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भाजपा सांसद का आदिवासी मुद्दों पर विद्रोह

प्रकाशित: 12-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
गुजरात की राजनीति में भाजपा सांसद मनसुख वसावा लंबे समय से ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में जाने जाते हैं जो आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते रहे हैं। वे भरूच संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और नर्मदा तथा आसपास के आदिवासी इलाकों से जुड़े प्रश्नों को कई बार सार्वजनिक रूप से उठाते रहे हैं। हाल के वर्षों में उन्होंने जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है, उनमें वन अधिकार, विस्थापन, पुनर्वास, इको-सेंसिटिव जोन और आदिवासी क्षेत्रों में विकास संबंधी समस्याएं प्रमुख हैं। उनकी सािढयता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि वे विपक्ष के नहीं बल्कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। सबसे अधिक चर्चा नर्मदा जिले के केवड़िया क्षेत्र और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास के गांवों को लेकर हुई है। इस क्षेत्र में इको-सेंसिटिव जोन घोषित किए जाने के बाद स्थानीय आदिवासी समुदायों ने आशंका व्यक्त की कि इससे उनके भूमि अधिकार, आवास, खेती और स्थानीय विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध बढ़ सकते ह। यह घटपाम आदिवासी राजनीति के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है। आज आदिवासी समाज केवल कल्याणकारी योजनाओं की घोषणाओं से संतुष्ट नहीं है, बल्कि भूमि, जंगल, जल, रोजगार और सम्मानजनक जीवन से जुड़े अधिकारों पर स्पष्ट और ठोस कार्रवाई चाहता है। यही कारण है कि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन की बहस लगातार तेज होती जा रही है। वन अधिकार अधिनियम का मुद्दा भी गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। अनेक आदिवासी परिवारों के दावे वर्षों से लंबित हैं और कई मामलों में वन विभाग तथा स्थानीय समुदायों के बीच अधिकारों को लेकर टकराव देखने को मिला है। मनसुख वसावा ने बार-बार मांग की है कि वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी ािढयान्वयन सुनिश्चित किया जाए और पात्र आदिवासी परिवारों को उनके वैधानिक अधिकार समय पर प्रदान किए जाएं। उनका कहना रहा है कि कानून बनने के बावजूद यदि लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक नहीं पहुंचता, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सरदार सरोवर परियोजना और अन्य विकास योजनाओं से प्रभावित परिवारों का प्रश्न भी उनके राजनीतिक हस्तक्षेप का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। नर्मदा घाटी के अनेक परिवारों ने वर्षों से यह शिकायत की है कि उन्हें पर्याप्त मुआवजा, पुनर्वास और आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं कराए गए। मनसुख वसावा ने इन मुद्दों को उठाते हुए कहा कि विकास परियोजनाओं का लाभ पूरे देश को मिलना चाहिए, लेकिन जिन लोगों ने अपनी जमीन, घर और संसाधन खोए हैं, उनके साथ न्याय होना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने प्रभावित परिवारों के लिए बेहतर पुनर्वास और मुआवजे की मांग की है। इसके अलावा आदिवासी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और प्रशासनिक सेवाओं की उपलब्धता जैसे मुद्दे भी लगातार उठते रहे हैं। अनेक गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती हैं। मनसुख वसावा का मानना रहा है कि विकास के बड़े दावों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार दिखाई देना चाहिए। इसी कारण वे क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर अधिकारियों और सरकार के समक्ष अपनी बात रखते रहे हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह स्थिति विशेष महत्व रखती है क्योंकि किसी सत्तारूढ़ दल के सांसद द्वारा अपनी ही सरकार के सामने सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठाना सामान्य बात नहीं मानी जाती। इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि की जवाबदेही के रूप में भी देखा जा सकता है। दूसरी ओर विपक्ष इसे इस रूप में प्रस्तुत करता है कि यदि सत्ताधारी दल के सांसद को भी धरना या विरोध का रास्ता अपनाना पड़ रहा है, तो इसका अर्थ है कि जमीनी समस्याएं अभी भी गंभीर हैं। मनसुख वसावा द्वारा उठाए गए मुद्दे केवल गुजरात तक सीमित नहीं हैं।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।