिक तरीकों में उचित संतुलन बना कर चले।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)
काफी दिनों से चल रहे खड़ी युद्ध ने पेट्रोल की बढ़ती हुई कीमतों से निपटने के लिय भारत सरकार ने पेट्रोल में ई20 फार्मूला लागू किया, जिसका अर्थ यह है कि पेट्रोल में 20ज्ञ् गन्ने के रस से इथेनॉल मिलाया जायेगा। इसका परिणाम यह हुआ कि बाजार में 40 रु. प्रति किलो मिलने वाली चीनी की कीमत रातोंरात 70 रु. प्रति किलो तक पहुंच गई है। अब त्योहारों का दौर चल रहा है और चीनी के दामों में वृद्धि से मिठाई की कीमतें बढ़ जाएंगी। आने वाले त्योहारों में मिठाई से लेकर ईद की सेवईया और बच्चों के ग्लूकोज के बिस्किट भी महंगे हो जायेंगे। बड़ों की छोड़िये छोटे बच्चे अपनी चॉकलेट बिस्कुट ट़ॉफी के लिए तरस जाएंगे। जब हम बचपन में होते थे तो चीनी की जगह गुड से काम चला लिया करते थे पर आधुनिकता की मार ने गुड की कीमत चीनी से डेढ़ गुना तक पहुंचा दिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आधुनिकता की इस होड़ में पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता ने हमारी रोज मर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है।
वर्ष 2014 के आम सभा चुनावों के दौरान मै श्री कलराज मिश्र जी के लोकसभा चुनाव क्षेत्र देवरिया में चुनाव प्रचार कर रहा था और डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दस वर्षो के शासन काल में बढ़ती हुई महंगाई और पेट्रोल डीजल के बढ़ते हुए दामों को लेकर सरकार की विफलताओं को गिराकर भाजपा के लिय वोट मांगा करते थे और उसी समय भाजपा की राष्ट्रीय नेत्री सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी 400 रु. के गैस सिलेंडर को जनता को दिखाकर नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने की अपील करती थी और देश की जनता को यह विश्वास हो गया था कि नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही हमे आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी, पर नरेंद्र मोदी जैसे सक्षम प्रधानमंत्री के होते हुए भी आवश्यक वस्तुओं की कीमत दुगने से ज्यादा स्तर पर पहुंच गई है और गैस सिलेंडर 400 रु. की जगह 1000 रु. से अधिक रेट के स्तर पर पहुंच गया है, इसका मुख्य कारणखाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल की बढ़ती हुई कीमतें है और इनके ऊपर हमारी अत्यधिक निर्भरता है या दूसरे शब्दों में यह कह सकते है कि ाtढड ऑयल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के आगे हमारी सरकार बढ़ती हुई कीमतों पर नियंत्रण करने में असमर्थ है।
आर्थिक सुधार युग से पूर्व हमारे देश में खेती और अन्य कार्य पशुओं पर आधारित होते थे, खेत की जुताई, सिंचाई फसल की मड़ाई सब बैलों से होती थी और किसान की हैसियत इस बात से आंकी जाती थी कि उसके पास कितने बैलों की खेती है और उसके घर में कितने दुधारू पशु हैं। सामान की ढुलाई का काम बैलगाड़ी से हो जाता था और पशु धन को किसान की पूजी माना जाता था पर आर्थिक सुधार युग के बाद से सारी प्राथमिकताएं बदल गई और खेती बाड़ी पशुओं पर आधारित होने के बजाय पेट्रोल और डीजल द्वारा चालित ट्रैक्टर, ट्यूब वेल, थ्रेसर आदि पर आधारित हो गई इसका परिणाम यह हुआ कि जो पशु हमारे एसेट माने जाते थे वे बोझ बन गए और अब गायों को खिलाने और पालने के लिए सरकार को सहायता देनी पड़ती है और खेती पेट्रोल और डीजल से चालित मशीनों के ऊपर आधारित होने के कारण घाटे का सौदा हो गई है और ग्रामीण किसान गांव में रहकर खेती करने के बजाय शहरों में मजदूरी करने के लिए बाध्य है।
दरअसल आर्थिक सुधार युग के बाद हमारी आदतों और संस्कृति में बहुत बड़ा बदलाव आया है जिससे इसने हमारी पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता को बढ़ावा दे दिया है। पहले के समय में कोई सामान खरीदने के लिए एकाध किलोमीटर स्थित बाजार पैदल जाना हमारी आदतों में शुमार होता था अगर घर में कोई मेहमान आ गया तो हम बाजार दौड़कर कर बाजार जाकर जरूरी सामान लेकर आ जाते थे, इससे हम स्वस्थ भी रहते थे और हमारी खरीददारी के लिय पेट्रोल और डीजल की खपत नहीं होती थी। पर अब हम एकाध किलोमीटर तो दूर 200 मीटर चलने के लिय मोटर साइकिल का इस्तेमाल करते हैं आज कोई भी ऐसा घर नहीं है जिसमे मोटर साइकिल न हो आजकल प्राय यह मजाक में कहा जाता है कि लोग बी पी एल योजना के अंतर्गत मिलने वाला 5 किलो राशन मोटर साइकिल पर जाते हैं, सरकार को चाहिए कि जिन घरों में पेट्रोल या डीजल से चलने वाला वाहन जैसे मोटर साइकिल या मोटर कार हो उन्हें बी पी एल के अंतर्गत मुफ़्त सुविधाएं बंद कर देनी चहिये। आजकल ग्रामीण भारत में चाहे घर पर छत न हो लड़के की 500 रु. कमाने की हैसियत न हो लेकिन उसे शादी में मोटर साइकिल अवश्य चाहिये, ऐसी संस्कृति के आने से देश में पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है और जब तक हम इस पर काबू नहीं पा लेते तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में ाtढड ऑयल की कीमतें बढ़ने से तंग रहेंगे और वो दिन दूर नहीं जब बेरोजगारी और मंहगाई चुनाव का मुद्दा नहीं रहेगा।
जब 1980 में जनसंघ जो जनता पार्टी में विलीन हो गया और फिर निकलकर भाजपा की स्थापना हुई और इसकी स्थापना के समय दिल्ली अधिवेशन में गांधीवादी समाजवाद की अवधारणा पर जोर दिया गया। गांधी वादी अवधारणा का अर्थ वह सपना था जो महात्मा गांधी ने आजाद भारत के लिए देखा था। ऐसा भारत विदेशी कर्ज पर निर्भर भारत न हो बल्कि ऐसा भारत हो जो इस देश की प्राकृतिक सम्पदा, पहाड़ों, नदियों यहां के पशुओं के आधार पर विकाश के सके जैसा हमारा मुख्य उद्देश्य स्वावलंबन का रास्ता हो, पर दुर्भाग्य वश महात्मा गांधी की हत्या के साथ गांधी जी स़िर्फ किताबों और पोस्टरों में रह गए। हमने ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित कर ली जो भारत के अपने संसाधनों के आधार पर विकसित भारत का निर्माण करने के बजाय विदेशी कर्ज, विदेशी मुद्रा और विदेशी पेट्रोल और डीजल के बल पर चल रही है।
वर्ष 2003 में पशुओं पर न्यायमूर्ति जी एम लोढ़ा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में गाय और उसकी संतान की रक्षा तथा भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित में कड़े कानून के गठन की आवश्यकता पर जोर दिया। आज भी देश के 75ज्ञ् अति पिछड़े गांवों में लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधियों चला रहे हैं। आधुनिकता कि मजबूरियों के बावजूद डीजल से चलने वाले ट्रैक्टर छोटे खेतों के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिय उपलब्ध भूमि लगभग 14 एकड़ के आस पास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण भी बढ़ाता है। इसलिए बहुत पहले एलबर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा था "भारत के लोगों को बताए अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो वे ट्रैक्टर को भूल जाए तथा प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे" (हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान पृष्ठ 191 लेखक डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी)। कैसी विडंबना है कि कई दशकों पूर्व एलबर्ट आइंस्टाइन द्वारा सर सीवी रमन को कही बात आर्थिक सुधार युग में भी सत्य साबित हो रही है और भारत अपने नागरिकों को सचमुच खुशहाल देखना चाहता है तो पेट्रोल और डीजल पर अत्यधिक निर्भरता को त्याग कर आधुनिकता और पारंपरिक तरीकों में उचित संतुलन बना कर चले।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)