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अनुसूचित जाति की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो: श्याम प्रसाद

प्रकाशित: 12-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
लखनऊ,(वीअ)। उत्तर प्रदेश की करोड़ों भूमिहीन किसान महिलाओं का पसीना खेतों को हरा-भरा रखता है, लेकिन भूमि, मजदूरी और निर्णय-अधिकार में उनकी हिस्सेदारी आज भी नगण्य है। इस संबंध में सामाजिक समरसता मंच अवध प्रान्त द्वारा पावार को विश्व संवाद केन्द्र जियामऊ लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता के दोरान एक शोध-प्रतिवेदन जारी किया गया। यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डा.चन्द्रकान्ता के.माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है।
शोधकर्ता डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने प्रेसवार्ता में कहा, "जब तक भूमिहीन किसान महिला को 'अन्नदाता' के रूप में मान्यता, भूमि, मजदूरी और निर्णय में उसका वाजिब हक नहीं मिलता, तब तक ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण अधूरा रहेगा। नया भारत वह होगा जिसमें खेत की मेड़ पर खड़ी वह महिला भी, जिसके नाम एक इंच ज़मीन नहीं है, उतने ही आत्मविश्वास से नीति-निर्धारण की मेज़ पर अपनी बात रख सके।
चौंकाने वाले आंकड़े: श्रम और अधिकारों की खाई :भूमि स्वामित्व में कमी: उत्तर प्रदेश में केवल 7.6ज्ञ् महिलाओं के नाम पर कृषि भूमि दर्ज है। शेष सभी महिलाएं अपने ही परिवार की जमीन पर 'बेगानी' बनी हुई हैं। अवैतनिक श्रम: राज्य की 85ज्ञ् महिला श्रमशक्ति खेतों में जुटी है, लेकिन इनमें से अधिकांश के श्रम को आज भी 'अवैतनिक' (बिना वेतन का) माना जाता है। मजदूरी का अभाव: पिछले एक वर्ष में काम करने वाली महिलाओं में से 18ज्ञ् से कम को ही नकद मजदूरी मिल पाई है। शेष को अनाज या वस्तु के बदले संतोष करना पड़ता है।
अत्यधिक निर्धनता: मध्य, पूर्वी और दक्षिणी उत्तर प्रदेश के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में निर्धनता की दर 73.4ज्ञ् से 89.8ज्ञ् तक है, जो देश के कई राज्यों से कहीं अधिक है। इसमें बुंदेलखंड क्षेत्र और अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाएं सबसे बड़ी शिकार हैं। स्वास्थ्य और साक्षरता का संकट: महिला साक्षरता पुरुषों की तुलना में बहुत पीछे (66ज्ञ् बनाम 82ज्ञ्) है। इसके अलावा, 50ज्ञ् और 40ज्ञ् प्रदेश की आधी महिलाएं एनीमिया (रक्तअल्पता) से जूझ रही हैं, जबकि 5 वर्ष से कम आयु के 40ज्ञ् बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। केवल 16ज्ञ् भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है।
मुख्य वक्ताओं ने क्या कहा?
सरकार और समाज से प्रमुख मांगें :अनुसूचित जाति एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो। मनरेगा के अन्तर्गत भूमिहीन महिला श्रमिकों को प्राथमिकता के आधार पर वर्षभर रोजगार मिले। महिलाओं के लिए समान काम के बदले समान मजदूरी और तत्काल नकद भुगतान अनिवार्य हो। खेतमजदूर कार्ड: इसके माध्यम से महिलाओं की पहचान कर उन्हें प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (अऊ) दिया जाए।