एफसीआरए ने छुड़ाए अमेरिका के पसीने
प्रकाशित: 09-08-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
इस मानसून सत्र में सरकार जिन दो महत्वपूर्ण विधेयकों को पास कराना चाहती है उनमें परिसीमन और एफसीआरए विधेयक शामिल है। अमेरिका एफसीआरए विधेयक के खिलाफ है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि इस विधेयक को पास होने से रोकने के लिए अमेरिकी नेता भी मैदान में उतर आए है। सीनेटर राइली मूर का हालिया बयान चर्चा में है। दरअसल हर साल भारत में विदेशी फंडिंग के रूप में 15 से 20 हजार करोड़ रुपए आते हैं। इसका मुख्य हिस्सा सामाजिक,शैक्षणिक और धाfिर्मक कार्यों में खर्च किया जाता है। कुछ समय पहले ओपन सोसाइटी के प्रमुख कर्ता-धर्ता जार्ज सोरोस के एक बयान ने हर संवेदनशील भारतीय को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या कुछ देशों या लोगों को भारत की तरक्का बर्दाश्त नहीं है। यह बयान बताता है कि भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए एफसीआरए कितना जरूरी है। फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) जिसे हिंदी में विदेशी अंशदान विनियमन कानून (संशोधन) विधेयक कहते हैं, को सरकार विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाला कदम बता रही है वहीं विपक्ष और विदेशी नेता एनजीओ पर इसके असर को लेकर चिंता जता रहे हैं। एफसीआरए रजिस्ट्रेशन को अब स्वीकृत उद्देश्यों और निर्धारित राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ दिया गया है। संस्थाओं को अब स्पष्ट रूप से बताना होगा कि विदेशी फंड किस विशिष्ट काम और किस क्षेत्र में इस्तेमाल होगा। नए नियमों के मुताबिक विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल धर्म परिवर्तन कराने में नहीं किया जा सकेगी। यदि किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द होता है या अवधि समाप्त होती है तो विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। अमेरिकी नेता इसे सख्त कानून बताकर इसकी आलोचना कर रहे हैं। जबकि विदेशी फंडिंग को लेकर सिर्फ अमेरिका ही नहीं स्लोवाकिया, जार्जिया और रूस जैसे देशों में भी विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए रजिस्ट्रेशन, फंडिंग का खुलासा, ऑडिट और सख्त निगरानी जैसे नियम लागू है। भारत के प्रस्तावित बदलाव भी इसी वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप माने जा रहे हैं। फंड का पूरा रिकार्ड रखना, असली दानदाता की जानकारी देना और पैसे के इस्तेमाल पर कड़ी नजर रखना गलत कैसे हो सकता है। भारत के लिए एफसीआरए कानून नया नहीं है। इसमें समय-समय पर जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जाते रहे हैं। सबसे पहले यह कानून 1976 में अस्तित्व में आया था। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। इसके बाद 2010 में नया एफसीआरए कानून लागू किया गया। वर्ष 2020 में इसमें ब़ड़े संशोधन किए गए। हालात को देखते हुए सरकार एक बार फिर संशोधन विधेयक लाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनजीओ को फंडिंग देकर स्थानीय सरकारों के खिलाफ मैदान में उताकर अमेरिकी हितों को साधना अमेरिका का पुराना फंडा है। भारत सरकार इस रास्ते को बंद करना चाहती है जबकि अमेरिका इस विधेयक को रोककर भारत पर दबाव बनाए रखना चाहता है। गृहमंत्री अमित शाह भारत विरोधी किसी भी योजना को कामयाब नहीं होने देंगे। इसीलिए मोदी सरकार के इस बिल से उसके पसीने छूट रहे हैं। वह चीन वाली गलती भारत में दोहराना नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि भारत इतना ताकतवर हो जाए कि वह उस पर काबू न पा सके। अमेरिका को समझना चाहिए कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। अपना भला-बुरा जानता है। उसे अपने कानून बनाने के लिए अमेरिका से पूछने की जरूरत नहीं है। अमेरिका यदि महाशक्ति बने रहना चाहता है तो बेहतर होगा कि वह भारत को देखने वाला अपना चश्मा बदल ले अन्यथा उसके पसीने ऐसे ही छूटते रहेंगे।
इस मानसून सत्र में सरकार जिन दो महत्वपूर्ण विधेयकों को पास कराना चाहती है उनमें परिसीमन और एफसीआरए विधेयक शामिल है। अमेरिका एफसीआरए विधेयक के खिलाफ है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि इस विधेयक को पास होने से रोकने के लिए अमेरिकी नेता भी मैदान में उतर आए है। सीनेटर राइली मूर का हालिया बयान चर्चा में है। दरअसल हर साल भारत में विदेशी फंडिंग के रूप में 15 से 20 हजार करोड़ रुपए आते हैं। इसका मुख्य हिस्सा सामाजिक,शैक्षणिक और धाfिर्मक कार्यों में खर्च किया जाता है। कुछ समय पहले ओपन सोसाइटी के प्रमुख कर्ता-धर्ता जार्ज सोरोस के एक बयान ने हर संवेदनशील भारतीय को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या कुछ देशों या लोगों को भारत की तरक्का बर्दाश्त नहीं है। यह बयान बताता है कि भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए एफसीआरए कितना जरूरी है। फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) जिसे हिंदी में विदेशी अंशदान विनियमन कानून (संशोधन) विधेयक कहते हैं, को सरकार विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाला कदम बता रही है वहीं विपक्ष और विदेशी नेता एनजीओ पर इसके असर को लेकर चिंता जता रहे हैं। एफसीआरए रजिस्ट्रेशन को अब स्वीकृत उद्देश्यों और निर्धारित राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ दिया गया है। संस्थाओं को अब स्पष्ट रूप से बताना होगा कि विदेशी फंड किस विशिष्ट काम और किस क्षेत्र में इस्तेमाल होगा। नए नियमों के मुताबिक विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल धर्म परिवर्तन कराने में नहीं किया जा सकेगी। यदि किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द होता है या अवधि समाप्त होती है तो विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। अमेरिकी नेता इसे सख्त कानून बताकर इसकी आलोचना कर रहे हैं। जबकि विदेशी फंडिंग को लेकर सिर्फ अमेरिका ही नहीं स्लोवाकिया, जार्जिया और रूस जैसे देशों में भी विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए रजिस्ट्रेशन, फंडिंग का खुलासा, ऑडिट और सख्त निगरानी जैसे नियम लागू है। भारत के प्रस्तावित बदलाव भी इसी वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप माने जा रहे हैं। फंड का पूरा रिकार्ड रखना, असली दानदाता की जानकारी देना और पैसे के इस्तेमाल पर कड़ी नजर रखना गलत कैसे हो सकता है। भारत के लिए एफसीआरए कानून नया नहीं है। इसमें समय-समय पर जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जाते रहे हैं। सबसे पहले यह कानून 1976 में अस्तित्व में आया था। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। इसके बाद 2010 में नया एफसीआरए कानून लागू किया गया। वर्ष 2020 में इसमें ब़ड़े संशोधन किए गए। हालात को देखते हुए सरकार एक बार फिर संशोधन विधेयक लाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनजीओ को फंडिंग देकर स्थानीय सरकारों के खिलाफ मैदान में उताकर अमेरिकी हितों को साधना अमेरिका का पुराना फंडा है। भारत सरकार इस रास्ते को बंद करना चाहती है जबकि अमेरिका इस विधेयक को रोककर भारत पर दबाव बनाए रखना चाहता है। गृहमंत्री अमित शाह भारत विरोधी किसी भी योजना को कामयाब नहीं होने देंगे। इसीलिए मोदी सरकार के इस बिल से उसके पसीने छूट रहे हैं। वह चीन वाली गलती भारत में दोहराना नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि भारत इतना ताकतवर हो जाए कि वह उस पर काबू न पा सके। अमेरिका को समझना चाहिए कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। अपना भला-बुरा जानता है। उसे अपने कानून बनाने के लिए अमेरिका से पूछने की जरूरत नहीं है। अमेरिका यदि महाशक्ति बने रहना चाहता है तो बेहतर होगा कि वह भारत को देखने वाला अपना चश्मा बदल ले अन्यथा उसके पसीने ऐसे ही छूटते रहेंगे।