कामाख्या मंदिर का सच: क्या है वह अदृश्य शक्ति जो 3 दिन पुरुषों को दूर रखती है और कैसे लाल हो जाती है पूरी नदी?
प्रकाशित: 28-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
असम की नीलांचल पहाड़ियों पर बसा कामाख्या देवी शक्तिपीठ आस्था और तंत्र विद्या का अद्भुत संगम है. यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साल के तीन दिन यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित रहता है. पौराणिक मान्यता है कि यहां मता सती का योनि गिरा था. इसलिए ऐसी मान्यता है कि साल मे एक बार अंबूबाची मेला के दौरान माता रजस्वला रहती हैं. इस दौरान माता के मंदिर के कपाट लगातार तीन दिनों तक पुरुषों के लिए बंद रहते हैं. इस दौरान मंदिर में पुरुषों का प्रवेश वर्जित रहता है. चिताभूमि पर स्थित माता का यह शक्तिपीठ तांत्रिकों के लिए साधना का प्रमुख केंद्र है. कहा जाता है कामाख्या शक्तिपीठ पर कई तांत्रिकों को सिद्धि प्राप्त हुई है. आइए, अब जानते हैं कामाख्या देवी शक्तिपीठ से जुड़ी खास बातें.
तंत्र साधना का है प्रमुख केंद्र
पौराणिक काल से ही कामाख्या मंदिर को तंत्र सिद्धि का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना गया है. यहां देवी को भगवान शिव की नववधू के रूप में पूजा जाता है. तांत्रिकों और अघोरियों के लिए यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का मुख्य स्रोत है. मान्यता है कि कलयुग में जो भी भक्त यहां तीन बार दर्शन कर लेता है, उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है.
3 दिन क्यों बंद रहते हैं कामाख्या मंदिर के कपाट
कामाख्या मंदिर में हर साल ऐसी घटना घटती है, जो भक्तों को हैरान कर देती है. मान्यतानुसार, हर साल जून के महीने में तीन दिन पुरुष भक्तों के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. इस संबंध में पौराणिक कथा आती है कि जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब विष्णु जी के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 अंग कटकर अलग-अलग स्थानों पर गिरे. कामाख्या वह स्थान है, जहां माता सती की योनि गिरी थी.
अम्बुवाची पर्व का महत्व
मान्यता है कि अम्बुवाची पर्व के दौरान ता कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं. इसी कारण मंदिर की पवित्रता और निजता बनाए रखने के लिए किसी भी पुरुष का अंदर जाना वर्जित होता है. यहां तक कि मंदिर के पुजारी भी इन दिनों अंदर प्रवेश नहीं करते.
अम्बुवाची मेला का चमत्कारिक प्रसाद
इन तीन दिनों (22 से 25 जून) को अम्बुवाची पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दौरान कुछ ऐसे चमत्कार होते हैं कि इन तीन दिनों में मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है. मंदिर के अंदर देवी के स्थान पर एक सफेद सूती कपड़ा रखा जाता है. जब तीन दिन बाद मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो वह सफेद कपड़ा लाल रंग में भीगा हुआ मिलता है. इसे अम्बुवाची वस्त्र कहा जाता है और भक्तों को प्रसाद के रूप में यही वस्त्र दिया जाता है.
तंत्र साधना का है प्रमुख केंद्र
पौराणिक काल से ही कामाख्या मंदिर को तंत्र सिद्धि का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना गया है. यहां देवी को भगवान शिव की नववधू के रूप में पूजा जाता है. तांत्रिकों और अघोरियों के लिए यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का मुख्य स्रोत है. मान्यता है कि कलयुग में जो भी भक्त यहां तीन बार दर्शन कर लेता है, उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है.
3 दिन क्यों बंद रहते हैं कामाख्या मंदिर के कपाट
कामाख्या मंदिर में हर साल ऐसी घटना घटती है, जो भक्तों को हैरान कर देती है. मान्यतानुसार, हर साल जून के महीने में तीन दिन पुरुष भक्तों के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. इस संबंध में पौराणिक कथा आती है कि जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब विष्णु जी के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 अंग कटकर अलग-अलग स्थानों पर गिरे. कामाख्या वह स्थान है, जहां माता सती की योनि गिरी थी.
अम्बुवाची पर्व का महत्व
मान्यता है कि अम्बुवाची पर्व के दौरान ता कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं. इसी कारण मंदिर की पवित्रता और निजता बनाए रखने के लिए किसी भी पुरुष का अंदर जाना वर्जित होता है. यहां तक कि मंदिर के पुजारी भी इन दिनों अंदर प्रवेश नहीं करते.
अम्बुवाची मेला का चमत्कारिक प्रसाद
इन तीन दिनों (22 से 25 जून) को अम्बुवाची पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दौरान कुछ ऐसे चमत्कार होते हैं कि इन तीन दिनों में मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है. मंदिर के अंदर देवी के स्थान पर एक सफेद सूती कपड़ा रखा जाता है. जब तीन दिन बाद मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो वह सफेद कपड़ा लाल रंग में भीगा हुआ मिलता है. इसे अम्बुवाची वस्त्र कहा जाता है और भक्तों को प्रसाद के रूप में यही वस्त्र दिया जाता है.