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भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारतें और जवाबदेही का महासंकट

प्रकाशित: 08-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक बार फिर वही खौफनाक मंजर देखने को मिला, जिसकी आदत शायद इस बेबस शहर को हो चुकी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के ठीक सामने स्थित एक दशकों पुरानी और अवैध रूप से पांच मंजिलों तक तान दी गई 'होस्टल डेज' नाम की पीजी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई। यह हादसा कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के उस प्रशासनिक सड़ांध, मकान मालिकों के बेलगाम लालच और कथित प्रशासनिक लापरवाही का एक और ताजा दस्तावेज है, जो वर्षों से मासूम जिंदगियों को मलबे में दफन करता आ रहा है। हर हादसे के बाद एक तयशुदा स्क्रिप्ट चलती है। नेताओं के संवेदना भरे ट्वीट आते हैं, मुआवजे का ऐलान होता है। एक उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया जाता है और आरोपी मालिक के खिलाफ कानून की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी जाती है। फिर भी इस तरह के हादसे होते ही रहते हैं। अब सवाल यह है कि आखिर ये हादसे रुकते क्यों नहीं? क्यों दिल्ली की छाती पर ऐसी सैकड़ों मौत की इमारतें सीना ताने खड़ी हैं और उनके नीचे रहने वाले लोग हर पल मौत के साए में जीने को मजबूर हैं?
यदि हम दिल्ली में लापरवाही के पुराने इतिहास और अतीत से सबक न लेने की जिद पर नजर डालें, तो राजधानी का इतिहास ऐसी कई गगनचुंबी लापरवाइयों की गवाही देता है। साल 1997 का उपहार सिनेमा कांड याद कीजिए, जहां 59 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। उस हादसे ने चिल्ला-चिल्लाकर आगाह किया था कि सुरक्षा मानकों से समझौता मौत को आमंत्रण है। इसके बाद नवंबर 2010 में पूर्वी दिल्ली के ललिता पार्क में एक 5 मंजिला इमारत गिरने से 67 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। तब भी अवैध रूप से अतिरिक्त मंजिलें बनाना और बेसमेंट में पानी का भराव ही कारण बताया गया था। फिर साल 2019 में रानी झांसी रोड पर हुआ अनाज मंडी अग्निकांड, जिसमें 43 श्रमिकों की दम घुटने से मौत हो गई थी। और मई 2022 का मुंडका कमर्शियल बिल्डिंग हादसा, जिसने 27 जिंदगियां निगल लीं। इसी साल 30 मई 2026 को साकेत के सैदुल्लाजबा में अवैध निर्माण के चलते बहुमंजिला इमारत ढह गई और ठीक तीन दिन बाद 3 जून 2026 को मालवीय नगर के एक अवैध होटल में भयंकर आग लग गई। अब सत्य निकेतन में हुआ हादसा इसी खूनी श्रृंखला की अगली कड़ी है। इतिहास खुद को बार-बार दोहरा रहा है, लेकिन हमारी सोई हुई व्यवस्था को जगाने के लिए इतने बेगुनाह लोगों का खून भी कम पड़ रहा है।
जब हम इस तबाही के पीछे सिस्टम और स्थानीय प्रशासन की भूमिका को देखते हैं, तो कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की आशंका साफ तौर पर उजागर होती है। इस त्रासदी की जवाबदेही तय करने में स्थानीय निकाय, स्थानीय पुलिस और भवन निर्माण से जुड़े विभागों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। सरकारी रिकॉर्ड्स और दिल्ली पुलिस के प्राथमिक बयानों में इस इमारत की उम्र को लेकर भले ही विरोधाभास है। जहां निगम इसे 30 साल पुराना बता रहा है, वहीं पुलिस और स्थानीय लोगों के अनुसार यह लगभग चार-पांच दशक पुरानी हो चुकी ढांचागत रूप से बेहद जर्जर संरचना थी। लेकिन दोनों ही सूरतों में इस पर अवैध निर्माण का सच नहीं बदलता। सत्य निकेतन जैसे घनी आबादी वाले छात्र हब में केवल 'ग्राउंड प्लस वन' यानी एक मंजिल निर्माण की अनुमति थी, लेकिन वहाँ पाँच मंजिला इमारत खड़ी कर दी गई। क्या यह निर्माण रातों-रात हो गया? स्थानीय प्रशासन और एमसीडी के जूनियर इंजीनियर से लेकर उच्च अधिकारियों की नाक के नीचे कंक्रीट का यह अवैध पहाड़ खड़ा किया जा रहा था। यदि जांच में अधिकारियों की मिलीभगत या भ्रष्टाचार की पुष्टि होती है, तो यह भी गंभीर प्रशासनिक और आपराधिक जवाबदेही का विषय होना चाहिए। ऐसी स्थिति में पूरे तंत्र की जिम्मेदारी तय करना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करना जरूरी होगा। जब तक भ्रष्टाचार के संभावित नेक्सस नहीं टूटेंगे, तब तक कागजी ऑडिट महज पैसे वसूलने का जरिया बने रहेंगे। कानूनन स्थानीय प्रशासन का यह दायित्व है कि वह हर साल मानसून से पहले जर्जर और खतरनाक इमारतों का सर्वेक्षण करे। लेकिन यह सर्वेक्षण फाइलों से बाहर क्यों नहीं आता? कल हुए हादसे में बेसमेंट की अवैध खुदाई और बारिश के पानी का जमाव ही मुख्य कारण बनकर उभरा है, हालांकि इसके वास्तविक कारणों और जिम्मेदार व्यक्तियों का निर्धारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
इस प्रशासनिक विफलता की आशंका के साथ-साथ मकान मालिकों का मुनाफे के लिए अंधा लालच भी जिम्मेदार हो सकता है, जो मुनाफे की वेदी पर लगातार इन बेगुनाह जिंदगियों की बलि चढ़ा रहा है। दिल्ली में पढ़ाई या रोजगार के लिए आने वाले बाहरी छात्र-छात्राएं इनके लिए केवल 'कैश काउ' यानी कमर्शियल कमाई का जरिया हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सत्य निकेतन की कमजोर और जर्जर हो चुकी जिस इमारत को एक साल पहले असुरक्षित मानकर खाली करा दिया गया था, वहां नियमों की धज्जियां उड़ाकर फिर से काम शुरू हो गया।
यदि उपलब्ध जानकारी और जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है कि इमारत को पहले असुरक्षित घोषित कर खाली कराया गया था और बाद में वहां दोबारा पीजी संचालित किया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का मामला होगा। सूत्रों के अनुसार, मकान मालिक ने स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से न सिर्फ इमारत की मरम्मत करवाई, बल्कि उसमें 'हॉस्टल डोज़' नाम से बॉयज पीजी भी शुरू कर दिया। इस दावे की स्वतंत्र जांच आवश्यक है और यदि इसमें स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। हद तो तब हो गई जब अधिक किराया वसूलने और कमरों की संख्या बढ़ाने की हवस में इसके बेसमेंट को भी अवैध रूप से खोदा जा रहा था, जिसने बची-कुची नींव को भी हिलाकर रख दिया। यदि जांच में बेसमेंट की अवैध खुदाई और उसका इमारत की संरचनात्मक कमजोरी से संबंध स्थापित होता है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। मकान मालिकों को न तो बिल्डिंग की सुरक्षा की परवाह है और न ही उसमें रहने वाले मासूमों की जान की। ऐसी परिस्थितियों में यदि जानबूझकर सुरक्षा मानकों की अनदेखी और गंभीर लापरवाही सिद्ध होती है तो इसे महज एक दुर्घटना मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा।
इस पूरे तंत्र में किराएदारों और नागरिकों का दायित्व भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ हमारी मौन सहमति भी एक बड़ा अपराध है। हालांकि बाहर से आने वाले छात्र अक्सर मजबूर होते हैं। उनके पास सीमित बजट और हॉस्टलों की कमी के कारण इन असुरक्षित जगहों पर रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता। लेकिन स्थानीय निवासी, आरडब्ल्यूए और खुद किराएदार भी कहीं न कहीं इस व्यवस्था के मूक गवाह बन जाते हैं। यदि हमारे पड़ोस में कोई अवैध रूप से बेसमेंट खोद रहा है या कोई पुरानी इमारत झुक रही है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना और स्थानीय प्रशासन में लिखित शिकायत दर्ज कराना हमारा नागरिक कर्तव्य है। कई बार लोग अदालती चक्करों या पुलिस की लचर कार्यप्रणाली के डर से चुप रह जाते हैं। लेकिन हमें समझना होगा कि सुरक्षा मामलों में हमारी यह मौन सहमति अंतत हमारे ही बच्चों के लिए काल बन जाती है। नागरिकों को अपने अधिकारों और जीवन की सुरक्षा के लिए जागरूक होना ही होगा।
अब समय आ गया है कि इस तयशुदा स्क्रिप्ट को बदला जाए और समाधान का रास्ता तलाशते हुए कड़े और प्रभावी नीतिगत फैसले लिए जाएं। सरकार और न्यायपालिका को मिलकर कुछ कड़े और अभूतपूर्व कदम उठाने होंगे, जिनमें सबसे पहले जवाबदेही का केंद्रीकरण जरूरी है। केवल मकान मालिक को जेल भेजने से काम नहीं चलेगा। जिस इलाके में अवैध निर्माण के कारण इमारत गिरती है, वहां के संबंधित एमसीडी अधिकारी और स्थानीय बीट कॉन्स्टेबल की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि जांच में उनकी लापरवाही या मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो उनके विरुद्ध गैर-इरादतन हत्या सहित लागू कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। दोष सिद्ध होने की स्थिति में कानून के अनुसार उनकी संपत्तियों की कुर्की सहित अन्य दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। इसके साथ ही दिल्ली के मुखर्जी नगर, लक्ष्मी नगर, सत्य निकेतन, और करोल बाग जैसे छात्र बहुल इलाकों में स्थित सभी पीजी और हॉस्टलों का एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा अनिवार्य थर्ड पार्टी स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट कराया जाए और जो इमारतें अनफिट पाई जाएं, उन्हें तुरंत खाली कराया जाए। अंतिम और दीर्घकालिक उपाय के रूप में सरकार को दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के सहयोग से बड़े पैमाने पर सरकारी हॉस्टलों का निर्माण करना चाहिए ताकि छात्रों को निजी माफियाओं के रहमोकरम पर न छोड़ना पड़े।
निष्कर्ष: यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्य निकेतन के इस मलबे के नीचे केवल छात्र नहीं दबे हैं, बल्कि दिल्ली का पूरा नागरिक प्रशासन और हमारा सामूहिक जमीर दफन हो चुका है। हम एक परमाणु शक्ति संपन्न देश और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करते हैं, लेकिन राजधानी में रहने वाले हमारे देश के भविष्य को हम एक सुरक्षित छत तक नहीं दे पा रहे हैं। अगर इस हादसे के बाद भी दिल्ली की नींद नहीं टूटती तो मान लीजिए कि हम एक ऐसे टाइम बम पर बैठे हैं, जिसकी टिक-टिक हर गुजरते दिन के साथ तेज होती जा रही है। अगला नंबर किसी का भी हो सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)